सोना आग की भट्टी में ही तपकर खरा होता है। कमोबेश यही उसूल इंसान की कामयाबी पर भी लागू होता है। मुराद यहां खिलाडि़यों की सुनहरी सफलता से है। बड़े खेल आयोजनों में सोने का तमगा जीतने वाले खिलाडि़यों की पीछे बरसों की तपस्या होती है। इस मामले में सवा सौ करोड़ की आबादी वाला हमारा देश काफी पीछे है।

सरकार कितने भी प्रयास कर ले, पर नौकरशाही की इच्छा शक्ति के बिना कोई भी योजना धरातल पर नहीं आ सकती। इसका एक उदाहरण भाला भेंक के कोच उवे हॉन का बयान है। अगर इसमें सच्चाई है तो ओलंपिक का सपना कैसे पूरा हो सकेगा।

इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचार पर केंद्र सरकार का खेल मंत्रालय ‘खेलो इंडिया’ जैसा अभियान चला रहा है। मकसद खिलाडि़यों के हुनर की जमीनी स्तर पर पहचान कर उन्हें बड़े खेल मुकाबलों के लिए तैयार करना है। सरकार की इन कोशिशों पर नौकरशाह ही बट्टा लगाने पर तुले हैं। कम से कम भारतीय एथलीट नीरज चोपड़ा के जर्मन कोच उवे हॉन के हालिया उद्गार से तो यही लगता है। उवे हॉन ने खिलाडि़यों के प्रशिक्षण में स्पोर्ट्स अथॉरिटी आॅफ इंडिया (साई) के जरिए उचित सहयोग न मिलने का आरोप लगाया है। ज्ञात हो कि भाला फेंक में नीरज चोपड़ा ने 2018 में ही गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेल और जकार्ता एशियाई खेल में देश को दोहरी स्वर्णिम सफलता दिलाई थी। इसके अतिरिक्त विश्व में अपने वर्ग में वे इस साल 6वें स्थान पर रहे हैं। इस नाते उनसे 2020 के टोक्यो ओलंपिक्स में भारत की तरफ से एथलेटिक्स में पहला मेडल जीतने की काफी आशाएं हैं। व्यक्तिगत तौर पर वह इसके लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। इसके लिए उनके जर्मन कोच उवे हॉन भी उन्हें तैयार करने में लगे हैं, लेकिन साई के रवैये से वह थोड़े निराश हैं।
कोच उवे हॉन ने एक मेल सार्वजनिक कर अपने दिल की टीस बयान की है। उन्होंने नीरज चोपड़ा की 2019 में वर्ल्ड चैंपियनशिप और 2020 में ओलंपिक तैयारियों में आ रही दिक्कतों का जिक्र किया। गौरतलब है कि कोच उवे हॉन जेवलीन थ्रो के इतिहास में 100 मीटर का निशाना छूने वाले दुनिया के अकेले खिलाड़ी हैं। इस नाते भारत ने मोटी रकम अदाकर नीरज चोपड़ा समेत 10 एथलीट्स को प्रशिक्षण देने के लिए उनकी सेवाएं ली हैं। वे इन खिलाडि़यों को पटियाला स्थित राष्ट्रीय खेल संस्थान (एनआईएस) में प्रशिक्षण दे रहे हैं। अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा है कि रिकवरी सिस्टम और उच्च स्तरीय जेवलीन यानी भाला की हमारी मांग भी पूरी नहीं की गई है। हॉन ने मेल में लिखा मैंने दो जेवलिन कंपनियों से संपर्क किया और अपनी जरूरत के उपकरणों की फेहरिस्त पटियाला स्थित आॅफिस भेजी थी। लेकिन जब कंपनियों को कोई आॅर्डर नहीं मिला, तब मैंने गत सप्ताह चेक किया, तो पता चला कि मेरी भेजी गई मेल को खोलकर पढ़ा तक नहीं गया। साई के काम करने का यह तरीका है? अपनी शिकायत में उन्होंने मालिश करने वाले, फिजियोथ्रेपिस्ट और दूसरे कर्मियों का भी जिक्र किया है। खैर, उनकी शिकायतों की सूची काफी लंबी है। भला हो खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर का जिन्होंने हॉन की शिकायतों पर फौरन संज्ञान लेते हुए हर संभव मदद का भरोसा दिलाया है।
वह स्वयं भी ओलंपिक खेलों के रजत पदक विजेता रह चुके हैं। इस नाते उन्हें इन खेलों में पदक जीतने के लिए दरकार विश्वस्तरीय सुविधाओं का ज्ञान है। इस मुद्दों पर उन्होंने फौरन सक्रियता दिखाते हुए कहा है कि वे मंत्रिमंडल में इसे उठाकर साई को श्रेष्ठ लोगों की सेवाएं लेने का अधिकार दिलाने का प्रयास करेंगे, ताकि नौकरशाही के चलते राह में आने वाले रोड़े कम हों। बताते चलें कि बीजिंग ओलंपिक्स-2018 के बाद वहां से छनकर आ रहे वीडियो से पूरी दुनिया को ज्ञात हुआ कि चीन अपने खिलाडि़यों पर बचपन से ही कितनी मेहनत करता है। तब अमेरिका को भी चीन की इस महानता को स्वीकारते हुए कहना पड़ा था कि चीन अगले चंद बरसों में ओलंपिक मेडल तालिका में हमें पछाड़ देगा। ऐसे में दुनिया के बेहतरीन खिलाडि़यों से लोहा लेने के लिए हमें भी अपने प्रशिक्षण और सुविधाओं के स्तर को सुधारना होगा। नीरज चोपड़ा, हीमा दास, दीपा कर्माकर जैसे कई खिलाड़ी निरंतर अपने प्रदर्शनों से ऐसे खेलों में भारत के लिए आस बंधा रहे हैं, जिनमें अब तक हमारी ओलंपिक में उपलब्धि न के बराबर रही है। बस जरूरत उन्हें सही दशा और दिशा देने की है।

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