राज्य की शीतकालीन राजधानी जम्मू में सरकार का दरबार सज चुका है। अगले छह महीने तक सचिवालय सहित अन्य कार्यालय यहीं से संचालित होंगे। इसके पहले श्रीनगर में 26 अक्तूबर को कामकाज बंद हो गया था। दरबार मूव की प्रक्रिया डोगरा शासक महाराजा रणबीर सिंह ने वर्ष 1872 में शुरू की थी। इसके तहत दरबार गर्मियों में छह माह के लिए कश्मीर में व सर्दियों में छह माह के लिए जम्मू में रहता था। महाराजा का काफिला अप्रैल में श्रीनगर रवाना होता था व अक्टूबर में वापसी होती थी। कश्मीर की दूरी को देखते हुए इस व्यवस्था को डोगरा शासकों ने वर्ष 1947 तक बदस्तूर जारी रखा। जब 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर का भारत में विलय हुआ तो राज्य सरकार ने भी इस व्यवस्था को जारी रखा, जिसकी वजह से लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी यह व्यवस्था आज भी जारी है। चूंकि दरबार को श्रीनगर ले जाना कश्मीर केंद्रित सरकारों को सूट करता था, इसलिए इस व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं लाया गया है। इस परंपरा को खत्म करने की लंबे समय से मांग उठती रही है। महत्वपूर्ण बात तो ये है कि दरबार मूव के चलते सचिवालय में डेढ़ से दो महीने का समय तो फाईलों को समेटने और उनको फिर से खोलने में ही लगता है। इसके बाद सरकारी छुट्टियों की भरमार होने के कारण भी काम के दिनों में कमी हो जाती है। और तो और पांच दिनों का सप्ताह होने के कारण भी सचिवालय का काम प्रभावित होता है। देखा जाए तो प्रायोगिक तौर पर कुल मिलाकर साल भर में छह महीने ही सिविल सचिवालय में काम हो पाता है। ऐसे में लोगों के लिए सचिवालय में अपना काम करवा पाना आसान नहीं होता। यही कारण है कि कई संगठन अब सिविल सचिवालय को दोनों राजधानियों में पूरे साल कार्यशील रखने की मांग करने लगे हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कश्मीर वालों के लिए जम्मू आना या फिर जम्मू वालों के लिए श्रीनगर जाकर अपना काम कराना काफी खर्चीला और परेशानी भरा होता है। दोनों जगहों पर सालभर काम होने से लोगों को सहजता तो होगी ही, दरबार मूव की वजह से सरकारी खजाने पर पड़ने वाला भार भी बच जायेगा। वित्तीय संकट का सामना कर रहे जम्मू कश्मीर में दरबार मूव पर सालाना 200 करोड़ रुपये का खर्च आता है। सुरक्षा खर्च मिलाकर इसका बजट तीन सौ करोड़ रुपये से भी अधिक हो जाता है। साल में दो बार सरकार का सारा रिकॉर्ड, राज्य सचिवालय के कर्मचारी शीतकालीन राजधानी जम्मू व ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर जाते हैं। ऐसे में उन्हें लाने और ले जाने, ठहराने आदि पर 200 करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। दरबार मूव के लिए स्थायी व्यवस्था करने पर भी अरबों रुपए खर्च हुए हैं। सचिवालय के रिकॉर्ड को ट्रकों में लाद कर साल में दो बार लाया और ले जाया जाता है। इसमें कई बार दस्तावेजों के गुम होने का भी खतरा रहता है और सामान का भी नुकसान होता है। विडंबना तो ये है कि कम्प्यूटर युग में भी फाइलों से भरे सैकड़ों ट्रंक जम्मू से श्रीनगर तथा श्रीनगर से जम्मू लाए जाते हैं। सचिवालय के कर्मचारियों, सुरक्षा अमले के सदस्यों को मिलाकर लगभग दस हजार सरकारी कर्मचारी, पुलिस कर्मी व पुलिस अधिकारी दरबार के साथ मूव करते हैं। सरकार का बड़ा खर्च कर्मचारियों को श्रीनगर में ठहराने व उनके खाने- पीने की व्यवस्था करने पर होता है। सरकारी आवासों के साथ दर्जनों होटलों को किराये पर लेकर कर्मचारियों को उनमें ठहराया जाता है। राज्य के खजाने पर भारी पड़ रही दरबार मूव की प्रक्रिया को बंद करने का मुद्दा काफी समय से उठता रहा है। पैंथर्स पार्टी के प्रधान बलवंत सिंह मनकोटिया का कहना है कि उच्च न्यायालय की तर्ज पर दरबार मूव करते हुए सिर्फ चीफ सेक्रेटरी व विभाग के सचिवों को ही कश्मीर भेजा जाना चाहिए और दोनों राजधानियों में स्थायी रूप से सचिवालय का काम चलते रहना चाहिए, ताकि काम बाधित न हो। इससे करोड़ों रुपये बचाए जा सकेंगे। मनकोटिया के मुताबिक महाराजा के जमाने में शुरू हुई इस प्रक्रिया की आज के जमाने में कोई जरूरत नहीं है। सारे विभाग कम्प्यूटर से जुड़े हुए हैं इसलिए काम आॅनलाइन भी हो सकता है। इसलिए सभी फाइलों को साल में दो बार इधर से उधर करने की प्रथा बंद की जानी चाहिए

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