र्नाटक की खनन से बर्बाद पहाडि़यों को हरियाली की चादर ओढ़ाने वाले डॉ. शिवकुमार स्वामीजी गरीब बच्चोंके भविष्य निर्माता भी थे। उनके गुरुकुल में धर्म,जाति और पंथ से इतर 5 से 16 साल के बच्चोंको मुत भोजन, शिक्षा और आश्रय प्रदान कियाजाता है। उनको लिंगायत समुदाय में ‘चलते फिरते भगवान’ का दर्जा प्राप्त था। पिछले वर्ष कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने डॉ. शिवकुमार स्वामी से मुलाकात करने के बाद कहा था किजब मैंने श्रद्धेय स्वामीजी से मुलाकात की तो मुझे ऐसा लगा कि मैं भगवान के दर्शन कर रहा हूं। कर्नाटक के तुमकुरु में स्थित श्री सिद्धगंगामठ के मठाधीश रहे डॉ. शिवकुमार स्वामीजी नेखुद को राजनीति से दूर ही रखा था। स्वामीजीने कभी किसी राजनीतिज्ञ का पक्ष नहीं लिया। पिछले वर्ष विधानसभा चुनावों से पूर्व लिंगायतों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की बात उठी, तोस्वामीजी ने इससे अपने आप को अलग रखा। श्री सिद्धगंगा मठ एक लिंगायत मठ है।

लोगों की सेवा करना यहां भगवान की सेवा करने जैसा माना जाता है। यहां संस्कृत की पढ़ाई भी उपलब्ध हैं। चित्रदुर्गा स्थित मुरगराजेंद्र मठ के डॉक्टर शिवमूर्तिमुरूगा शरनु स्वामीजी ने कहा कि उनके मन मेंकभी भी जाति को लेकर कोई दुर्भावना नहीं रही।मठ की स्थापना कर्नाटक के एक छोटे सेगांव में 15वीं शताब्दी में हरदनहल्ली गोशाला सिद्देश्वरा स्वामीजी द्वारा की गई थी। बाबा रामदेवने स्वामीजी की अंत्येष्टि के दिन कहा कि सिद्धगंगामठ के शिवकुमार स्वामीजी हिमालय के समान महान और गुरु परम्परा के गौरव थे। वो मर करभी अमर हो गए। वैकल्पिक कृषि मीडिया केंद्र(सीएएएम) के निदेशक डॉ. शिवराम पेलूर लिखते हैं कि कर्नाटक में कपोटगिरि पहाडि़यां धातुओं के अवैध खनन और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई कीवजह से बंजर और वीरान हो चुकी थीं, लेकिन शिवकुमार स्वामीजी ने इन नंगी पहाडि़यों परहरियाली की चादर ओढ़ा दी थी।

भारत रत्न दिए जाने की मांग
एक अप्रैल, 1907 को मागड़ी जिले के वीरपुर में पैदा हुए शिवकुमार अपने माता-पिता के सबसे बड़े
पुत्र थे। उन्होंने वैकल्पिक विषयों के रूप में भौतिकी और गणित के साथ वर्ष 1930 में कला में स्नातक
की डिग्री हासिल की। वे कन्नड़, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं में पारंगत थे। स्वामीजी को वर्ष 1965 में
कर्नाटक विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर आॅफ लिटरेचर की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। 2007 में
कर्नाटक सरकार ने राज्य के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार कर्नाटक रत्न से सम्मानित किया था। उनके निधन
के बाद उनको देश के सर्वोच्च भारत रत्न सम्मान दिए जाने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। दुनिया भर में
बसे कन्नड़ समुदाय के लोगों ने स्वामीजी को श्रद्धांजलि अर्पित की है।

डॉ. शिवकुमार स्वामी की अनेक उपलब्धियां हैं, लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने मानव सेवा के लिए अपने जीवन के 110 वर्ष समर्पित कर दिए। स्वामीजी के नेतृत्व में गुरुकुल परम्परा में शिक्षा, अध्यात्म, सांस्कृतिक विरासत की रक्षा,नेत्रहीन और नि:सहाय लोगों की देखभाल, कृषि का विकास, हजारों बच्चों को भोजन और सभी धर्मों और समुदायों के लोगों में सद्भाव औरसौहार्द को प्रोत्साहन आदि ने उनके व्यक्तित्वमें चार चांद लगा दिए। उन्होंने 125 से अधिकशैक्षिक संस्थाओं की स्थापना की, जिनमें लगभग 10,000 जरूरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षा,आवास और भोजन की लगभग नि:शुल्कसुविधाएं दी जाती हैं। इस सारी प्रक्रिया को स्थायीऔर मजबूत बनाने के लिये गहन वनीकरणऔर पौधे लगाने का काम भी चलाया गया।स्वामीजी के गुरुकुल में 10,000 से अधिकबच्चे रहते हैं और यह गुरुकुल सभी धर्मों, जातियों और पंथों के बच्चों के लिए खुला है। स्वामीजी ने योगीत्व को पसंद किया, लेकिन घरवाले इसके खिलाफ थे। उनका यह फैसला पिता के लिए काफी पीड़ादायक था। सिद्धगंगामठ के प्रमुख रहे डॉ. शिवकुमार स्वामी केबाद नए मठाधीश सिद्धलिंग महास्वामी होंगे जोस्वामीजी के खराब स्वास्थ के बाद से ही मठ की जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। लिंगायत समुदाय कायह मठ करीब 300 साल पुराना है। स्वामीजीकी जन्मस्थली वीरपुरा गांव को प्रदेश के जल संसाधन मंत्री डीके शिवकुमार ने गोद लेकर विकसित करने की बात कही है। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here