लोकसभा का चुनाव नजदीक आता देख 40 सीट वाले बिहार में राजनीतिक समीकरण बनाने, सीटों के बंटवारे और तालमेल के लिए विमर्श और बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया है। दूसरी ओर रैली, महारैली, सम्मेलन, महासम्मेलन के साथ महापुरुषों की जयंती के बहाने विभिन्न जाति समूहों को साधने का अभियान भी तेज है। राजधानी पटना में रैलियों और रैली कर विभिन्न दलों के नेताओं को एक मंच पर लाने की पहल की है। वहीं जहांनाबाद के सांसद अरुण कुमार ने गांव बचाओ, देश बचाओ महारैली कर अपनी ताकत दिखाने की ठानी है। जिलों में नेताओं की यात्रा और जाति समूहों के सम्मेलनों का दौर तेजी से चल रहा है। इस क्रम में पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में सीपीआई ने बीजेपी भगाओ, देश बचाओ चुनावी वर्ष होने के कारण दिवंगत राजनेताओं को समारोहपूर्वक याद करने के बहाने कोई राजपूत, कोई भूमिहार, कोई कायस्थ समाज को गोलबंद कर रहा है, तो कोई दलित-महादलित सम्मेलन और अति पिछड़ा सम्मेलन कर उनका हमदर्द होने का संदेश दे रहा है। कांग्रेस ने राहुल गांधी की अगुवाई में 3 फरवरी को पटना में बीजेपी विरोधी दलों को एक मंच पर लाने की घोषणा की है।

अति पिछड़ों की राजनीति

बिहार में अभी राजद और जदयू के बीच अति पिछड़ों को गोलबंद करने की स्पर्धा हो रही है। आकलन है कि 34 प्रतिशत अति पिछड़ी जातियों की आबादी को साधने से बिहार का चुनावी परिदृश्य बदला जा सकता है। जदयू महासचिव आरसीपी सिंह जिलों में अति पिछड़ों को गोलबंद करने का अभियान चला चुके हैं। अब जदयू अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिलों में दलित-महादलित सम्मेलनों के संबोधन का अभियान शरू कर दिया है।

भूमिहारों को साधने की कोशिश

बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की जयंती समारोह के बहाने कांग्रेस नेताओं की ओर से भूमिहार समाज को पटना से दिल्ली तक ठगने का आरोप के साथ आसन्न चुनाव में राजग को सबक सिखाने का आह्वान किया गया। वहीं गांधी मैदान में बीजेपी नेताओं की ओर से श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित श्रीबाबू जयंती समारोह में लालू-राबड़ी के 15 वर्षों के शासन में विभिन्न नरसंहारों की याद दिलाकर भूमिहार समाज को राजद की शह पर कांग्रेस नेताओं द्वारा बांटने की साजिश के प्रति सावधान किया गया है। इस समारोह में उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने खुलकर कहा कि आप मेरी चिंता कीजिए और मैं आपकी चिंता करूंगा।

नेताओं के जातीय आधार

बिहार के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में जातीयता की गहरी पैठ होने के कारण कुछेक चुनावों के अपवाद छोड़ दें, तो आमतौर पर सभी में ज्वलंत मुद्दे और जन समस्याएं गौण रही हैं। मतदाताओं की जातीय गोलबंदी के ही आधार पर चुनाव में जीतने और हराने का खेल होता रहा है। इसका कारण यह है कि अधिसंख्य राजनीतिक दलों का जातीय आधार रहा है। कभी कांग्रेस का सवर्ण जातियां, दलित और मुसलमान मुख्य जनाधार होते थे। बीजेपी का शहरी आबादी के साथ वैश्य और सवर्ण जातियां जनाधार मानी जाती थीं। पिछले ढाई दशक से लालू प्रसाद अपने स्वजातीय यादव के साथ बीजेपी के विरोध में मुस्लिम परस्त राजनीति करते रहे हैं। मंडल की राजनीति परवान चढ़ने पर पिछड़े, गरीब व वंचित समाज को जागरुक करने वाले नेता के रूप में उभरे लालू का अब यादव-मुस्लिम मुख्य राजनीतिक आधार माना जाता है। कहा जाता है कि रामविलास पासवान का दलितों में स्वजातीय मतदाताओं पर जादू चलता है। कुर्मी समाज से उभरे नीतीश कुमार पिछड़ों की राजनीति करते हैं। धर्मनिरपेक्ष छवि के प्रति सतर्क रहने वाले नीतीश कुमार सत्ता में रहते अति पिछड़े और महादलित कार्ड के बूते राजनीतिक सफलता की सीढ़ी चढ़ते रहें। बीजेपी के साथ रहने पर मुसलमानों ने नीतीश पर भरोसा जताया। इसी का परिणाम रहा कि लालू राजनीतिक हाशिये पर चले गये। केन्द्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री उपेन्द्र कुशवाहा बिहार का अगला मुख्यमंत्री बनने का अभियान चलाकर स्वजातीय मतदाताओं को गोलबंद कर रहे हैं। लोकसभा के आसन्न चुनाव में राजग और यूपीए दोनों कुशवाहा समाज को साधने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। इसी कारण उपेन्द्र कुशवाहा की पूछ बढ़ी है।

जाति जीत का मंत्र

चुनावी राजनीति में जीत का मंत्र जाति में समाहित होने के कारण प्रत्याशी की जाति और उसके धन व बाहुबल को मुख्य आधार बनाया जाता रहा है। विभिन्न दलों में किसने किस जाति के कितनों को प्रत्याशी बनाया है, इसका भी लेखाजोखा दिया जाता रहा है। लोकसभा के पिछले चुनाव में 40 में 31 सीटें जीतने वाले राजग को इस बार नीतीश के साथ आने से न सिर्फ बिहार में वर्चस्व कायम रहने की उम्मीद है, बल्कि 31 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज करने का भरोसा है। सर्वाधित 22 सीटें जीतने वाली बीजेपी ने नीतीश के साथ बराबर सीटों के लिए चुनाव लड़ने हेतु कम से कम छह जीती हुई सीटें छोड़ने की सहमति जता दी है।

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अस्सी के दशक में इन्होंने हिन्दुस्थान समाचार से अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत की। उसके बाद दैनिक आज में उप संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान में मुख्य संवाददाता व प्रधान संवाददाता, राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो प्रमुख एवं विशेष संवाददाता और दैनिक भास्कर में ब्यूरो प्रमुख एवं राजनीतिक संपादक के पद पर कार्य कर चुके हैं। दैनिक भास्कर से सेवानिवृत्त होने के बाद मार्च, 2017 से हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी से राजनीतिक संपादक के रूप में जुड़े हैं।

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