लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ 40 सीट वाले बिहार में राजग के घटक दलों में खींचतान फिर तेज हो गई है। केन्द्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेन्द्र प्रसाद कुशवाहा की अगुवाई वाली रालोसपा असहज महसूस कर रही है। उपेन्द्र कुशवाहा संकेत दे रहे हैं कि राजग में उन्हें जदयू की तुलना में कमतर आंकना सही नहीं है। नागमणि तो रालोसपा को राजग छोड़ने के लिए विवश करने का खुला आरोप लगा रहे हैं। उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाले जदयू को राजग में विशेष तरजीह मिल रही है। नीतीश राजग की चुनावी वैतरणी पार लगाने में मददगार नहीं होंगे। उनका कहना है कि बिहार में नीतीश कुमार जिस बिरादरी से आते हैं उससे कहीं अधिक कुशवाहा जाति की बिरादरी है। उपेन्द्र ने कुशवाहा ने पैगाम ए खीर कार्यक्रम के बहाने चुनावी शंखनाद किया है। उन्होंने कहा कि खीर बनाने में यदुवंशियों से दूध लिया। कुशवंसियों से चावल। ब्राह्मण सहित उच्च वर्ग से चीनी। अन्य पिछड़ी जातियों से पंचमेवा और दलित से मिलवाया तुलसी दल। फिर मुसलमान की दस्तरखान पर बैठकर हम सबने खीर खाई। पूरे समाज की एकजुटता के संदेश के साथ कुशवाहा खीर बनाने के बहाने सियासी राजनीति की खिंचड़ी पकाने के भी संदेश दे रहे हैं। राजग में नीतीश की वापसी के बाद कुशवाहा की राजनीति असहज हो गयी है। वे बिहार में मुख्यमंत्री पद के भावी उम्मीदवार हैं पर अभी तो उन्हें लोकसभा की चुनावी वैतरणी पार लगानी है। इसके लिए वह राजग में ही रहेंगे या लालू के साथ जायेंगें, इस सीधे सवाल पर उपेन्द्र कुशवाहा जवाब देने से इंकार करते हैं।

सीट बंटवारे को लेकर गठबंधन के घटक दलों में खींचतान जारी है। कभी खीर बनाने तो कभी खिचड़ी पकाने की चर्चा से राजनीति अभी से जोड़तोड़ का संकेत भी दे रही है।

उपेन्द्र बनाम नीतीश

कहते हैं कि राजनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही दुश्मन। बिहार में उपेन्द्र कुशवाहा की राजनीति चमकाने का श्रेय भी नीतीश कुमार को ही जाता है। पहली बार विधायक बने उपेन्द्र कुशवाहा को नीतीश कुमार ने सुशील कुमार मोदी की जगह विधानसभा में विपक्ष के नेता की कुर्सी पर बैठाया था। तब पार्टी में उमाशंकर सिंह सरीखे नेता की अनदेखी लोगों को खली थी। नीतीश कुमार से अलग होने के बाद जब फिर साथ हुए तो लव-कुश सामाजिक समीकरण के तहत उपेन्द्र कुशवाहा को राज्यसभा में भेज दिया। राज्यसभा की सदस्यता छोड़ नीतीश के खिलाफ उपेन्द्र कुशवाहा भाजपा के साथ हो गये। लोकसभा के पिछले चुनाव में तीन सीटों के लिए लड़े और तीनों पर जीत मिली। तब मुख्यमंत्री रहते नीतीश लोकसभा की दो ही सीट जीत पाये थे। बिहार के राजनीतिक घटनाक्रम में नीतीश की राजग में वापसी के बाद उपेन्द्र कुशवाहा असहज हैं। केन्द्र में शिक्षा मंत्री रहते वे बिहार में शिक्षा की दुर्दशा के खिलाफ पार्टी की ओर से अभियान चलाकर परोक्ष रूप से नीतीश कुमार पर हमला बोलते रहे हैं। इधर बिहार में अपराध की कई घटनाओें को लेकर विपक्ष नीतीश के सुशासन के दावे की बखिया उधेड़ रहा है। वहीं सहयोगी होने के बावजूद उपेन्द्र कुशवाहा भी कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाकर सरकार की राजनीतिक परेशानी बढ़ा रहे हैं।

भाजपा की चुप्पी

उपेन्द्र कुशवाहा की राजनीति और उसके बयान पर जहां जदयू हमलावर रहा है तो लोजपा तटस्थ रही है। भाजपा भी चुप्पी साधी रही है। बिहार सरकार में रालोसपा के विधायक रहते उसकी साझेदारी नहीं है। लोजपा अध्यक्ष एवं केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान के भाई पशुपति पारस को पहले किसी सदन का सदस्य नहीं होने के बावजूद मंत्री बनाया गया था। बाद में राज्यपाल के मनोनयन कोटे से वे विधान परिषद के सदस्य भी बना दिये गये। सियासी गलियारे में चर्चा रही है कि भाजपा कुशवाहा को छोड़ना नहीं चाहती है। हम के अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की तरह यदि उपेन्द्र कुशवाहा भी लालू के साथ खुद चले जाते हैं तो बात अलग होगी। हाल में भाजपा ने कुशवाहा समाज को संदेश देने के लिए पूर्व मंत्री सम्राट चौधरी को प्रदेश उपाध्यक्ष का दायित्व सौंपा है। सम्राट खगड़यिा से लोकसभा के टिकट के दावेदार हैं। सम्राट ने खीर बनाने की राजनीति पर चुटकी ली है कि हमारी बिरादरी तो कड़ी मेहनत कर हरी सब्जी पैदा करने वालों की है। हम तो लोगों को हरी सब्जी खिलाकर स्वास्थ्य बढ़ाने वाले हैं। बिहार में राजग पहले से ज्यादा स्वास्थ दिखेगा ।

सवाल सीट बंटवारे का

एक तरफ राजद को उपेन्द्र कुशवाहा का साथ मिलने की उम्मीद है। लोकसभा के आसन्न चुनाव में बिहार में विपक्षी दलों को अच्छे दिन आने की उम्मीद बंधी है। वहीं बिहार में एक ओर नरेन्द्र मोदी एवं नीतीश का चेहरा होगा तो दूसरी ओर जेल में सजा काट रहे लालू का चेहरा होगा। यादव-मुस्लिम के सामाजिक समीकरण के साथ राजद उपेन्द्र कुशवाहा को साथ लेकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश में है। जीतन राम मांझी का साथ मिलने से उन्हें दलितों का समर्थन मिलने की उम्मीद बंधी है। राजद के उपाध्यक्ष डा.रघुवंश प्रसाद सिंह लगातार दावा करते रहे हैं कि उपेन्द्र कुशवाहा का राजग छोड़ राजद के साथ आना तय है। राजद में उन्हें हिस्सेदारी मिलेगी।

बिहार में राजग के घटक दलों के बीच 20-20 के फार्मूले पर सीट बंटवारा होने की चर्चा है। भाजपा लोकसभा की 22 सीटें जीती हुई है। जदयू के विधानसभा में 70 विधायकों के संख्या बल के आधार पर उसकी लोकसभा में 12 सीटों की दावेदारी बनती है। लोजपा पिछले चुनाव में सात सीटों के लिए लड़ी और छह सीटें जीती थी। नीतीश के गृह जिला नालंदा में लोजपा से कांटे के मुकाबले में जदयू ने अपनी प्रतिष्ठा बचाई थी। इस बार के चुनाव में लोजपा की जीती हुई  मुंगेर सीट पर जदयू की विशेष नजर है। जल संसाधन मंत्री ललन सिंह मुंगेर से चुनाव लड़ने की तैयारी में है। हाल के महीनों में नीतीश-राम विलास पासवान की कई मुलाकातों से दोनों के बीच नजदीकी बढ़ी है। ऐसे में जदयू के लिए मुंगेर सीट छोड़ने पर लोजपा राजी हो जाये तो कोई अचरज की बात नहीं होगी। राजग के घटक दलों के बीच सीटों के बंटवारे के साथ कई सीटों की अदला-बदली और कई सिटिंग सांसदों के बेटिकट होने के प्रबल आसार हैं। सीट बंटवारे पर पिछले सप्ताह नयी दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से नीतीश कुमार की बातचीत हुई है। जदयू की ओर से आगे बातचीत करने के लिए चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार ने लगाया है। प्रशांत किशोर ने भी भाजपा अध्यक्ष से बातचीत की है। संभावना है कि सीट बंटवारे में भाजपा 20 सीटों पर खुद लड़े और शेष 20 सीटों में जदयू 12, लोजपा 5 और रालोसपा 3 सीट लड़े। जदयू को तालमेल में झारखंड और यूपी में भी एक-एक सीट मिलने की चर्चा है। बंटवारे की यह तस्वीर दिसम्बर-जनवरी के पहले साफ होने की उम्मीद नहीं है। परंतु राजग में खीर बनाने और खिचड़ी पकाने की चल रही राजनीति अभी से जोड़तोड़ का संकेत दे रही है।

Previous articleदो साल तक मनेगा गांधी जन्मोत्सव
Next articleयौन अपराधियों की तैयार होगी कुंडली
अस्सी के दशक में इन्होंने हिन्दुस्थान समाचार से अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत की। उसके बाद दैनिक आज में उप संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान में मुख्य संवाददाता व प्रधान संवाददाता, राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो प्रमुख एवं विशेष संवाददाता और दैनिक भास्कर में ब्यूरो प्रमुख एवं राजनीतिक संपादक के पद पर कार्य कर चुके हैं। दैनिक भास्कर से सेवानिवृत्त होने के बाद मार्च, 2017 से हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी से राजनीतिक संपादक के रूप में जुड़े हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here