मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की बुनियाद फरेब, कुटिलता और धर्म के गठजोड़ पर रखी थी जिसमें ताकत का बेजा इस्तेमाल भी शामिल था। पाकिस्तान अभी भी उसी ढर्रे पर चल रहा है। यह अलग बात है कि पूरी ताकत सेना के हाथ में चली गयी और धर्म कट्टरपंथी जमातों के हाथों में। बचा सिर्फ फरेब और कुटिलता जो राजनेताओं के हिस्से में है।  यही वजह है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र निरंतर इम्तेहान से गुजरता रहा और कई बार सेना की बूटों के नीचे रौंदा भी गया। खास बात यह रही कि पाकिस्तान की न्यायपालिका इस मामले में सेना के पाले में दिखी और संविधान व लोकतंत्र को सेना की चेरी बनाने में अहम भूमिका निभाती रही। एक बार फिर नवाज शरीफ को केन्द्र में रखकर लोकतंत्र जमींदोज करने की कुटिल चालें चली जा रही हैं। चलने वाली तो सेना ही है लेकिन न्यायपालिक ने उसका वजीर बनना स्वीकार कर रखा है। यही वजह है कि अब पाकिस्तान के लोग भी इस बात को लेकर संशय में हैं कि पाकिस्तान में जम्हूरियत बचेगी या नहीं। वह देख रहे हैं कि पाकिस्तान में ‘डीप स्टेट’ यानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई मिलकर अब कौन सा ‘गेम’ खेलेंगी। संशय तो इस बात को लेकर भी है कि सरकार बनाएगा कौन और चलाएगा कौन? क्या ये दोनों एक ही होंगे या फिर अलग-अलग? दुनिया इसे माने या न माने लेकिन सच यही है कि पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई नवाज को सलाखों को पीछे धकेलकर किसी प्यादे को इस्लामाबाद में प्रतिष्ठित करना चाहती हैं ताकि रावलपिंडी से शासन आसानी से चलाया जा सके। इमरान खान जैसे कच्चे और अनिश्चित खिलाड़ी इसे देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि वे ही डीप स्टेट के असली सिपहसालार (सही अर्थों में प्यादे) हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि नवाज शरीफ अब क्या करेंगे? क्या वे लंदन से पाकिस्तान लौटने का विचार त्याग देंगे अथवा वे पाकिस्तान पहुंच कर जेल जाएंगे? हालांकि दोनों ही विकल्प उनके लिए चुनौतीपूर्ण हैं लेकिन पहला विकल्प उनका राजनीतिक करियर खत्म कर सकता है, जबकि दूसरे विकल्प में उनके लिए थोड़ी संभावना शेष दिखायी देती है।

पाकिस्तान में एक बार फिर से सेना और न्यायपालिका की मिलीभगत दिखाई दे रही है। दोनों के इस मिली भगत के केंद्र में इस बार नवाज शरीफ हैं। पड़ोसी देश में जब भी ऐसे हालात बने, वहां लोकतंत्र की आस समाप्त होती रही है।

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के राजनीतिक करियर को जिस तरह से न्यायपालिका खत्म कर रही है, उससे प्रथम दृष्टया यह कहा जा सकता है कि सेना नवाज को किसी भी कीमत पर सत्ता में फिर से देखना नहीं चाहती है। यह बात इसलिए कही जा सकती है कि पाकिस्तान में न्यायपालिका कभी-कभी ही स्वतंत्र होती है, अन्यथा वह सेना के नियंत्रण में ही काम करती है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका वही करेगी जो सेना की मंशा होगी। अगर ऐसा न होता तो जो मामला (पनामा गेट केस) खारिज हो चुका था, उसे सुप्रीम कोर्ट क्यों रि-ओपन करता। द्वितीय-मामले का निपटारा किए बिना ही कोर्ट नवाज शरीफ को न केवल प्रधानमंत्री के पद के अयोग्य बल्कि पार्टी अध्यक्ष पद के लिए भी अयोग्य करार नहीं देता। यह दुनिया में शायद एक अजीबोगरीब मामला होगा, जहां मामले की सुनवाई बाद में होती है और सजा पहले मुकर्रर कर दी गयी। यह भी अजीब निर्णय था कि नवाज शरीफ को पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए भी अयोग्य करार दे दिया गया, जबकि पार्टी का पद कोई संवैधानिक या राज्य की विधि के अधीन पद नहीं था। तृतीय-उस मामले में नवाज शरीफ को सजा सुनाई गयी जिसमें उनका नाम ही शामिल नहीं था। वास्तविकता तो यह है कि इस मामले में उनके बच्चों के नाम हैं, ना कि नवाज शरीफ का। शायद पाकिस्तान में दुनिया का कोई विशेष किस्म का पीनल कोड होगा जिसमें बच्चों द्वारा किए गये क्राइम की सजा पिता को देने का प्रावधान होगा। चतुर्थ- भ्रष्टाचार-निरोधक अदालत के जिस जज ने नवाज शरीफ को यह सजा सुनाई है, उसी अदालत के उसी जज ने आसिफ अली जरदारी के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के मामले (रेफरेंस) में जरदारी को यह कह कर बाइज्जत बरी कर गया कि उनके खिलाफ कोई दस्तावेजी सुबूत नहीं है। जबकि यही स्थिति नवाज शरीफ के संदर्भ में भी थी, फिर भी अदालत ने वकीलों के तर्कों की अनसुनी करते हुए नवाज शरीफ के लिए 10 साल की सजा मुकर्रर कर दी। एक ही कोर्ट, एक ही जज, एक ही जैसा मामला लेकिन सजा अलग-अलग। ऐसा क्यों? यह तो अननेचुरल और मैलाफाइड जस्टिस है।

नवाज को इस तरह से सलाखों के पीछे पहुंचाना यह बताता है कि अदालत नवाज शरीफ को सत्ता से इतना दूर रखना चाहती है कि नवाज की परछाईं भी 25 जुलाई को होने वाले चुनावों पर न पड़ सके। सवाल यह भी है कि अदालत ऐसा क्यों कर रही है? अब अदालत को तो सत्ता में रहना नहीं है। इसलिए अदालत अपने लिए ऐसे निर्णय तो सुना नहीं रही होगी। फिर बचा कौन जो अदालत के भी ऊपर है? पाकिस्तान की सेना या फिर डीप स्टेट (यानी सेना और आईएसआई) ही अदालत के ऊपर हो सकती है। अत: स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि नवाज शरीफ पाकिस्तानी सेना की नापसंदगी बन चुके हैं और निरन्तर इसमें वृद्धि हो रही है। फिर नवाज सत्ता में कैसे रह सकते हैं। वैसे भी सन् 1956 से लेकर नवाज शरीफ को मुशर्रफ द्वारा पदच्युत किए जाने तक के संदर्भों में गम्भीरता से निगाह डालें तो पाकिस्तान की न्यायपालिका की भूमिका को आप प्रत्येक मामले में संदिग्ध पाएंगे, फिर वह चाहे इस्कंदर मिर्जा का मामला हो, जनरल अयूब खान का मामला हो, जियाउलहक और जुल्फिकार अली भुट्टो का मामला हो अथवा परवेज मुशर्रफ एवं नवाज शरीफ का मामला हो, हर बार पाकिस्तान की न्यायपालिका पाकिस्तान की सेना के पक्ष में खड़ी दिखी। मतलब यह कि न्यायपालिका और सेना दोनों ही नवाज शरीफ को सत्ता में फिर से देखना नहीं चाहते। तो नवाज शरीफ के सामने विकल्प क्या हैं? अब उनके पास सिर्फ दो विकल्प दिख रहे हैं। पहला विकल्प यह है कि कि वे पाकिस्तान वापस आएं ही न, लंदन में ही रहें। लेकिन इससे उनका राजनीतिक करियर समाप्त हो जाएगा। दूसरा यह कि वे 13 जुलाई को पाकिस्तान आएं और गिरफ्तार होकर जेल से अपने कार्यकतार्ओं में ताकत भरें। दूसरे विकल्प में यह संभावना भी है कि वे चुनाव जीत जाएं और सत्ता पर अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण स्थापित करने में सफल रहें। वैसे यह मार्ग भी उनके लिए निष्कंटक नहीं है।

फिलहाल नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम का नाम राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (एनएबी) के अनुरोध पर एग्जिट कंट्रोल लिस्ट (ईसीएल) में डाल दिया गया है। इसका मललब यह हुआ कि वे अब देश में आ गये तो बाहर नहीं जा सकेंगे। अगर वे लंदन में रहते हैं तो भी करियर समाप्त और यदि पाकिस्तान वापस लौट आते हैं तो भी ऐसा हो सकता है कि वे न्यायपालिका व सेना के कुचक्र में फंस जाएं और कभी उनकी पकड़ से मुक्त ही न हो पाएं। अब देखना यह है कि नवाज शरीफ इस कुचक्र से बाहर निकल पाते हैं या नहीं? वे कुलसुम की बीमारी को लेकर निर्मित हुई संवेदनाओं को राजनीतिक लाभांशों में बदल पाएंगे या नहीं। बहरहाल नवाज के लिए एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाईं है। इमरान खान पाकिस्तान के डीप स्टेट के नये प्यादे हैं और उन्हें यह लग रहा है कि नवाज शरीफ जिस अनुपात में कमजोर होंगे, उसी अनुपात में इमरान खान सत्ता के करीब पहुंच जाएंगे। जो भी हो पर इसे देखकर यह तो स्पष्ट है कि माइनस नवाज, पाकिस्तान की राजनीति के मायने है सेना के गाइडेंस में चलने वाला गाइडेड लोकतंत्र। ऐसा इसलिए कि जरदारी और बिलावल भुट्टो का राजनीतिक कद बहुत छोटा है, इमरान खान राजनीति के बेहद अनिश्चित स्ट्रोक मास्टर हैं। इसलिए नवाज को सीखचों के पीछे भेजने का षडयंत्र लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश जैसा दिख रहा है। यह काम इस समय सेना और पाकिस्तान की न्यायपालिका दोनों मिलकर कर रहे हैं।

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