छत्तीसगढ़ में चुनाव का माहौल गर्म हो चुका है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही राज्य की सत्ता पर काबिज होने के लिए अपनी ओर से पूरा जोर लगा रही हैं। इनके बीच एक मोर्चा छोटे पार्टियों के गठबंधन और अलग-अलग खड़ी छोटी पार्टियों का भी है। प्रदेश में अमूमन कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही सीधी लड़ाई होती रही है। अधिकांश सीटों पर बीजेपी और कांग्रेस के उम्मीदवार ही टकराते रहे हैं। इस बार के चुनाव में अजीत जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने बीएसपी और सीपीआई के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश की है। उनको लग रहा है कि ये मोर्चा छत्तीसगढ़ की राजनीति में नया इतिहास रच देगा। इसके साथ ही आम आदमी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, ट्राइबल पार्टी और समाजवादी पार्टी भी चुनाव मैदान में ताल ठोक रही हैं। निश्चित रूप से इन सभी छोटे दलों का अपना कुछ-कुछ जनाधार है और इनके उम्मीदवारों को भी कुछ वोट तो मिलेंगे ही। ऐसे में लाख टके का सवाल ये है कि ये छोटे दल किस पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाएंगे। इस चुनाव के पहले भी छत्तीसगढ़ में तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश होती रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रह चुके विद्याचरण शुक्ल की अगुवाई में एनसीपी ने2003 में राज्य की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। लेकिन चुनाव में पार्टी को कोई सफलता नहीं मिल सकी। लेकिन उन्होंने लगभग 7 फीसदी वोट खींचने में सफलता पाई थी। इसका असर ये हुआ कि राज्य की सत्ता बीजेपी के पास चली गई थी। इसी तरह बीजेपी के वरिष्ठ नेता ताराचंद साहू ने भी अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए स्वाभिमान मंच का गठन किया था। उन्होंने राज्य में अपने प्रत्याशी भी खड़े किए, लेकिन चुनाव में साफ हो गया कि बीजेपी के मतदाता स्वाभिमान मंच के पाले में जाने वाले नहीं हैं। साफ है की छोटी पार्टियां या गठबंधन बीजेपी और कांग्रेस को कभी भी मजबूत टक्कर देने में सफल नहीं रहे। हां, इनके काटे वोटों की बदौलत उनकी मूल पार्टी को नुकसान जरूर हुआ। इस बार भी अजीत जोगी ने मायावती और सीपीआई के साथ मिलकर जो गठबंधन बनाया है, वो माना जा रहा है कि मुख्य रूप से कांग्रेस के वोट बैंक में ही सेंध लगाएगा। आम आदमी पार्टी भी प्रदेश की सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वहीं गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन करके अपना अलग कोण बनाने की कोशिश की है। इसी तरह से ट्राइबल पार्टी ने चुनाव लड़ने की घोषणा करके राज्य के जनजाति बहुल क्षेत्रों में सफलता पाने की नीति बनाई है। पार्टी को उम्मीद है कि उसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकार से नाराज मतदाताओं का समर्थन मिल जाएगा, जिसके बल पर वो अपने कुछ उम्मीदवारों को विधानसभा में भेजने में सफल हो जाएगी। इन पार्टियों के अलावा अन्य राज्यों में मजबूत जनाधार रखने वाली शिवसेना और जेडीयू जैसी पार्टियां भी चुनाव मैदान में ताल ठोक रही हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि इन दोनों ही पार्टियों का छत्तीसगढ़ ें कोई खास जनाधार नहीं है और इनके उम्मीदवार वोटकटवा की भूमिका ही निभाएंगे। कांग्रेस को उम्मीद है कि वह एंटी एस्टेब्लिशमेंट वोट के बल पर इस बार राज्य की सत्ता पर काबिज होने में सफल हो जाएगी। उसका जोर भी बीजेपी से नाराज लोगों को अपने पाले में खींचने का है, लेकिन जानकारों का मानना है कि चुनाव मैदान में अजीत जोगी के गठबंधन तथा गोंडवाना पार्टी और ट्राइबल पार्टी की चुनौती की वजह से बीजेपी से नाराज लोगों के वोटों में बंटवारा हो सकता है। जिसका नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ेगा। आमतौर पर सीधा मुकाबला होने की स्थिति में सरकार से नाराज लोग विरोधी पार्टी के पक्ष में खुलकर मतदान करते हैं, लेकिन इस बार अधिकांश सीटों पर आमने सामने का मुकाबला होने की जगह त्रिकोणीय मुकाबला होने के आसार हैं। ऐसे में सरकार विरोधी वोट कांग्रेस और अजीत जोगी के गठबंधन के बीच बंट सकते हैं। कांग्रेस की एक बड़ी परेशानी ये भी है कि उसके लिए अपने पुराने वोट बैंक को संभालना अजीत जोगी गठबंधन के कारण थोड़ा कठिन हो गया है। जोगी कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं और राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। उनके समर्थक भी पहले कांग्रेसी मतदाता ही रहे हैं। कांग्रेस के वोट बैंक में एक बड़ी हिस्सेदारी राज्य के ईसाई मतदाताओं की भी रही है। लेकिन इन मतदाताओं पर अजीत जोगी की भी अच्छी पकड़ मानी जाती है। ऐसे में माना जा रहा है कि अजीत जोगी को जितने भी वोट मिलेंगे, वे कांग्रेस के आधार को ही कमजोर करेंगे। ऐसा होने से कांग्रेस की स्थिति कमजोर हो सकती है और राज्य की सत्ता में आने का उसका सपना टूट भी सकता है। इसी तरह आम आदमी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, ट्राइबल पार्टी तथा समाजवादी पार्टी को मिलने वाले वोट भी परोक्ष रूप से कांग्रेस की संभावना को ही धूमिल करेंगे। हालांकि कांग्रेस के नेता इस आकलन से सहमत नहीं हैं। पीसीसी चीफ भूपेश बघेल का कहना है कि कांग्रेस इस बार सत्ता विरोधी वोटों के बल पर आसानी से सरकार बनाने में सफल रहेगी, क्योंकि राज्य की जनता पिछले 15 सालों से बीजेपी सरकार की उपेक्षा का शिकार हो रही है। उनके मुताबिक बीजेपी विरोधी वोट बंटने की जगह कांग्रेस के पक्ष में ही आएंगे। वहीं आम आदमी पार्टी भी दावा कर रही है कि सरकार के कामकाज को लेकर लोगों के मन में उपजी नाराजगी का फायदा उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को मिलेगा और छत्तीसगढ़ में भी पार्टी को दिल्ली जैसी ही सफलता मिल सकती है।

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