त्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए एक ओर ‘मी टू’ कैंपेन चल रहा है। जिसकी आंच हॉलीवुड से निकलकर बॉलीवुड के रास्ते राजनीतिक गलियारे तक पहुंच रही है। वहीं दूसरी तरफ उत्तरी बिहार के सुपौल जिले के त्रिवेणीगंज में उत्पीड़न के खिलाफ जुबान खोलने की नाबालिग छात्राओं को सजा मिल रही है। त्रिवेणीगंज की बच्चियां दहशत में हैं। उनके दिलों दिमाग पर लगा यह आघात शायद हमेशा के लिए अपना निशान छोड़ जाएगा।

उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने के लिए छात्राओं पर हमला होना प्रशासन और सरकार की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। यह कोई मामूली घटना नहीं है बल्कि समाज में आयी विकृति का परिणाम है।

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ‘मी टू’ कैंपेन से खुश हैं। वह खुश हैं कि इससे महिलाओं को सामने आकर शिकायत करने का हौसला मिला है। पर क्या इसी हौसले की बदौलत अपनी जुबान खोलने के लिए त्रिवेणीगंज की बच्चियों को जो सजा मिली है, उससे मेनका गांधी खुश हो सकती हैं? मेनका गांधी ने आपराधिक दंड प्रक्रिया की धारा 468 के तहत बाल यौन उत्पीड़न की घटना की सूचना देने की समय अवधि में परिवर्तन के लिए कानून मंत्रालय को लिखा है। मेनका गांधी यह मानती हैं कि ‘जिसने उत्पीड़न किया है उसे पीड़िता कभी भूल नहीं सकती।’

सच में, कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय की नाबालिक छात्राएं आज भी दहशत में हैं और ताउम्र अपने ऊपर हुए हमले को भूल भी नहीं पाएंगी। दहशत इसलिए भी है कि उनकी अस्मिता पर हमला करने वाले उनके इर्द-गिर्द ही हैं, जिनसे से उनका हमेशा सामना होता रहेगा। बच्चियां ही नहीं,उनके परिवार वालों को भी एक अनजाना भय सता रहा है। किसी तरह की कोई कार्रवाई होने के बाद हमलावर यदि छूटते हैं या बाहर निकलते हैं तो आसपास होने की वजह से वह उनसे किसी भी रूप में बदला ले सकते हैं।

इन बिंदुओं के विश्लेषण से पहले त्रिवेणीगंज की घटना जानना जरूरी है। दरअसल सुपौल से लगभग 40 किलोमीटर दूर डरपखा गांव में कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय है, जिसे एक एनजीओ संचालित कर रहा है। वहां छात्रावास में रहने वाली छात्राओं के साथ अश्लील हरकतें पास के ही विद्यालय के लड़के किया करते थे। स्कूल की दीवार पर अभद्र टिप्पणियां लिखना, अश्लील इशारे करना यह सब बदस्तूर जारी था। ऐसा नहीं कि इसकी जानकारी स्कूल प्रशासन को नहीं थी। 100 छात्राओं के इस स्कूल में एक टीचर, एक हेड मास्टर एक वार्डन और एक लाठी धारी नाइट गार्ड सभी इससे वाकिफ थे, पर अपनी सभी आंखें बंद कर रखे थे।

लड़कों की इसी अश्लीलता का 6 अक्टूबर शनिवार की शाम लगभग साढ़े चार बजे डरपखा मिडिल स्कूल के खेल परिसर में ही बच्चियों ने विरोध किया। कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की छात्राएं संध्या के समय खेलने के लिए पास में स्थित विद्यालय डरपखा के मैदान में गई थीं। विद्यालय के आसपास के घर के कुछ लड़के भी वहीं विद्यालय से सटे हुए खुले मैदान में खेल रहे थे। उसी दौरान छह-सात लड़कों ने दीवार पर अभद्र टिप्पणी लिखी। मनचलों की इस तरह की आदतों से परेशान बच्चियों ने छींटाकशी और अभद्र व्यवहार का विरोध किया, जिसके बाद उनके बीच हाथापाई हुई। यही विरोध न तो लड़कों को बर्दाश्त हुआ और न ही उनके परिजनों को। दो घंटे के भीतर लाठी डंडों से लैस लड़के अपने अभिभावकों के साथ खेल के मैदान में ही धावा बोल कर छात्राओं पर टूट पड़े। अपने छात्रावास में जान बचाकर भागी लड़कियों पर लड़के और गांव वालों ने वहां भी जबरन घुसकर उनकी पिटाई की और उनके साथ बदसलूकी की।

छह अक्टूबर की शाम डपरखा कस्तूरबा आवासीय स्कूल में छठी से आठवीं क्लास तक की छात्राओं के साथ जो कुछ हुआ, उसे बयान किया है इसी स्कूल की 12 वर्षीय सातवीं कक्षा की एक छात्रा ने। बच्ची ने बताया कि उस शाम खेल के मैदान में जब वह अपनी सहेली के साथ थी कि फिर से दो लड़के आ धमके। पढ़ाई के बाद शाम को स्कूल कैंपस में खेलने जाना रोज की दिनचर्या थी लेकिन कुछ दिनों से लड़कों का हर दिन दीवारों पर अपशब्द लिखना मानो उनकी आदत बन गयी थी। उस दिन भी नोंकझोंक के बाद झगड़ा हो गया और बच्चियां अपने विद्यालय आ गईं। कुछ समय बाद अचानक कई लोगों ने हमला कर सबके साथ मारपीट की।

बच्चियों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाने के दौरान प्रशासन को सूचना मिली और तब मामले का खुलासा हुआ। 34घायल बच्चियों में से चार की हालत गंभीर थी। जिन्हें दूसरे अस्पताल भेजा गया। सभी 34 छात्राओं को इलाज के बाद विद्यालय वापस भेज दिया गया है। स्कूल की वार्डन रीभा राज के आवेदन पर एफआईआर दर्ज हुआ है। आनन-फानन में जिलाधिकारी बैद्यनाथ यादव ने संज्ञान लिया और 10 लोगों की गिरफ्तारी हुई।

सरकार और प्रशासन की खूब किरकिरी हुई। वहीं राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर राजनीति भी की। गौरतलब है कि बच्चियां और हमलावर दोनों अनुसूचित जाति के हैं। इस घटना के पीछे बड़ी प्रशासनिक लापरवाही सामने आयी है। जिस छात्रावास में सौकड़ों बच्चियां रह रही हों उसकी सुरक्षा सिर्फ एक गार्ड के भरोसे हो वही भी दिन में नदारद। यह भी गौर करने वाली बात है कि स्कूलों की बच्चियां कुछ हद तक कमजोर और कुपोषण का शिकार पयी गयीं हैं।

हालांकि घटना के बाद प्रशासन की नींद टूटी। वहां दंडाधिकारी और पुलिस बल की विशेष प्रतिनियुक्ति की गई। जोनल आई जी पंकज दराद ने भी दौरा किया। बिहार शिक्षा परियोजा के निदेशक संजय सिंह ने स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों के साथ बैठक की। निर्णय हुआ कि स्कूल की चहारदीवारी को ऊंचा किया जाए और सभी कस्तूरबा विद्यालयों में सीसीटीवी लगाया जाए।

सुपौल के त्रिवेणीगंज की इस घटना को सुप्रीम कोर्ट ने भी गंभीरता से लिया और कहा कि यौन उत्पीड़न एवं मारपीट का यह मामला चिंता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘अखबारों में प्रकाशित सभी खबरें अच्छी नहीं हैं- ‘लड़की का कंकाल बरामद हुआ है, छेड़खानी से खुद को बचाने की कोशिश करने पर 34 लड़कियों को पीटा गया। सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों के साथ-साथ आरोपित किशोरों के उचित मनोवैज्ञानिक पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए एक राष्ट्रीय संस्थान स्थापित करने का सुझाव दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के चिंता प्रकट करने के बाद विधिक सेवा ने मामले को संज्ञान में लेते हुए त्रिवेणीगंज की घटना की जांच के लिए दो सदस्यीय कमेटी का गठन किया। इस कमेटी की एक सदस्या स्थानीय त्रिवेणीगंज की हैं। इसके चलते सम्भवत: बेबाकी से अपनी रिपोर्ट देने में उन्हें भी हिचकिचाहट हुई। यह भी नोट करने वाली बात है कि इस स्कूल के संचालकर्ता एनजीओ और हमलावर दोनों स्थानीय हैं।

केंद्र सरकार के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान पर त्रिवेणीगंज की घटना एक बदनुमा दाग है। बचियां पढ़ने के प्रति काफी जागरूक हैं और गम्भीर भी, किन्तु इस मिशन में उनके साथ हर स्तर पर लापरवाही सामने आना चिंता का विषय है। मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड से इस कांड को थोड़ा अलग माना जा सकता है। जहां मुजफ्फरपुर कांड संस्थागत भ्रष्टाचार और राजनीति तथा सत्ता में आई विकृति का प्रतीक है, वहीं त्रिवेणीगंज की यह घटना समाज में आई विकृति का परिणाम है।

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