अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के क्षितिज पर 2003 में एक नया सितारा चमका। लगभग 15 सालों तक इसके सभी प्रारूपों को अपनी किरणों से रौशन किया। फिर इसी चार दिसंबर को उसके करियर का सूर्यास्त हो गया। गौतम गंभीर ने आखिरकार दो सालों की अनथक कोशिशों के बाद भी टीम इंडिया में वापसी न कर पाने के कारण क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से संन्यास लेने की घोषणा कर दी। इस तरह डेढ़ दशकों का उनके भरे-पूरे क्रिकेट करियर का अंत हो गया। दरअसल गौतम केवल नाम के गंभीर नहीं हैं। एक सफल क्रिकेटर बनने के लिए वांछित गंभीरता उनके अंदर कूट-कूट कर भरी थी। धैर्य ऐसा, जो लोगों को अकर्षित होने पर मजबूर कर दे, खेल के प्रति वचनबद्धता ऐसी कि प्रशंसा खुद-ब-खुद कदमों आ गिरे और बिना लाग-लपेट की बातों से लोगों की भृकुटि तन जाए। इन्हीं विशेषताओं के दम पर उन्होंने भारतीय क्रिकेट के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अलग छाप छोड़ी।

पंद्रह साल के धीर-गंभीर क्रिकेट करियर के बाद आखिर गौतम गंभीर ने अपना बल्ला टांग ही दिया। बेहतरीन बल्लेबाज और बेहतरीन कप्तान होने के साथ ही गंभीर को दो विश्व कप मैच में खिताबी जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाने के लिए भी हमेशा याद किया जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सभी प्रारूपों में बनाए गए 10324 रन इसका प्रमाण हैं। ये रन उन्होंने 38.95 की औसत से बनाए। इसमें 20 शतक और 63 अर्द्धशतक शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय मैचों में 10 हजार से अधिक रन बनाने वाले वह 13वें भारतीय बल्लेबाज हैं। टेस्ट मैचों में उनका सर्वाधिक स्कोर 206 और वनडे मैचों में 150 रन है। उन्हें भारत के सबसे सफलतम सलामी बल्लेबाजों में गिना जाता है। एक जमाने में वीरेंद्र सहवाग के साथ उनकी ओपनिंग जोड़ी काफी मशहूर थी और दोनों अपनी विस्फोटक पारियों की बदौलत किसी भी गेंदबाज की लाइन-लेंथ बिगाड़ने की क्षमता रखते थे। टेस्ट मैचों में तो बतौर सलामी बल्लेबाज वह रन और औसत, दोनों ही मामलों में महज सुनील गावस्कर और वीरेंद्र सहवाग से ही पीछे हैं। बतौर ओपनर टेस्ट मैचों में उन्होंने 42.90 की औसत से 4119 बनाए। 2008-2010 के दौरान उनका टेस्ट करियर अपने चरम पर था। इस दौरान उन्होंने 11 टेस्ट में कम से कम एक अर्द्धशतक जरूर लगाया। ऐसा करके उन्होंने वेस्टइंडीज के महानतम बल्लेबाज सर विवियन रिचर्ड्स की बराबरी की। यही नहीं, उन्होंने 2009-2010 के दौरान लगातार पांच टेस्ट शतक ठोके। यह कारनामा अंजाम देने वाले वे इकलौते भारतीय बल्लेबाज हैं। अपने टेस्ट करियर के 9 शतकों में से उन्होंने 8 इसी दौरान स्कोर किए। इसी दौरान उन्होंने 2009 में नेपियर में न्यूजीलैण्ड के विरुद्ध फॉलोआॅन खेलते हुए कुल 643 मिनट यानी लगभग 11 घंटे क्रीज पर बिताए और लगभग निश्चित लग रही हार से टीम इंडिया को बचा लिया। उनके इस प्रदर्शन पर उन्हें 2009 में आईसीसी टेस्ट प्लेयर आॅफ दि ईयर के खिताब से नवाजा गया। अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर का आगाज उन्होंने 2003 में बांग्लादेश के विरुद्ध खेले गए एकदिवसीय मैच में किया। हालांकि इसमें वह कुछ विशेष नहीं कर पाए, लेकिन उसके बाद वह वनडे मैचों में भी टीम इंडिया की रीढ़ रहे। विशेषकर एकदिवसीय विश्व कप-2011 के फाइनल मैच में श्रीलंका के विरुद्ध उनकी यादगार पारी को भला कौन भूल सकता है। इस मैच में उन्होंने 122 गेंदों में भारत की तरफ से सर्वाधिक 97 रनों की सूझबूझ भरी पारी खेलकर खिताबी जीत का आधार रखा। फिर वर्ल्ड कप की बात करें तो टी-20 वर्ल्ड कप-2007 के फाइनल मैच में चिरप्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ महज 54 गेंदों में 75 रनों की विस्फोटक पारी खेली। इस तरह टीम इंडिया की विश्वकप की दो खिताबी जीतों में उनका जबरदस्त योगदान रहा। महंगी और दुर्लभ मुस्कुराहट की वजह से उनकी नेतृत्व क्षमता को भी नाम के अनुरूप ही गंभीर माना गया। 2010 में वनडे सीरीज का कप्तान घोषित किए जाने के बाद घरेलू पिचों पर उन्होंने न्यूजीलैण्ड को 5-0 से रौंद कर इसे साबित किया। फिर आईपीएल में कोलकाता नाइटराइडर्स ने भी 2012 और 2014 की खिताबी जीत उन्हीं के नेतृत्व में हासिल की।

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