राष्ट्रीय समर स्मारक में जाकर हम और हमारी आने वाली पीढि़यां इस बात को जान सकेंगी कि हम किसके बलिदान से सुरक्षित और महफूज हैं। राष्ट्रीय समर स्मारक ने सेना की गौरव गाथा एक स्थान पर दर्शाकर देशवासियों पर बड़ा उपकार किया है।

दे श की राजधानी में इंडिया गेट से सटे 40 एकड़ में फैला राष्ट्रीय समर स्मारक शहीदों की वीरता की दास्तां सहेजे हुए हैं। इंडिया गेट और अमर जवान ज्योति प्रथम विश्व युद्ध एवं अफगान युद्ध में शहीद हुए सिपाहियों के शौर्य गाथा को अपने में सहेजे हुए है। इंडिया गेट से शुरू होता राष्ट्रीय समर स्मारक ऐसा प्रतीत होता है, मानो समय के कालखंड में समाया हुआ एक एक शहीद समय के दूसरे कालखंड के शहीदों की अगवानी कर रहा है। समर का अर्थ निरंतर संघर्ष में रहना है और इस संघर्ष में बलिदान छुपा है। बलिदान वह जो खुद के लिए नहीं, दूसरों के लिए किया गया। बलिदान का अपना इतिहास रहा है। इस इतिहास पर गौरवान्वित होने का क्षण देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय समर स्मारक बनाकर देशवासियों को दिया। 176 करोड़ की लागत से तैयार 40 एकड़ में फैले इस विशाल प्रांगण में चार चक्र हैं। अमर चक्र, वीरता चक्र, त्याग चक्र, रक्षक चक्र है। वीरता चक्र वाले विंग में अमर जवान ज्योति के साथ तीनों सेना के झंडे अपनी पराक्रम और शौर्य गाथा का गान कर रहे हैं। इसका विस्तार थल, वायु और नौ सेना के पराक्रम को दर्शाते हुए छह कांस्यकी भित्ति चित्र भी हैं। जिनकी रचनात्मकता अपने अंदर शौर्य, बलिदान एवं इतिहास तीनों सहेजे हुए है। जिन्हें विख्यात कलाकार पद्म भूषण राम वंजी सुतार ने बनाया है। इन छह चित्रों में देश के महत्वपूर्ण युद्ध स्थल है। जहां पर हमारी सेना ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मनों को खदेड़ दिया। इन चित्रों में क्रमश: लोंगेवाला की लड़ाई जो 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान पश्चिमी सीमा पर लड़ी जाने वाली लड़कियों में से एक है। वहीं दूसरे भित्ति चित्र में गंगासागर की लड़ाई जो 1971 में ही पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में स्थित है। गंगासागर में एक भीषण लड़ाई लड़ी गई थी। तीसरे चित्र में तिथवाल की लड़ाई है, जिसमें भारत- पाकिस्तान युद्ध 1947-48 के दौरान जम्मू कश्मीर स्थित तिथवाल क्षेत्र में लड़ी गयी।

चौथे चित्र में रेजंगाला की लड़ाई, जो भारत-चीन युद्ध के दौरान 1962 में लद्दाख के सुदूर इलाके में ऊंची दुर्गम चोटी पर लड़ी गयी। पांचवे चित्र में आपरेशन मेघदूत की शौर्य गाथा को दशार्या गया है। यह भारत की उत्तरी सीमा के सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में लड़े जाने वाले युद्ध की कहानी को दर्शाता है। वहीं छठवां भित्ति चित्र 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान आॅपरेशन ट्राइडेंट को दशार्या गया है। वहीं त्याग चक्र विंग के 16 दीवारों पर 25,942 सैनिकों के नाम ग्रेनाइट पत्थर पर सुनहरे अक्षरों में अंकित है। इस स्मारक को बनाते हुए पर्यावरण का भी ध्यान रखा गया है। जगह-जगह घास के मैदान और पुराने पेड़ों को बिना क्षति पहुंचाए इस स्मारक का निर्माण हुआ है। जगह-जगह लाइटिंग और पानी के फव्वारे दृश्य को सुंदर बनाते हैं। स्मारक का प्रस्ताव 1960 में लाया गया था, लेकिन इसे फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 2012 में रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने इंडिया गेट पर इसे बनाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन सामाजिक कार्यकतार्ओं ने इस पर आपत्ति जताई थी। यह फिर न बन सका। प्रधानमंत्री मोदी ने इस स्मारक को बनाने का वादा किया था। इसे 2015 में कैबिनेट ने मंजूरी दे दी तथा कैबिनेट ने इसके लिए 500 करोड़ रुपये की भी व्यवस्था कर दी।

 

‘मेरे लिए सौभाग्य की बात’

राम वनजी सुतार देश के जाने-माने मूर्तिकार व शिल्पकार हैं। इन्होंने कई महापुरुषों की विशाल प्रतिमा बनाई हैं। हाल ही में इन्होंने राष्ट्रीय समर स्मारक में भी छह भित्ति चित्रों का निर्माण किया है। उनसे बातचीत के प्रमुख अंश यहां पढ

आप राष्ट्रीय समर स्मारक से कैसे जुड़े?
राष्ट्रीय समर स्मारक से जुड़ना मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। मुझे सरकार की तरफ से ही फोन आया और उन्होंने बताया कि हम इस तरह की एक राष्ट्रीय परियोजना पर कार्य कर रहे हैं। इस परियोजना की गंभीरता को बताते हुए मुझे भी इस परियोजना से जुड़ने का अवसर दिया। 

राष्ट्रीय समर स्मारक में आपका क्या काम है?
राष्ट्रीय समर स्मारक में मेरे द्वारा तैयार किए गए कांस्य के छह भित्ति चित्र हैं। जिन्हें वीरता चक्र विंग में लगाया गया है। यहां पर अलग-अलग समय एवं देश के अलग अलग हिस्से में हुए महत्वपूर्ण युद्धों को दशार्या गया है। इसके अंतर्गत लोंगेवाला की लड़ाई,गंगासागर की लड़ाई, तिथवाल कि लड़ाई, रेजंगाला की लड़ाई, आपरेशन मेघदूत, आॅपरेशन ट्राइडेंट को दशार्या गया है। 

युद्ध से जुड़े भित्ति चित्र को बनाने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
इन चित्रों को बनाते हुए दिमाग में सेना द्वारा लड़े गए युद्धों को लेकर एक काल्पनिक दृश्य था। दूसरी तरफ सेना के लोगों ने युद्ध के दौरान ली गई तस्वीरें मुझे उपलब्ध कराई गयी। उन्हें हमने देखा, फिर यह भित्ति चित्र बना सकें। 

राष्ट्रीय समर स्मारक से जुड़ कर आपको कैसा लग रहा है?
राष्ट्रीय समर स्मारक भारत की सेनाओं के बलिदान को दशार्ता है। मैंने दिल्ली में आने के बाद बहुत सी विभूतियों की मूर्तियां बनाई। जहां तक इस स्मारक की बात है, तो यह सरकार ने एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। इस पर हम सभी भारतवासियों को गौरवान्वित होना चाहिए। इसकी सराहना करनी चाहिए। मैं भी इसकी सराहना करता हूं।

2016 में इसके डिजाइन के लिए विश्व प्रतियोगिता रखी गई। 2017 में चेन्नई के वास्तुकार ने इस परियोजना की गरिमा को ध्यान में रखते हुए इसे अंतिम रूप प्रदान किया। यहां पर पर्यटन को ध्यान में रखते हुए बच्चों के लिए भी एक पार्क बनाया गया है। यह परिसर के दक्षिण में स्थित है। रक्षा मंत्री ने इसे देश का तीर्थ स्थल कहा है। जहां देश के लोग अपने सैनिकों को श्रद्धांजलि दे सकें। यहां परमवीर चक्र विजेताओं की प्रतिमा परम योद्धा स्थल में लगाई गई है। परमवीर चक्र सेना का सर्वोच्च सम्मान है। अभी तक सिर्फ 21 लोगों को ही मिला है। इसमें से तीन लोग जीवित हैं, जो इस स्मारक के उद्घाटन में आए। इनके नाम क्रमश: राइफलमैन संजय कुमार, नायक सूबेदार बन्ना सिंह, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव शामिल रहे। स्मारक पर बात करते हुए लांस नायक लक्ष्य सिन्हा ने बताया कि यह स्थल सेना के लिए मंदिर है। इसकी भव्यता शौर्य की कहानी कह रहा है।

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