जम्मू-कश्मीर विधानसभा भंग होने के बाद राज्य में सियासी हलचल तेज हो गई है। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस की मदद से सरकार बनाने का दावा पेश किया था। इसी बीच पीपुल्स कांफ्रेंस के चेयरमैन सज्जाद लोन ने भी बीजेपी के सहयोग से सरकार बनाने का दावा कर दिया। लेकिन राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने बड़े पैमाने पर विधायकों की खरीदफरोख्त होने की खबरों का उल्लेख करते हुए तथा ऐसी गतिविधियों को लोकतंत्र के लिए घातक और राजनीतिक माहौल को बिगाड़ने वाला बताते हुए विधानसभा को भंग कर दिया। राज्यपाल के इस फैसले से प्रदेश की पूरी सियासत ही बदल गई। 19 दिसम्बर को राज्य में राज्यपाल शासन के छह महीने पूरे हो रहे हैं, जिसके बाद यहां राष्ट्रपति शासन लागू हो जायेगा। विधानसभा भंग होते ही राज्य में सियासी जंग भी शुरू हो गई है। राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने अपने फैसले को सही बताते हुए कहा है कि जो दल विधानसभा भंग किए जाने से परेशान हैं, वे कुछ दिन पहले विधानसभा को भंग करने की मांग कर रहे थे। वे लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने के लिए निकाय व पंचायत चुनावों से दूर रहे, लेकिन जब इन्हें लगा कि कश्मीर की सियासत पर इनका कब्जा समाप्त हो रहा है, तो ये एक नापाक गठजोड़ कर सरकार बनाने के लिए सामने आ गए। अगर इन्हें सरकार बनाने का मौका दिया जाता, तो राज्य में सुरक्षा परिदृश्य बिगड़ता और अस्थिरता का माहौल पैदा होता। विधानसभा भंग होने के पहले पीडीपी 28 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी। इसके अलावा बीजेपी के 25, नेशनल कांफ्रेंस के 15, कांग्रेस के 12, पीपुल्स कांफ्रेंस के दो तथा पांच अन्य विधायक थे। स्पष्ट है कि किसी भी पार्टी के पास विधानसभा में बहुमत नहीं था। इसी वजह से चुनाव के बाद भी लंबे समय तक सरकार गठित नहीं हो सकी थी। बाद में बीजेपी और पीडीपी गठबंधन ने सरकार का गठन किया लेकिन ये सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। सरकार गिरने के बाद से ही राज्य में राज्यपाल शासन लगा हुआ है। विधानसभा के भंग होने के बाद अब यहां चुनाव होने की संभावना बन गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत के मुताबिक अगले छह महीने में जम्मू कश्मीर में चुनाव करा लिया जाना चाहिए। इस लिहाज से मई 2019 के पहले ही राज्य में चुनाव हो जाना चाहिए। फिलहाल राज्य में पंचायत चुनाव हो रहे हैं। आतंकवादियों की धमकी तथा अनुच्छेद 370 व 35 ए के मसले को लेकर राज्य की दो प्रमुख पार्टियां पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस ने स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों का बहिष्कार कर रखा है। इसकी वजह से निकाय चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। जम्मू व श्रीनगर नगर निगम में बीजेपी व उसके समर्थित पीपुल्स कांफ्रेंस के मेयर बन चुके हैं। अधिकतर नगर कमेटियों में भी बीजेपी व उसकी समर्थित पार्टी के ही अध्यक्ष बने हैं। साफ है कि पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस के चुनाव बहिष्कार की वजह से बीजेपी को राज्य में काफी फायदा हुआ है। माना जा रहा है कि स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों के बहिष्कार करने का निर्णय अब पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस को भारी पड़ता हुआ नजर आने लगा है। जानकारों के मुताबिक इन दोनों दलों को लगने लगा था कि चुनाव बहिष्कार के निर्णय की वजह से वे कहीं राज्य की राजनीति में अप्रासंगिक न हो जाएं। यही वजह है कि उन्होंने आनन-फानन में गठजोड़ कर अपनी सरकार बनाने और बीजेपी को राज्य की राजनीति से अलग-थलग करने की योजना बनाई थी।

अपने-अपने राज्यों में नायडू और ममता ने केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का निर्णय ले लिया है। उनका यह कदम भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत सीबीआई के मुकदमे की कार्रवाई के अधीक्षण का दायित्व केन्द्रीय सतर्कता आयोग को दिया गया है। सीबीआई को नकारने का अर्थ संसद द्वारा पारिजम्मू-कश्मीर विधानसभा को भंग करने को लेकर राज्यपाल पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस के निशाने पर हैं। लेकिन राज्य से जिस तरह विधायकों की खरीदफरोख्त् ा की खबरें आ रही थीं, उसके मद्देनजर यही सबसे अनुकूल फैसला लगता है।त इस कानून को भी नकारना है।केंद्र-राज्य संबंध और देश की एकता में बाधक तो नहीं बनेगा?

लेकिन उनकी योजना पीडीपी में बगावती सुर उठने और विधायकों की खरीद-फरोख्त की खबर के आम हो जाने की वजह से धराशायी हो गई और राज्यपाल ने भी राज्य के राजनीतिक हालात को देखते हुए विधानसभा को भंग करने का निर्णय ले लिया। यह ठीक है कि अब तमाम विरोधी दल राज्यपाल के इस निर्णय की आलोचना कर रहे हैं। महबूबा मुफ्ती ने राज्यपाल के फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि राज्य में पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस का ग्रैंड गठबंधन बन सकेगा। लेकिन इस गठबंधन ने जब सरकार बनाने का दावा किया तो उसकी प्रतिक्रिया में विधानसभा को भंग कर लोकतंत्र का गला घोंटने की कोशिश की गई। कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज ने भी इसे अलोकतांत्रिक फैसला बताते हुए इसके लिए केंद्र सरकार पर निशाना साधा। इसी तरह नेशनल कांफ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने भी विधानसभा भंग करने के फैसले को लेकर तल्ख टिप्पणी की। लेकिन इन तमाम टिप्पणियों पर कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने ये कहकर पानी फेर दिया कि उनकी जानकारी में महबूबा मुफ्ती को न तो कांग्रेस ने और न ही नेशनल कांफ्रेंस ने सरकार बनाने के लिए समर्थन पत्र सौंपा था। उनके मुताबिक इस गठबंधन के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए हमने बैठक बुलाई थी, अंतिम फैसला नहीं लिया था। स्पष्ट है कि महबूबा मुफ्ती ने महज गुलाम नबी आजाद की ओर से आए गठबंधन के सुझाव को ही आधार बनाते हुए राज्य में पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनाने का दावा कर दिया था। अब चूंकि विधानसभा चुनाव भंग हो जान की वजह से उनका ये दांव विफल हो गया है, तो वे झुंझलाहट में राज्यपाल के साथ ही केंद्र सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर कर रही हैं। जहां तक पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस की आलोचना करने की बात है तो इस पर राज्यपाल की ओर से भी स्पष्ट कर दिया गया है कि अगर उन्हें केंद्र सरकार के इशारे पर ही काम करना होता तो वे विधानसभा को भंग करने की जगह पीपुल्स कांफ्रेंस नेता सज्जाद लोन के दावे के मुताबिक उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते थे। लेकिन उन्होंने वही निर्णय लिया जो उन्हें जम्मू-कश्मीर तथा राज्य की जनता के हित में सबसे उचित लगा। बहरहाल, विधानसभा भंग होने के बाद राज्य में राजनीतिक हलचल तो तेज हो ही गई है। हर पार्टी राज्यपाल के फैसले के बाद आगे की रणनीति तैयार करने में जुट गई है, ताकि विधानसभा चुनाव होने की स्थिति में अधिक से अधिक फायदा उठाया जा सके।

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