देश की राजनीति में धर्म का घालमेल लंबे समय से होता रहा है। इसके लिए राजनीतिक पार्टियां धर्म का लबादा ओढ़कर जनता को गुमराह करने की कोशिश में रहती हैं। कई बार इसका लाभ भी मिलता है, कई बार यह दांव खाली चला जाता है। बावजूद, राजनेता इस अमोघ अस्त्र का संधान करने से चूकते नहीं हैं। वर्तमान समय में नगालैंड के विधानसभा चुनावों में धर्म की राजनीति का घालमेल पुरजोर तरीके से हो रहा है।

कहते हैं, खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। कुछ यही हालत नगालैंड के विधानसभा चुनावों में देखा जा रहा है। राजनीतिक जमीन गंवा चुकी कांग्रेस के साथ ही सत्ताधारी नेशनल पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) क्रिश्चियन बहुल राज्य नगालैंड में धर्म का कार्ड खेलकर भाजपा-एनडीपीपी गठबंधन को मात देने की कोशिशों में जुटी हुई हैं। हालांकि धर्म के इस कार्ड का सबसे अधिक उपयोग कांग्रेस पर लग रहा है, जबकि कांग्रेस यहां पर चौथे और पांचवें स्थान की लड़ाई लड़ रही है।

धर्म और राजनीति का मेल

भाजपा के चुनाव प्रभारी व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने एक चुनावी सभा में कहा कि धर्म और राजनीति को मिलाया जाना ठीक नहीं है। राजनीति मानव के भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए और विकास की गतिविधियों की जरूरत है, जबकि धर्म आंतरिक शांति के लिए एक आत्म मनन की प्रक्रिया है। रिजीजू ने साथ ही कहा कि कांग्रेस को पता है कि वे अपनी राजनीतिक जमीन को पूरी तरह से खो चुकी है। इसलिए वे भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा ईसाइयों की विरोधी है।

कुल मिलाकर नगालैंड में धर्म आधारित राजनीति पूरे जोर से क्रियान्वित है। वहीं राज्य की राजनीति और समाज पर पकड़ रखने वाले संगठन नगा होहो ने तो पूरी चुनावी प्रक्रिया को ही बाधित करने की कोशिश की। लेकिन उसका खेल बिगड़ गया। अब नगा होहो चर्च के जरिए मतदाताओं को बरगलाने की कोशिशों में जुटा हुआ है। बावजूद राज्य में भाजपा-एनडीपीपी गठबंधन तेजी से आगे बढ़ रही है। राज्य में कांग्रेस लड़ाई में नहीं है। ऐसे में चुनाव मुख्य रूप से दो ध्रुवों में बंट गया है। भाजपा-एनडीपीपी गठबंधन और एनपीएफ के बीच सीधा मुकाबला होता दिखाई दे रहा है।

कांग्रेस ने एनपीएफ के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन की हर नाकाम कोशिश की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। वहीं एनपीएफ व जद(यू) के बीच कुछ चुनावी खिचड़ी जरूर पक गई। नगालैंड के मुख्यमंत्री टीआर जेलियांग ने कहा है कि नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) ने आधिकारिक तौर पर एनपीएफ के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया है। जबकि जद(यू) के साथ भी समझौता हो चुका है। ऐसे में एनपीएफ अपनी साख को बचाने के लिए दो पार्टियों के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया है। उल्लेखनीय है कि यह गठबंधन नामांकन-पत्रों के दाखिले के बाद हुआ है। इस गठबंधन को इस तरह से देखा जा सकता है कि ये तीनों पार्टियां गठबंधन के अनुसार चुनावों के दौरान एक-दूसरे की मदद करेंगे।

इस बार के चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कांग्रेस के साथ कोई भी पार्टी जाने के लिए तैयार नहीं है। नगालैंड की जिस तरह की राजनीतिक विसात रही है, उससे यह साफ हो गया है कि चुनावों के बाद अगर सरकार बनाने में किसी भी पार्टी को कोई दिक्कत होती है, तो भाजपा, एनडीपीपी के अलावा एनपीएफ, एनपीपी आदि एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगा, लेकिन जिस तरह से सभी पार्टियों ने कांग्रेस से दूरी बनाई है, उसको देखते हुए यह कहने में गुरेज नहीं हो सकता है।

नगालैंड में जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ रहा है
वैसे-वैसे कांग्रेस अलग-थलग पड़ने लगी है। इसीलिए कांग्रेस
राज्य में अपना आखिरी कार्ड खेल रही है।

कांग्रेस हारी हुई बाजी चर्च के जरिए व स्थानीय सामाजिक संगठनों के जरिए जीतने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस को इस बार के विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों का भी टोटा पड़ गया। चर्च के पादरी जगह-जगह धर्म के नाम पर सभाएं कर लोगों से अपने एजेंडे के अनुरूप मतदान करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अब देखना होगा कि 27 फरवरी को जब मतदाता ईवीएम मशीन का बटन दबाते हैं, तो उस पर चर्च का कितना असर होता है। वहीं राज्य में सक्रिय आतंकी संगठन एनएससीएन के लगभग सभी धड़े अपने बल पर चुनाव को अपने मन-मुताबिक दिशा देने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। राज्य में आतंकी संगठनों का अच्छा प्रभाव है। चुनावों में इनकी उपस्थिति को नाकारा नहीं जा सकता है।

राजनीति के जानकारों का मानना है कि आतंकी संगठनों पर भी चर्च का पूरा प्रभाव है। लंबे समय से राजनीति की मलाई खा रहे तत्व यह नहीं चाहते हैं कि राज्य की राजनीति में भाजपा का बड़ा कद हो। वहीं भाजपा के नेता इस बात पर जोर देते हुए कह रहे हैं कि भाजपा नगा समाज के हितों की रक्षा के लिए काम करेगी। इसका सबूत इस बात के जरिए दे रहे हैं कि केंद्र में सरकार होने के बावजूद भाजपा ने अपने सहयोगी दल एनडीपीपी को 60 सदस्यीय नगालैंड विधानसभा की सीटों में से 40 सीटें छोड़ दीं। भाजपा सिर्फ 20 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है। यह फैसला नगा समाज के हितों को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

गठबंधन का बड़ा होता कद

नगालैंड विधानसभा चुनाव में भाजपा-एनडीपीपी गठबंधन का कद बड़ा होता दिख रहा है। इसका उदाहरण एनडीपीपी के अध्यक्ष व तीन बार के मुख्यमंत्री रहे नेफ्यू रियो के निर्विरोध चुनाव जीतने के तौर पर देखा जा सकता है। उनके मुकाबले में एनपीएफ का एक उम्मीदवार था, जिसने 12 फरवरी को अपना नामांकन वापस ले लिया। इससे राज्य में नेफ्यू रियो के कद का पता चलता है। उल्लेखनीय है कि नेफ्यू रियो राज्य में अभी तक एक भी चुनाव नहीं हारे हैं। नगालैंड चुनाव में जहां एनडीपीपी-भाजपा गठबंधन, एनपीएफ व एनपीपी का चुनाव प्रचार पूरे शबाब पर है, वहीं कांग्रेस के नेता चुनावी मैदान में दिखाई नहीं दे रहे हैं। कांग्रेस को पता कि उसकी चुनावी जमीन खिसक चुकी है। कांग्रेस के बड़े नेता ईसाई बहुल राज्य में कदम रखने से भी डर रहे हैं।

कुछ इसी तरह की स्थिति कांग्रेस की त्रिपुरा की भी है। असम के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व असम के तीन बार के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई ने सवालिया लहजे में पार्टी से पूछा कि त्रिपुरा में उनको एक दिन के प्रचार के लिए क्यों भेजा गया। जबकि एक भी केंद्रीय नेता चुनाव प्रचार में भाग लेने के लिए त्रिपुरा नहीं जा रहा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस त्रिपुरा को छोड़ चुकी है। यहां पर मुकाबला भाजपा व वामदलों के बीच ही हो रहा है।

राज्य में शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। चुनावकर्मियों को पोलिंग बूथों तक पहुंचाने के लिए पड़ोसी राज्य असम से भी काफी संख्या में वाहनों की मांग की गई है। वहीं सुरक्षा के मद्देनजर केंद्रीय अर्ध सैनिक बल की कंपनियां राज्य में पहुंच चुकी हैं। राज्य में आतंकी गड़बड़ी को देखते हुए पड़ोसी राज्यों की सीमाओं के साथ ही म्यांमार से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा पर विशेष चौकसी बरती जा रही है। असम से नगालैंड में प्रवेश करने वाले वाहनों की सीमाई इलाकों में विशेष रूप से तलाशी ली जा रही है, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी को समय से रोक दिया जाए।

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