क्रिकेट कोच रमाकांत आचरेकर नहीं रहे। सफल क्रिकेटर बनने की चाहत रखने वाले आचरेकर खिलाड़ी के तौर पर सफल नहीं हो सके। लेकिन कोच के रूप में उन्होंने गुरु-शिष्य की परंपरा को बढ़ाते हुए देश को कई महान खिलाड़ी तो दिए ही, उन्हें खिलाड़ी के साथ ही अच्छा इंसान बनने की भी शिक्षा दी।

भारत में गुरु-शिष्य परम्परा प्राचीन समय से रही है। क्रिकेट कोच रमाकांत आचरेकर नि:संदेह इस परम्परा के वाहक थे। उनके जैसे गुरुओं की पूरी नस्ल अब खत्म होने के कगार पर है। आचरेकर ने भी दो जनवरी को इस दुनिया को अलविदा कहकर इस परम्परा को और सूना कर दिया। उन्होंने मुंबई के शिवाजी पार्क स्थित अपने आवास में आखिरी सांसें लीं। वह पिछले काफी समय से कई बीमारियों से ग्रस्त थे। रमाकांत आचरेकर जैसे लोग अपनी बहुमूल्य सेवाओं के सबब अमर हो जाते हैं। उन्होंने अपने जीवन में केवल एक प्रथम श्रेणी क्रिकेट मैच खेला। इसके बावजूद क्रिकेट में वे केवल एक शख्सियत नहीं बल्कि पूरी संस्था का दर्जा रखते थे। कारण उनके शिष्यों की एक भरी-पूरी जमात है। हालांकि उन्हें क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर के कोच के तौर पर अधिक जाना जाता है, लेकिन कई नामचीन क्रिकेटरों ने भी उनसे क्रिकेट का ककहरा सीखा। उनमें विनोद कांबली, चंद्रकांत पंडित, प्रवीण आमरे, अजीत आगरकर, रमेश पोवार, समीर दिघे और अमोल मजूमदार जैसे क्रिकेटर शामिल हैं। 1932 में जन्मे रमाकांत आचरेकर ने लगभग छह दशक तक भारतीय क्रिकेट की सेवा की। उन्होंने 1945 में मुंबई के न्यू हिंद क्रिकेट क्लब की ओर से खेलना शुरू किया। वह यंग महाराष्ट्र इलेवन, गुलमोहर मिल्स और मुंबई पोर्ट्स की तरफ से भी खेले। वे मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के चयनकर्ता भी रहे। दिलचस्प बात यह है कि बतौर खिलाड़ी, क्रिकेट जगत में कुछ खास नहीं करने वाले रमाकांत आचरेकर ने कोच के तौर पर लंबी और कामयाब इनिंग खेली। खिलाड़ी के रूप में उन्होंने 1963-64 में मोईनुद्दौला कप के दौरान बस एक फर्स्ट क्लास मैच खेला, लेकिन कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था। इसीलिए उन्होंने शिवाजी पार्क में कामथ मेमोरियल क्रिकेट क्लब की स्थापना की और इसमें सैकड़ों युवाओं को क्रिकेट की बारीकियां सिखाई।

मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के अंदर क्रिकेट खेलने का उन्होंने जज्बा भरा। यही वजह है कि 1980 के दशक में भारतीय क्रिकेट के क्षितिज पर आचरेकर एक चमकते सितारे की मानिंद चमके। वह क्रिकेट के दीगर कोचों से कई मायनों में अलग थे। उन्हें जिसमेंक्रिकेट खेलने का हुनर नजर आता था, बस उसे ही अपना शिष्य बनाते थे। कभी खिलाडि़यों के नैसर्गिक खेल को बदलने के लिए नहीं कहा। सीधे सादे स्वभाव के आचरेकर अमूमन आधी बाजू की कमीज, सामान्य पतलून और देवानंद की ‘ज्वैलथीफ’ फिल्म मार्का टोपी पहनते थे, लेकिन कोचिंग के मामले में अत्यधिक सख्त थे। क्रिकेट के मैदान में सबसे पहले पहुंचते और सबसे अंत में जाते। वे अपने शिष्यों को किसी भी हालत में प्रैक्टिस और मैच न छोड़ने पर जोर देते थे। क्रिकेट में उनकी सेवाओं के मद्देनजर 1990 में उन्हें द्रोणाचार्य एवार्ड और फिर 2010 में पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया। सचिन तेंदुलकर को तो अपने स्कूटर से एक जगह से दूसरी जगह मैच खिलाने के लिए ले जाते थे। शिष्यों के शतक बनाने या दीगर उपलब्धियों पर कभी तारीफ न करने वाले कोच आचरेकर अगले ही क्षण उसकी खामियों को गिनाने बैठ जाते, ताकि वे गलतियां दोहराई न जाएं। वानखेड़े स्टेडियम में अपने रिटायरमेंट के समय मास्टर ब्लास्टर सचित तेंदुलकर ने कहा कि सर से मैं ‘वेल-डन’ सुनने के लिए तरस गया। अब तो एक बार ऐसा कहकर मेरे दिल की तमन्ना पूरी कर दीजिए, क्योंकि अब मुझे क्रिकेट का कोई मैच नहीं खेलना है।

जीते-जी किंवदंती बन चुके आचरेकर के हर शिष्य के पास उनसे जुड़ी कहानियां हैं। प्रैक्टिस के समय स्टंप की गिल्लियों पर सिक्के रखकर गेंदबाजों को बिना थके गेंदबाजी करने और बल्लेबाजों को उसे न गिरने देने के लिए लालायित करना उनका मूलमंत्र था। ऐसे कई सिक्के तेंदुलकर ने अपने गुरु के धरोहर के तौर पर संजोकर रखे हैं। क्रिकेट कोचिंग के प्रति उनके इसी समर्पण का नतीजा था कि 90 के दशक में एक समय उनके तीन शिष्य सचिन तेंदुलकर, विनोद कांबली और प्रवीण आमरे भारतीय टीम में एक साथ खेल रहे थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि महान क्रिकेटर के साथ-साथ अच्छा इंसान बनाने वाली उनकी सीख को उच्च स्तर पर क्रिकेट कोच के तौर सेवाएं देने वाले चंद्रकांत पंडित, संजय बांगर, प्रवीण आमरे और रोमेश पोवार आगे बढ़कर गुरु-शिष्य की शानदार परम्परा को जीवित रखेंगे।

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