देश भर में नागरिकता आधार वर्ष 1951 है, तो असम में 1971 क्यों? इसी बात को लेकर असम में घमासान मचा हुआ है। प्रमुख राजनीतिक दल अपने-अपने पक्ष में इसे भुनाने में लगे हैं।

जादी के बाद 1951 को नागरिकता आधार वर्ष पूरे देश में माना गया। लेकिन असम में नागरिकता आधार वर्ष 24 मार्च, 1971 की मध्यरात्रि को स्वीकार किया गया। इसको लेकर शुरू से ही कुछ लोगों ने सवाल खड़ा किया। इस मुद्दे पर लगातार सियासत होती रही। उल्लेखनीय है कि 80 के दशक में स्थानीय नागरिकों के हक और हुकूक पर गंभीर खतरा मानकर असम आंदोलन आरंभ हुआ। पांच वर्षों तक चले आंदोलन की परिणति 1985 में असम समझौते के रूप में सामने आई। केंद्र, असम सरकार और अखिल असम छात्र संस्था (आसू) के बीच हुए समझौते में स्थानीय लोगों के अस्तित्व की रक्षा के लिए कई अहम बिंदुओं को शामिल किया गया। इसमें एक अहम मुद्दा राज्य में नागरिकता आधार वर्ष 24 मार्च, 1971 की मध्य रात्रि को शामिल किया जाना भी था। ऐसा होने पर गत 20 वर्षों में राज्य में आए अवैध नागरिकों को नागरिकता मिलने का रास्ता साफ हो गया। पिछले 35 वर्षों में इस मामले को लेकर लगातार राजनीति होती रही, लेकिन कभी भी यह समझौता धरातल पर प्रभावी और क्रियान्वित नहीं हो पाया। आंदोलन की कोख से पैदा हुई असम गण परिषद (अगप) राज्य की सत्ता को अपने हाथों में दो बार लिया, लेकिन इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी।
इस बार यह मुद्दा जिन्न की तरह बोतल से बाहर आ गया है। इस मुद्दे पर अगप व कांग्रेस के बीच जमकर बयानबाजी शुरू हो गई है। असम समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में तत्कालीन आसू के प्रमुख नेता व पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने पहली बार 1971 के मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने कहा है कि नागरिकता आधार वर्ष 1971 कराने के लिए देश की कई विभिन्न पार्टियां, जिसमे मुख्य रूप से कांग्रेस का बड़ा हाथ था। कांग्रेस के दबाव के कारण ही नागरिकता आधार वर्ष को 1971 किया गया। महंत के इस रहस्योद्घाटन से कांग्रेस पार्टी एक तरह से बैकफुट पर चली गई है। बावजूद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई इसके लिए महंत को ही जिम्मेदार ठहराते हैं।

नागरिकता आधार वर्ष 1971 कराने के लिए देश की कई विभिन्न पार्टियां, जिसमें मुख्य रूप से कांग्रेस का बड़ा हाथ था। कांग्रेस के दबाव के कारण ही नागरिकता आधार वर्ष को 1971 किया गया।
प्रफुल्ल कुमार महंत पूर्व मुख्यमंत्री व आसू के प्रमुख नेता

अगर महंत ने दबाव में समझौते पर हस्ताक्षर किया था, तो इससे साबित होता है कि वे बिना रीढ़ की हड्डी वाले नेता हैं।
तरुण गोगोई, पूर्व मुख्यमंत्री, कांग्रेस नेता

गोगोई के अनुसार समझौते पर हस्ताक्षर किसी सेजबरन नहीं कराया जा सकता है। अगर महंत ने दबाव में समझौते पर हस्ताक्षर किया था, तो इससे साबित होता है कि वे बिना रीढ़ की हड्डी वाले नेता हैं। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस शुरू से ही चाहती थी कि नागरिकता आधार वर्ष 71 या इससे आगे हो। कारण 80 के दशक में कांग्रेस का जनाधार बड़ी तेजी से खिसक गया था। कांग्रेस के सर्वोच्च नेताओं का यह मानना था कि अगर असम में सरकार बनानी है तो बांग्लादेश से आए मुस्लिम मतदाताओं को अपना वोट बैंक बनाना होगा। इसके लिए उन्हें नागरिकता मुहैया कराना होगा। यही कारण था कि 80 के दशक में कांग्रेस ने असम आंदोलन के नेताओं के सामने 1971 को आधार वर्ष करने का प्रस्ताव दिया था, जिसे आंदोलनकारी संगठनों ने अस्वीकार कर दिया। लेकिन, 5 वर्ष बाद पुन: कांग्रेस आंदोलनकारियों को मना कर अपने उद्देश्यों में सफल हो गई। राज्य में नागरिकता आधार वर्ष को लेकर सत्ताधारी पार्टी भाजपा 1971 के बदले 1951 करने की मांग कर रही है। अगर ऐसा होता है तो सबसे बड़ा झटका कांग्रेस के लिए माना जाएगा। हालांकि आसू असम समझौते में शामिल किसी भी शर्त से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में आधार वर्ष को बदलना काफी कठिन कार्य होगा। आगामी लोकसभा चुनाव में नागरिकता आधार वर्ष 1951 और 1971 एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनता दिख रहा है। महंत के खुलासे के बाद कांग्रेस पार्टी जहां अपना मुंह छिपाने के लिए आरोप मढ़ रही है, वहीं भाजपा भी कांग्रेसी पर हमलावर होती नजर आ रही है।

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