अपराध कैसे आपका पीछा करता है, इसका उदाहरण दिल्ली के दिग्गज नेता रहे सज्जन कुमार को 1984 के सिख नरसंहार के एक मामले में मिली सजा से मिलता है। ऐसा व्यक्ति जिसका मामला तक बंद हो गया, पुलिस ने कह दिया कि कोई प्रमाण नहीं मिला, दोबारा मामले की शुरुआत में सीबीआई सजा दिलाने में विफल रही, निचली अदालत ने बरी कर दिया, उसे सजा मिलेगी इसकी कल्पना कौन कर सकता था।

सिख विरोधी दंगों में सज्जन कुमार को हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। सज्जन के रूप में पहली बार किसी बड़े नेता को 1984 का गुनहगार माना गया है। उम्मीद है कि जल्द ही इस मामले के आरोपित अन्य बड़े नेताओं को भी कोर्ट उनके किए की सजा सुनाएगा।

सज्जन कुमार ने तो सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें सिख विरोधी दंगे के लिए कभी सजा मिलेगी। पीडि़तों के साथ देश ने भी मान लिया था कि किसी बड़े चेहरे को उस भयावह अपराध की सजा नहीं मिल सकती। उस घटना के बाद 34 साल बीत गए। लेकिन 20 नवंबर को विशेष न्यायालय ने एक दोषी को फांसी तथा दूसरे को आजीवन कारावास की सजा सुनाई तो लगा कि ये अध्याय फिर खुल गया है। उसके बाद सज्जन कुमार के रूप में यह दूसरी सजा है। मतलब सजा की शुरुआत हो गई है और जिस तरह मामला आगे बढ़ रहा है, उसमें कांग्रेस के कुछ और बड़े तथा अनेक स्थानीय नेताओं को सजा मिलने की भी संभावना बन गई है। 17 दिसंबर 2018 का दिन इस मायने में महत्वपूर्ण हो गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचले न्यायालय द्वारा सज्जन को बरी करने का फैसला पलट दिया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली। सज्जन कुमार के अलावा नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी भागमल, गिरधारी लाल और पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर को भी उम्रकैद तथा पूर्व विधायक महेंद्र यादव को 10 साल जेल की सजा हुई है। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र में कांग्रेस के जाने-पहचाने चेहरे थे। इस मामले में 1 नवंबर 1984 को दिल्ली कैंट इलाके में एक परिवार के तीन भाइयों नरेंद्र पाल सिंह, कुलदीप और राघवेंद्र सिंह की तथा दूसरे परिवार के गुरप्रीत और उनके बेटे केहर सिंह की हत्या कर दी गई थी। केहर सिंह की विधवा और गुरप्रीत सिंह की मां जगदीश कौर ने शिकायत दर्ज कराई थी।

 

कब क्या हुआ ?

  •  1-2 नंवबर 1984: भीड़ ने दिल्ली कैंट के राजनगर में पांच सिखों की हत्या कर दी।
  •  मई 2000: दंगों से जुड़े मुकदमे की जांच के लिए जीटी नानावती आयोग का गठन हुआ।
  •  दिसंबर 2000: सत्र न्यायालय ने दंगों से जुड़े एक मुकदमे में सज्जन कुमार को बरी किया।
  •  24 अक्टूबर 2005 : सीबीआई ने नानावती आयोग की सिफारिश पर मुकदमा दर्ज किया।
  •  1 फरवरी 2010: ट्रायल कोर्ट ने सज्जन कुमार, बलवान खोखर, महेंद्र यादव, कैप्टन
    भागमल, गिरधारी लाल, किशन खोखर, महा सिंह और संतोष रानी को आरोपी के तौर पर
    समन जारी किया।
  •  24 मई 2010 : ट्रायल कोर्ट ने 6 लोगों पर हत्या, डकैती, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने,
    अलग-अलग समुदायों में द्वेष फैलाने और षडयंत्र रचने के आरोप तय किए।
  •  30 अप्रैल 2013: न्यायालय ने सज्जन कुमार को बरी किया। बलवान खोखर, गिरधारी
    लाल, भागमल को हत्या का दोषी ठहराया। महेंद्र यादव और किशन खोखर को दंगे का
    दोषी ठहराया।
  •  9 मई 2013: न्यायालय ने बलवान खोखर, भागमल और गिरधारी लाल को उम्रकैद की
    सजा सुनाई। महेंद्र यादव और किशन खोखर को तीन साल की सजा दी गई।
  •  19 जुलाई 2013 : सीबीआई ने उच्च न्यायालय में सज्जन कुमार को बरी किए जाने के
    खिलाफ अपील की।
  •  22 जुलाई 2013 : उच्च न्यायालय ने सज्जन कुमार को सीबीआई की याचिका पर नोटिस
    जारी किया।
  •  29 अक्टूबर 2018: उच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित्
  • 17 दिसंबर 2018: उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया।

दिल्ली पुलिस ने 1994 में सबूत न मिलने का दावा कर केस बंद कर दिया था। अटलबिहारी वाजपेयी सरकार ने सन 2000 में न्यायमूर्ति जीटी नानावटी आयोग का गठन किया, जिसकी सिफारिश पर सीबीआई ने सभी छह आरोपियों के खिलाफ 2005 में प्राथमिकी दर्ज की। 13 जनवरी 2010 को आरोपपत्र दाखिल किया गया। इसके बाद निचले न्यायालय में मामला चलता रहा। मई 2013 में न्यायालय ने पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर, कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और अन्य 2 लोगों को दोषी करार दिया लेकिन कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। पीडि़त पक्ष ने इस फैसले को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। न्यायालय में पीडि़तों ने सज्जन कुमार की पहचान हिंसक भीड़ की अगुवाई करने वाले के रूप में की। गवाहों ने बताया कि सज्जन कुमार का कहना था कि किसी को मत छोड़ना, इन्होंने हमारी मां को मारा है। अगर कोई इनको बचाने आए, तो उनको भी मार दो। उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने प्रश्न उठाया कि राज्य मशीनरी उस समय क्या कर रही थी? घटना दिल्ली कैंटोनमेंट के ठीक सामने हुई थी। दोनों न्यायमूर्तियों एस मुरलीधर और विनोद गोयल की पीठ ने 203 पृष्ठों के अपने फैसले में कहा कि 1947 में भारत-पाक बंटवारे के दौरान लोगों का इस तरह कत्ल किया गया था, फिर 37 साल बाद दिल्ली इसी तरह के दंगों की गवाह बनी। उस समय चार दिन जो हुआ वह भारत की सामूहिक अंत:चेतना में लंबे समय तक सदमे जैसा बना रहेगा। आरोपी राजनीतिक कैरियर में आनंद लेता रहा और ट्रायल से बचता रहा। न्यायपीठ ने साफ कहा कि कई दशक से लोग न्याय का इंतजार कर रहे थे। ये जांच एजेसिंयों की नाकामी है कि अब तक इस मामले में कुछ नहीं हुआ है। दोनों न्यायाधीशों ने दिल्ली पुलिस को जो फटकार लगाई है उसके पर्याप्त आधार इसी फैसले में निहित है। 1987 में नांगलोई थाने में दर्ज प्राथमिकी के बाद जांच की गई और 1992 में आरोप पत्र तैयार हुआ। लेकिन उसे न्यायालय में दाखिल नहीं किया गया। नांगलोई पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी नंबर 67/1987 की जांच के दौरान गुरबचन सिंह ने सज्जन कुमार के खिलाफ बयान दर्ज कराया था। 1992 से पुलिस ने उस आरोप पत्र को छिपाए रखा। इस बात से उच्च न्यायालय भी हतप्रभ था कि दिल्ली पुलिस इस हद तक अपराधी को बचा रही थी। सज्जन कुमार के नाम वाला आरोप पत्र एक फाइल में रखा गया और उसे कभी न्यायालय में पेश नहीं किया गया। यहां सज्जन कुमार के खिलाफ मामलों को दबाने की कोशिश की गई, उन्हें दर्ज ही नहीं किया गया। मामले दर्ज हुए तो उनकी जांच ठीक से नहीं हुई। न्यायालय ने कहा कि 1987 में नांगलोई थाने में दर्ज प्राथमिकी के बाद जांच की गई और 1992 में आरोप पत्र तैयार हुआ लेकिन उसे फाइल नहीं किया गया।

बल्कि 1991 के एक केस के साथ उसके क्लब होने के बाद वह कोर्ट के रिकॉर्डों से ही गायब हो गया। गवाह गुरबचन ने रंगनाथ मिश्रा के सामने 4 और 5 सितंबर 1985 को दो हलफनामे दिए थे, जिसमें उन्होंने सज्जन कुमार का नाम लिया था, लेकिन पुलिस ने केस बंद करने की सिफारिश कर दी। जब इस पर असहमति हुई तो पुलिस ने गुरबचन के हलफनामे के आधार पर दूसरा केस दर्ज किया जिसमें सज्जन कुमार का नाम ही नहीं था। उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त टीम ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के केस रिकॉर्डों की स्क्रूटनी की, जिसमें वो आरोप पत्र मिला, जिसमें सज्जन कुमार का नाम दर्ज था। इसके बाद विशेष सरकारी वकील बीएस लून ने न्यायालय में एक आवेदन डालकर बताया कि ऐसे दस्तावेज मिले हैं जो सज्जन कुमार के खिलाफ मामला आगे बढ़ाने के लिए अहम सबूत हैं, लेकिन इन दस्तावेजों को न्यायालय के सामने पहले कभी पेश नहीं किया गया था। यह एक मामला इस बात का प्रमाण है कि 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेसी नेताओं के नेतृत्व में सिखों का जो नरसंहार हुआ, उस दौरान तो पुलिस मूकदर्शक या सहयोगी थी ही, मुकदमों में भी उसने आपराधिक व्यवहार किया। वाजपेयी सरकार ने नानावती आयोग गठित करके उसे विशेष अधिकार नहीं दिया होता तो यह और इस तरह के दूसरे मामले दोबारा खुलते ही नहीं। उसके बाद इसका फैसला भी इसलिए हो पाया, क्योंकि नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2015 में उच्चतम न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जीपी माथुर की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन कर दिया था। उसके बाद उच्चतम न्यायालय ने भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन ढींगरा की अध्यक्षता में एक एसआईटी का गठन किया। फिर दोनों को साथ मिला दिया गया। एसआईटी ने 60 मामले हाथ में लिए। इन 60 में से 54 मामले ऐसे माने जा रहे हैं जिनमें आरोपियों को सजा मिलनी निश्चित है। इन मामलों में जगदीश टाइटलर के साथ कई अन्य कांग्रेसी नेता भी फंस सकते हैं। मोदी सरकार की यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए। एसआइटी ने मामले को खंगाल कर 54 ऐसे मामले का चयन किया जिसमें उन्हें लगा कि इनमें आरोपियों को सजा दिलाए जाने की संभावनाएं हैं। इनमें ही एक मामला पालम विहार का था जिसमें इसी साल 20 नवंबर को दो लोगों को सजा हुई थी। एसआईटी जिस तरह काम कर रही है उसमें इन सभी मामलों में न्याय मिलने की आशा बलवती हो रही है।

सज्जन कुमार के खिलाफ जो तीन मामले हैं, उनमें शिकायतकर्ता ने मुकदमा दर्ज करने के बाद परिस्थितिवश दिल्ली छोड़ दिया। 1984 के बाद अनेक सिख स्त्री-पुरुषों के लिए दिल्ली में रहना संभव नहीं था। लिहाजा पुलिस ने यह लिखकर अनट्रेस रिपोर्ट फाइल कर दिया कि उन्हें न तो शिकायतकर्ता मिल रहा है और न कोई गवाह या अन्य साक्ष्य। एसआईटी ने इनकी नए सिरे से जांच शुरू की। तलाश करने पर पंजाब व अमेरिका में पीडि़त के परिजन भी मिल गए और वे गवाही देने के लिए भी तैयार हो गए। उनसे मेडिकल व एमएलसी रिपोर्ट भी मिल गई। इन तीन मामलों में सज्जन कुमार व अन्य पर हत्या, हत्या की कोशिश, दंगा भड़काने व जनकपुरी, विकासपुरी और सरस्वती विहार पुलिस स्टेशन को जलाने जैसे आरोप हैं। इसी तरह जगदीश टाइटलर के खिलाफ तीन मुकदमों में सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दी थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। सीबीआई ने इसके बाद टाइटलर, कुमार और अभिषेक वर्मा के लाइ डिटेक्टर टेस्ट की मांग की, जिसमें अभी तक सिर्फ वर्मा ने ही यह टेस्ट करवाया है। तात्पर्य यह कि एसआईटी की भूमिका से आजादी के बाद के सबसे बड़े उस नरसंहार के कुछ मामलों में न्याय मिलने की संभावना बन गई है, जिनके बारे में मान लिया गया था कि अब इनमें कुछ नहीं हो सकता। अगर 1999 में वाजपेयी सरकार तथा 2014 में नरेन्द्र मोदी सरकार सत्ता में नहीं आती तो यह संभव भी नहीं होता। कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों की भूमिका किसी तरह मामले को रफा-दफा करने की ही रही है। ठीक से जांच होने पर पूरी पार्टी शासन कठघरे में खड़ा हो जाता। हालांकि गठित आयोगों एवं समितियों से नरसंहार में कांग्रेस एवं उसके मातहत काम करने वाले प्रशासन का आपराधिक रवैया साफ सामने आ जाता है। नानावती आयोग का गठन वाजपेयी सरकार में हुआ लेकिन रिपोर्ट आने तक मनमोहन सिंह की सरकार बन गई थी। नानावती आयोग की रिपोर्ट पर सरकार की प्रतिक्रिया ऐसी थी मानो इसका कोई मायने नहीं है। किंतु बीजेपी, अकाली दल ही नहीं अनेक दूसरी पार्टियां, सामाजिक-धार्मिक संगठनों ने आवाज उठानी आरंभ की तो सरकार ने 8 अगस्त 2005 को संसद में एक कार्रवाई रिपोर्ट रख दी। इसमें जगदीश टाइटलर एवं सज्जन कुमार के बारे में कहा गया कि आयोग ने उनके लिए अंग्रेजी में प्रोबेब्ली (संभावना) शब्द प्रयोग किया गया है।

इससे साफ है कि आयोग ही उनकी भूमिका के बारे में निश्चित नहीं है और आपराधिक मामलों में संभावना के आधार पर कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। टाइटलर के संबंध में मुकदमों एवं पुलिस जांच का हवाला देते हुए कहा गया कि चूंकि किसी में भी उनको आरोपी नहीं बनाया गया तो उनके खिलाफ कार्रवाई न्यायोचित नहीं होगी। सज्जन कुमार के विरुद्ध चले मुकदमे का हवाला देकर उनको बरी किए जाने की दलील दी गई। सज्जन को अब सजा इसलिए हुई है या आगे भी 1984 के हत्यारों और लूटेरों को सजा होने की संभावना बनी है क्योंकि केन्द्र में ऐसी सरकार है, जिस पर कांग्रेस का कोई प्रभाव नहीं। आजाद भारत के इस सबसे बड़े नरसंहार मामले में न्याय चाहिए तो फिर राजनीतिक नेतृत्व ऐसा रहना चाहिए जो स्वतंत्रता से एसआईटी को काम करने दे।

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