25 जुलाई को पाकिस्तान में संपन्न हुए आम चुनाव में नेशनल असेम्बली के लिए इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में तो उभरी, लेकिन पाकिस्तान की जनता ने उन्हें बहुमत नहीं दिया। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इमरान खान सरकार कैसे बनाएंगे और कैसे चलाएंगे? यह तो स्पष्ट है कि पाकिस्तान की सेना उनके पीछे खड़ी है या यूं कहें कि उनकी पॉलिटिकल बैटिंग के लिए पिच सेना ने ही तैयार की थी। लेकिन वे जिस रिफार्म और न्यू पाकिस्तान की बात करते हुए आए हैं, वह तो सेना और इमरान खान के हनीमून पीरिएड के बाद ही शुरू हो पाएगा। क्या इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि तब भी सेना और इमरान खान के बीच हनीमून जैसा प्यार बरकरार रहेगा या सेना पाकिस्तान के इतिहास को दोहराएगी? किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हमें पाकिस्तान के राजनीतिक दलों को हासिल सीटों तथा पाकिस्तानी संविधान में नेशनल एसेंबली के लिए की गयी सीटिंग व्यवस्था पर गौर करना जरूरी होगा। पाकिस्तान चुनाव आयोग द्वारा जारी अंतिम आंकड़ों के मुताबिक इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ को कुल 115 सीटें प्राप्त हुयी हैं, जबकि पाकिस्तान के संविधान के अनुसार किसी पार्टी को सरकार बनाने के लिए उसके पास कम से कम 137 सीटें होनी चाहिए। इस दृष्टि से प्रथमद्रष्टया इमरान खान साधारण बहुमत से 22 सीटें दूर है। लेकिन इस गणित में कई पेंच हैं, जिनको समझना जरूरी है। दरअसल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के कई नेता एक से अधिक सीटों पर विजयी हुए हैं। व्यवस्था के अनुसार वे केवल एक ही सीट पर बने रह सकेंगे।

पाकिस्तान में इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत से बहुत दूर है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान में सरकार इमरान खान बनाएंगे कैसे और चलाएंगे कैसे?

यही नहीं स्वयं इमरान खान पांच सीटों पर चुनाव जीते हैं और उन्हें चार सीटें छोड़नी होंगी। इस गणित के हिसाब से इमरान खान की पार्टी 109 सीटों या उससे भी नीचे पहुंच सकती है। यानी इमरान खान को कम से कम 28 या 30 सीटों की व्यवस्था करनी होगी। लेकिन एक सवाल यह भी है कि किसके साथ वे गठजोड़ करेंगे। उनके बाद दो बड़ी पार्टियां हैं जिनमें से एक नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) है जिसे 64 सीटें प्राप्त हुयी हैं और दूसरी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) है जिसे 43 सीटें मिली हैं। ये दोनों ही पार्टियां इमरान खान की धुर विरोधी हैं और इनकी रणनीति पीटीआई सरकार को संसद में कड़ी टक्कर देने की है। अब निर्दलीय बचे जिनके पास 13 सीटें हैं और इसके बाद कट्टरपंथी जमातें हैं, जैसे मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमल जिसके पास 12 सीटें हैं, मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू) है जिनके पास क्रमश: 6 और 4 सीटें हैं। इमरान खान को इनके साथ ही तालमेल करना होगा। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीटीआई नेता मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट-पाकिस्तान और कई निर्दलियों के संपर्क में हैं। यह भी सूचना है कि इन नेताओं ने सिंध के ग्रैंड डेमोक्रेटिक अलायंस (जीडीए) से भी समर्थन के लिए संपर्क किया है जिसके पास 2 सांसद हैं, लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि सिंध या ब्लूचिस्तान की लोकल पार्टियां पंजाबियों को आसानी से समर्थन देंगी, क्योंकि उनका टकराव इन्हीं के साथ है। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ अभी पीएमएल-कायदे आजम (पीएमएल-क्यू) और बलूचिस्तान आवामी पार्टी से भी समर्थन हासिल करने का प्रयास कर रही है लेकिन यदि इनका समर्थन मिल भी गया तो देखना यह होगा कि ये सेना के साए में बनी सरकार से कितने दिन तक जुड़ी रह पाएंगी। कुछ बातें और भी हैं। पहली यह कि पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली में कुछ और छोटी पार्टियां भी जीतकर आई हैं, जो किस तरफ जाएंगी, अभी तक इसका कोई संकेत नहीं मिल पा रहा है। अभी तो इमरान खान को कुछ और परीक्षाओं से गुजरना होगा। दरअसल पाकिस्तान के संविधान के अनुसार नेशनल असेंबली की सीटों पर जीतने वाले उम्मीदवारों के लिए जरूरी है कि चुनाव खर्च पर शपथ पत्र 10 दिनों के अंदर दाखिल करें, उसके बाद अधिसूचना जारी होगी जिसके बाद निर्दलियों को तीन दिन के अंदर किसी न किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल होना होगा। इसी दौरान नेशनल असेंबली में कुल सीटों के अनुपात से राजनीतिक पार्टियों की विशिष्ट सीटों पर महिलाओं और अल्पसंख्यक सदस्यों के नामों को अंतिम रूप दिया जाएगा। व्यवस्था के अनुसार, नेशनल असेंबली में महिलाओं के लिए 60 सीटें आरक्षित हैं जिनमें से 33 पंजाब से, 14 सिंध से, 9 खैबर पख्तूनख्वा से और चार बलूचिस्तान से शामिल होंगी। महिलाओं की सीटों के लिए कोटा तय किया गया है, जिसके अनुसार प्रत्येक साढ़े चार जनरल सीटों पर पर एक महिला सीट दी जाएगी। इस तरह से कुल संख्या के मामले में भी इमरान आनुपातिक रूप से ताकत हासिल नहीं करते दिख रहे।

अब दूसरा पक्ष यह है कि वे सरकार चलाएंगे कैसे? सवाल यह भी है कि यह तय इमरान खान करेंगे या फिर सेना? वैसे पाकिस्तान को जानने वाले यह जानते हैं कि पाकिस्तानी सेना विषय तय कर चुकी होगी, बस समय-समय पर उसे इमरान को निर्देश देना होगा कि वे उसके द्वारा बनायी गयी पिच पर कैसे खेलें। इसका मतलब यह हुआ कि इमरान खान स्वाभाविक खेल नहीं खेल पाएंगे। सामान्यतया पाकिस्तानी सेना वैदेशिक संबंधों के मामले में स्वयं निर्णय लेती है लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि वह आंतरिक मामलों में भी हस्तक्षेप करती है। यदि ऐसा न होता तो नवाज शरीफ जेल में नहीं होते। रही बात इमरान खान की तो वे कभी उदारवादियों के विरोधी दिखे, कभी सेना के। उदारवादियों के विरोध का तात्पर्य यह हुआ कि इमरान तालिबानी व्यवस्था के पक्षधर हैं। यह सेना को भी रास आना चाहिए। इमरान खान प्राय: तालिबान के प्रति सहानुभूतिपूर्ण विचार रखते रहे हैं इसलिए उनकी इस प्रवृत्ति को देखते हुए उनके आलोचक उन्हें तालिबान खान कहकर भी बुलाते हैं। उन्होंने चुनाव जीतने के बाद दिए गये अपने वक्तव्य में भी चरमपंथ और तालिबान से निपटने के लिए किसी योजना को सामने नहीं रखा। यही नहीं इमरान तो 2002 में ही एक बयान में यह कह चुके हैं कि वे तालिबान की न्याय व्यवस्था से बेहद प्रभावित हैं और अगर उनकी सरकार बनी तो वह भी वैसी ही शासन प्रक्रिया को अपनाएंगे। फिर आप अनुमान लगा सकते हैं कि उनकी शासन व्यवस्था के केन्द्र में कौन रहेगा और वह व्यवस्था कैसी होगी? इसका असर विदेश नीति पर पड़ना तय है, विशेषकर भारत के साथ संबंधों के संदर्भ में। पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों में कश्मीर सिंड्रोम पहले की तरह पाकिस्तानी बीमारी का हिस्सा बना रहेगा। इमरान खान ने औपचारिक तौर पर यह अवश्य कहा है कि उनके लिए यह बहुत अच्छा होगा अगर भारत से उनके रिश्ते बेहतर हो सकें। शांति के मुद्दे पर भी उनका कहना था कि अगर आप एक कदम आगे बढ़ाएंगे तो हम दो कदम आगे बढ़ाएंगे। वे काफी पहले अपने वक्तव्य में कह चुके हैं कि कश्मीर में शांति कायम करने का बस एक ही तरीका है कि कश्मीर के मामले में यूएन के प्रस्ताव का पालन करना चाहिए जिसके मुताबिक कश्मीरियों को जनमत संग्रह करने का अधिकार है। यानी कश्मीर मुद्दा हल नहीं हो पाएगा क्योंकि भारत जनमत संग्रह के विचार का समर्थन नहीं करता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर उनकी जो टिप्पणी थी वह यह साबित करती है कि मोदी सरकार के साथ वे तालमेल नहीं बिठा पाएंगे। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों उन्होंने कहा था कि मुुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी सरकार की नीति पाकिस्तान को अलग-थलग करना है।

चुनाव जीतने के बाद इमरान खान चीन की तरफ काफी झुके हुए दिखे। उन्होंने चीन के सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर) प्रोजेक्ट का समर्थन किया और यह बताने का प्रयास किया कि चीन सीपीईसी के माध्यम से पाकिस्तान को एक बड़ा अवसर दे रहा है जिससे पाकिस्तान नए निवेश आकर्षित करने में सफल हो सकता है। उनका कहना था कि हम चीन से सीखना चाहते हैं कि उसने कैसे 70 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला। चीन से हम जो दूसरी चीज सीख सकते हैं, वह है-भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जिसके तहत उसने अपने चार सौ मंत्रियों को गिरफ्तार किया और सजा सुनाई। अमेरिका के संबंध में उनका मानना है कि उसके साथ वे परस्पर लाभ के रिश्ते रखना चाहते हैं, अभी तक ऐसा ही रहा है। हालांकि वे यह स्पष्ट करने में असफल रहे कि उनके नेतृत्व में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच रिश्ते कैसे रहेंगे लेकिन वे अमेरिका की आतंकवाद विरोधी नीति और विशेषकर पाकिस्तान के कबायली इलाकों में ड्रोन हमलों का पुरजोर विरोध करते आए हैं। इस स्थिति में यह नहीं लगता कि डोनाल्ड ट्रंप शासन इमरान के साथ बेहतर संबंध बना पाएगा। इस बाहरी स्थिति के साथ ही आतंरिक चुनौतियां भी बनी रहेंगी क्योंकि सिंध और बलूचिस्तान में उनकी पार्टी की सरकार नहीं बनेगी। पंजाब में नवाज शरीफ की पार्टी नंबर एक पर है इसलिए अभी कुछ कहना मुश्किल है। चूंकि अभी सेना उनके साथ खड़ी है इसलिए स्थितियां उनके अनुकूल रहेंगी लेकिन यह हमेशा नहीं रहने वाला है।

फिलहाल इमरान खान ने 2016 में यह बयान दिया था कि यदि सेना नवाज शरीफ की सरकार का तख्तापलट कर दे तो वे खुशी मनाएंगे और मिठाई बांटेंगे। ऐसा कहने के पीछे वे नवाज शरीफ की राजशाही को कारण बताते थे जिससे उनकी नजर में लोकतंत्र खतरे में पड़ रहा था। लेकिन इमरान का रवैया तो स्वयं अय्यासी और भौतिकवादी है जिसके आरोप तो उनकी पूर्व पत्नियां लगा चुकी हैं। तब तो यह मानना भी उचित होगा कि इमरान स्वयं भविष्य में सेना के सरकार विरोधी प्रभाव व निर्णयों के लिए भी एक पटकथा लिख चुके हैं। अब देखना यह है कि पाकिस्तानी सेना के साथ उनका हनीमून पीरिएड कब तक चलता है।

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