साल 2018 अलविदा हो गया। बीते वर्ष में कर्नाटक के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर नजर डालें तो यह वर्ष कर्नाटक के लिए अच्छी-बुरी और खट्टी-मीठी यादों भरा रहा। सबसे पहले बात करें राजनीतिक घटनाक्रम की तो 224 सदस्यीय विधानसभा के लिए 12 मई को हुए चुनाव में त्रिसंकु विधानसभा बनी।

कोडागु जिला यहां का स्विट्जरलैंड के रूप में जाना जाता है। यह जिला कॉफी बागानों के अलावा पहाड़ी इलाकों, घने जंगलों और प्राकृतिक दृश्यों से समृद्ध है।

जिसमें भारतीय जनता पार्टी को सत्ता पाने से वंचित होना पड़ा। वहीं अन्य घटनाओं में भारी बारिश के कारण आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन से कई लोगों की मौत हो गई। इसके अलावा प्राकृतिक मनोरम से भरपूर कॉफी समृद्ध जिला कोडागु में भी लोगों को विस्थापित होना पड़ा। इसी तरह चामराजनगर जिले के एक मंदिर में प्रसाद के सेवन से कई लोगों की जान चली गई। कर्नाटक ने गुजरे साल में तीन राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व को भी खो दिए। बीजेपी के लोकप्रिय नेता केंद्रीय संसदीय मामलों, उर्वरक और रसायन मंत्री एचएन अनंतकुमार, कांग्रेस के बुजुर्ग नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सीके जाफर शरीफ, और फिल्म स्टार और पूर्व कैबिनेट मंत्री एमएच अंबरीश का भी निधन हो गया।
वीरशैव-लिंगायत समुदाय को अलग अल्पसंख्यक दर्जा देने की सिफारिश कर वर्ष की शुरुआत में ही सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की राज्य सरकार विवादों की एक श्रृंखला में शामिल हो गई। बाद में कांग्रेस ने पराजय के कई कारणों में एक कारण इसको भी माना। इस बीच, राज्य सरकार की ओर से टीपू जयंती के आयोजन के फैसले से किरकिरी हुई और यह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का मुद्दा बन गया। क्योंकि एचडी कुमारस्वामी ने चुनाव के पहले सरकार प्रायोजित जन्मदिन समारोह का जोरदार विरोध किया था। हालांकि बाद में विधानसभा भवन सौंध में हुए मुख्य कार्यक्रम के दौरान यू टर्न लेते हुए बीमार स्वास्थ्य की आड़ में उससे दूरी बना ली। मई 2018 में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम से बीजेपी को निराशा हाथ लगी और बहुमत के लिए जरूरी 113 के आंकड़े से कम महज 104 सीटें ही हासिल कर सकी। वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ कांग्रेस, जो वास्तव में केवल 78 सीटें पाकर सत्ता से बाहर हो गई थी, उसने भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए जनता दल सेक्युलर के साथ गठबंधन कर लिया। चुनावी नतीजे की एक और दिलचस्प बात यह रही कि 78 विधायकों वाली कांग्रेस पार्टी एचडी देवेगौड़ा के चरणों में नतमस्तक हो गई जबकि जेडीएस पार्टी के पास केवल 38 विधायक ही हैं।
हालांकि सत्ता की भूख के चलते दो विरोधियों का आपस में मिलना इतना आसान नहीं था। कोडागु जिला यहां के स्विट्जरलैंड के रूप में जाना जाता है। यह जिला कॉफी बागानों के अलावा पहाड़ी इलाकों, घने जंगलों और प्राकृतिक दृश्यों से समृद्ध है। इसके चलते इस जिले में वर्षभर पर्यटकों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। गौरतलब है कि पिछले साल कोडागु आने वाले पर्यटकों की संख्या जिले की आबादी की चार गुना के करीब थी। कोडागु की आबादी लगभग पांच लाख है। परिणामस्वरूप बुनियादी सुविधाएं जैसे होटल, रिसोर्ट सभी जगह विकसित हो रहे हैं। इस तरह इन अतिरिक्त आवासीय विस्तार ने इस क्षेत्र को एक विपरीत जटिल परिस्थितियों की दिशा में अग्रसर कर दिया है। अधिकृतरूप से केवल 400 स्थानों से कहीं अधिक लगभग 4000 हजार संवेदनशील स्थानों पर भूमि उपयोग से खतरा बढ़ गया है। इसी के चलते बीते सितंबर-अक्टूबर में भारी बारिश से सोमवारपेट और मदिकेरी तालुका की चार पंचायतों में सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। इसके अलावा बड़े पैमाने पर कॉफी बागान नष्ट हुए। इससे कॉफी उत्पादकों को बेघर होना पड़ा। वहीं बीते वर्ष की एक और घटना में मांड्या जिले के एक निजी स्कूल बस ड्राइवर की लापरवाही की वजह से हुई दुर्घटना में स्कूली बच्चों, महिलाओं समेत कई लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। जबकि एक अन्य घटना चामराजनगर जिले में घटित हुई। जिसमें एक स्वामी ने शक्ति और धन के लालच में प्रसाद में कीटनाशक मिलाकर 17 से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया। कावेरी और महादयी नदी के जल बंटवारे पर तमिलनाडु और गोवा जैसे पड़ोसी राज्यों के साथ कर्नाटक का संकट जारी रहा। लेकिन इन दोनों मुद्दों पर सबसे बड़ी राहत सुप्रीम कोर्ट और महादयी ट्रिब्यूनल के फैसले से मिली। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पूरे राज्य को लाभ हुआ क्योंकि जल बंटवारे में तमिलनाडु के भूजल स्तर को भी ध्यान में रखा गया।
इसी तरह महादयी नदी के जल बंटवारे पर बने ट्रिब्यूनल ने उत्तरी कर्नाटक के सूखा वाले जिलों में पीने के पानी के लिए महादयी नदी के जल को ले जाने का फैसला दिया। इसके साथ ही उत्तरी कर्नाटक क्षेत्र में विकास के प्रति राज्य सरकार की उदासीनता को लेकर भी काफी विरोध प्रदर्शन हुए। जबकि कुछ राजनेताओं और संगठनों ने इस मुद्दे पर एक अलग रुख अख्तियार करते हुए एक पृथक उत्तरी कर्नाटक राज्य की मांग कर डाली। वहीं साल 2018 में मानव निर्मित त्रासदियों में एक और तथ्य तब जुड़ा गया, जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मुख्यालय बेंगलुरु से लॉन्च जीसैट -6 ए उपग्रह को तकनीकि विफलता का सामना करना पड़ा।

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