करीबन एक साथ आजादी हासिल करने वाले दो देशों के राष्ट्रनायकों की प्रतिक्रियाएं एक जैसी थीं। अपनी प्रतिक्रियाओं में उन नायकों के अपने-अपने राष्ट्रों के निर्माण की भावी रूपरेखा के साफ संकेत दिए थे। गांधी जी की प्रतिक्रिया पर भारत नहीं चल पाया, जबकि भारत से हजारों मील दूर तुर्की अपने राष्ट्रनायक के निर्देश पर इतना आगे बढ़ गया कि वहां की भाषा में ओरहान पामुक जैसे लेखक पैदा हुए, जिन्हें दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित साहित्य का नोबेल पुरस्कार तक हासिल हो चुका है। आखिर क्या वजह रही कि भारतीय राजनय अब भी हिंदी में काम करने की राह ही तलाश रहा है, जबकि तुर्की में तुर्क भाषा में राजकाज चलते सत्तर साल हो चुके हैं। इन सवालों का जवाब हर साल खासतौर पर हिंदी दिवस पर तलाशा जाता है और हिंदी पखवाड़ा बीतते-बीतते यह सवाल अगले साल के लिए टाल दिया जाता है।

आखिर क्या वजह रही कि भारतीय राजनय अब भी हिंदी में काम करने की राह ही तलाश रहा है, जबकि तुर्की में तुर्क भाषा में राजकाज चलते सत्तर साल हो चुके हैं। इन सवालों का जवाब हर साल खासतौर पर हिंदी दिवस पर तलाशा जाता है और हिंदी पखवाड़ा बीतते-बीतते यह सवाल अगले साल के लिए टाल दिया जाता है।

1947 में आजादी मिलते ही गांधी जी ने बीबीसी को दी प्रतिक्रिया में कहा था, ‘पूरी दुनिया से कह दो गांधी अंग्रेजी नहीं जानता।’ इसके ठीक एक साल बाद तुर्की के राष्ट्रनायक कमाल पाशा ने अपने अधिकारियों से पूछा था, ‘तुर्की भाषा में काम शुरू करने में कितना वक्त लगेगा?’ अफसरों के जवाब जैसे होते हैं, वैसे ही रहे। लेकिन पाशा ने आदेश दिया, ‘तुर्की में अभी से काम शुरू किया जाए।’ गांधी हिंदी नहीं जानता का संदेश देकर गांधी जी भारतीय राष्ट्र को चलाने वालों को साफ संकेत दे रहे थे कि भारत को आगे का काम अपनी भाषा में करना होगा। लेकिन उनकी ही विरासत पर आगे बढ़ने का दावा करने वाले संविधानसभा में बैठे भारतीय राष्ट्रनायकों की एक खेप ने इस संदेश को स्वीकार नहीं किया।

संविधान के अनुच्छेद 343 ने हिंदी को भारतीय संघ की भाषा और देवनागरी को लिपि जरूर मान लिया है, लेकिन उसने राजभाषा में कामकाज शूरू करने की पंद्रह साल की जो अवधि तय की, वही गलत था। भारतीय राष्ट्रनायकों की दूरदर्शिता यह आंकने में नाकाम रही कि आने वाले दिनों में भाषा का सवाल किस तरह से उठ सकता है? हिंदी विरोध की आंच तमिलनाडु में सुलगने लगी थी और इसे देखते हुए ही 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित हुआ, जिसमें 26 जनवरी, 1965 से हिंदी को संघ की राजभाषा के तौर पर स्थापित करने की बाध्यता टाल दी गई। फिर भी हिंदी विरोधी आंदोलन नहीं थमा तो 1967 में इंदिरा सरकार ने इस अधिनियम में संशोधन किया, जिसके मुताबिक हिंदी को संघ की राजभाषा बनाने के संवैधानिक प्रावधान पर तब तक के लिए रोक लग गई, जब तक हिंदी का एक भी राज्य विरोध करता रहे। इस अधिनियम को बेशक हिंदी विरोधी आंदोलन की आंच के दबाव में पास किया गया, लेकिन यह भी सच है नवंबर 1962 में नगालैंड नाम का एक राज्य अस्तित्व में आ चुका था, जिसकी आधिकारिक राजभाषा अंग्रेजी है। जाहिर है कि जिस राज्य की राजभाषा ही अंग्रेजी हो, वह किस तरह हिंदी को स्वीकार करता। ऐसे में अगर हिंदी समर्थकों को राजकाज से हिंदी को परे रखने के षड्यंत्र में अतीत की सरकारों के अंदरूनी खेल नजर आते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

हिंदी को दूर रखने की कोशिश तो संविधान में ही नजर आती है। संविधान में उपबंध है कि अगर उसके हिंदी पाठ पर विवाद होगा तो अंग्रेजी को मूल माना जाएगा। यानी संविधान ने ही मान लिया कि हिंदी, अंग्रेजी के मुकाबले कमतर है। जब ऐसी सोच के साथ राजभाषा का सवाल हल किया जाएगा तो जाहिर है कि उसका कोई स्पष्ट नतीजा नहीं निकल पाएगा।

इसलिए हिंदी आज भी कम के कम संघीय मामलों में राजकाज से पूरी तरह दूर है। राजभाषा अधिनियम 1973 के अधीन क क्षेत्र के राज्यों मसलन हिंदीभाषी राज्यों में हिंदी में कामकाज करने का प्रावधान तो है, लेकिन संवैधानिक प्रक्रिया में हिंदी को दोयम रखने की नीति से प्रभावित नौकरशाही लगातार हिंदी को किनारे ही रखती रही है। हिंदी में कामकाज को बढ़ावा देने के लिए हर साल सितंबर महीने के पहले पखवाड़े में हिंदी में निबंध, टिप्पणी लेखन, आदि की प्रतियोगिताएं कराकर, हिंदी में पत्रिकाएं निकालकर हिंदी के विकास की कहानी लिख देती हैं। हर वर्ग में पांच हजार से लेकर दो हजार तक के पुरस्कार बांटे जाते हैं, हिंदी दिवस के नाम पर भोजन-पानी, मिठाइयों का दौर चलता है और हिंदी को आगे बढ़ाने के कथित संकल्प के साथ हिंदी को विकसित करने के साथ तालियां बजा ली जाती हैं और अगले दिन से फिर से राजकाज की बैठकों का ब्यौरा से लेकर आदेश, निर्देश, टिप्पणी आदि का लेखन अंग्रेजी में शुरू हो जाता है।

राजकाज ऐसा विषय नहीं है, जहां भाषा के साथ ऐसा खिलवाड़ किया जाए। लेकिन भारतीय मानस को इसमें मजा आता है। इसके सहभागी भारतीय प्रशासन की रीढ़ माने जाने वाले प्रशासनिक सेवा के वे अधिकारी बनते हैं, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत संवैधानिक छत्रछाया हासिल है। उन्हें अंग्रेजी में काम करना और हिंदी में हाथ तंग बताना गौरवपूर्ण कार्य लगता है। मैकाले ने 1835 में अंग्रेजी और आधुनिक शिक्षण के लिए अपनी जो मिन्ट योजना पेश की थी, उसका मकसद अंग्रेजी जानने वाले लोगों की बढ़ोतरी के साथ ही अपनी भाषा को गुलाम मानने वाले लोगों की संख्या को बढ़ाना था। मैकाले की इस मामले में पीठ थपथपायी जा सकती है कि वह अपने मकसद में कामयाब रहा। भारतीय प्रशासनिक तंत्र अपनी हिंदी को दोयम मान कर ही खुश होता है। वह हिंदी तभी सीखता है, जब उसे पश्चिम से आयातित बहुराष्ट्रीय निगमों के सॉफ्टवेयर ऐसा करने को कहते हैं। यहां याद दिला देना चाहिए कि भारत के विशाल मध्यवर्ग के बाजार को दुहने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी में कारोबार लेकर उतर रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट भारतीय भाषाओं में भी सॉफ्टवेयर लेकर आ गया है। गूगल पर संविधान के मुताबिक अंक रोमन की बजाय देवनागरी में भी आने लगे हैं और चूंकि यह सब पश्चिम के जरिए आ रहा है, इसलिए इसे सीखा भी जा रहा है। यह गुलाम मानसिकता का ही उदाहरण है कि जिसे हमें स्वनियोजित और स्वप्रेरित तरीके से सीखना चाहिए, उसे हम दकियानूसी मानते हैं और जैसे ही वही चीज पश्चिम के विकसित मुल्कों की कंपनियों या सरकारों के जरिए हमारे सामने आती है, हम उसे आधुनिकतावादी सोच के साथ स्वीकार करने लगते हैं।

प्रशासनिक सेवा में आने वाले लोगों को जब कैडर आवंटित होते हैं तो उन्हें अपने कैडर राज्य की भाषा सीखनी पड़ती है। इसकी शुरुआत अंग्रेजों ने ही की थी। कोलकाता के फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हो या तरजुमा महकमा की शुरुआत, अंग्रेजों ने इन्हें इसलिए बनाया था, ताकि भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने वाले अधिकारियों को भारतीय भाषाओं का ज्ञान हो और अंग्रेजी से भारतीय एवं भारतीय भाषाओं से अंग्रेजी में आधिकारिक चिट्ठियों का अनुवाद हो। फोर्ट विलियम कॉलेज में भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों को भारतीय भाषाएं पढ़ाई जाती थीं तो तरजुमा महकमा में आधिकारिक चिट्ठियों का अनुवाद होता था। वह तरजुमा महकमा अब गृह मंत्रालय के अधीन अनुवाद ब्यूरो के तौर पर आज भी जिंदा है। अंग्रेजी सरकार की मजबूरी थी कि उसके पास अंग्रेजी जानने वाले अपने अधिकारी ज्यादा थे। लेकिन उन्हें पता था कि अच्छा राजकाज स्थानीय भाषाओं में ही चलाया जा सकता है, इसलिए अधिकारियों को हिंदी या देसी भाषाएं सिखाने की प्रक्रिया शुरू की। यह बात और है कि चूंकि ज्यादातर अधिकारी अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी थे, इसलिए उनके लिए देसी भाषाओं का मकसद सिर्फ आधिकारिक अनुवाद तक सीमित रहा। कहना न होगा कि आजादी के बाद भी हिंदी सिर्फ अंग्रेजी के अनुवादभर का प्रतीक रह गई है।

भारतीय राजकाज में हिंदी की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यहां मूल काम अंग्रेजी में होता है। अंग्रेजी को लेकर अब भी श्रेष्ठताबोध हावी है। इसलिए क क्षेत्र के उत्तर भारतीय राज्यों में भी खालिस हिंदी में काम कर सकने वाले बाबू तक गलत ही सही, अंग्रेजी में ही सरकारी कामकाज करने को प्रेरित होता है। क्लर्कों को लगता है कि हिंदी में काम करने वाले लोगों को दोयम माना जाता है। वैसे ऐसा है भी। और तो और, हिंदी के पत्रकार तक अपने हिंदी वालों का मजाक हिंदी वाला कहकर करते हैं। भाषायी स्वाभिमान उन अधिकारियों में भी नहीं है, जिन्होंने भले ही अपनी पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से की है, लेकिन उनकी घरेलू भाषा हिंदी है। एक दौर में हिंदी को बढ़ावा देने में आकाशवाणी का बड़ा योगदान रहा। लेकिन आकाशवाणी के कार्यक्रम भले ही हिंदी में बनते हों, लेकिन उसके समाचारों में उन लोगों को ही तरजीह दी जाती है, जो अंग्रेजी में मूलत: काम कर सकते हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या ऐसे दूसरी बड़ी हस्तियों की रिपोर्टिंग के लिए हिंदी जानने की बजाय अंग्रेजी जानने वालों को तरजीह दी जाती है। भले ही राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री अपना सारा भाषण हिंदी में देते हों।

संवैधानिक प्रावधानों और अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई एवं परीक्षा से प्रशासनिक सेवा में आए अधिकारियों ने राजकाज से हिंदी को दूर रखने में बड़ी भूमिका निभाई है। फिर नीति आयोग जैसी संस्थाएं तक अंग्रेजी में ही नीतियों का मसविदा तैयार करती हैं। कानून मंत्रालय हिंदी की बजाय संसद में पेश किए जाने वाले अधिनियमों का ड्राफ्ट अंग्रेजी में ही तैयार करता है। इसलिए अंग्रेजी पर जोर की संस्कृति अब भी हमारे राजकाज में बरकार है।

नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद मूलत: अंग्रेजी में काम करने वाले अधिकारियों पर हिंदी में कामकाज करने का दबाव बढ़ा नजर आया था। लेकिन वह दबाव अब कम ही नजर आता है। अधिकारी फिर से अंग्रेजी में ही कामकाज करने में अपनी श्रेष्ठता देख रहे हैं। लिहाजा कर्मचारी भी अंग्रेजी में ही नोट और टिप्पणियां लिखने को मजबूर हैं।

राजभाषा की संसदीय समिति के आदेश के मुताबिक हर तीन महीने में हर सरकारी विभाग में राजभाषा पर वर्कशॉप होनी जरूरी है। लेकिन विभागों ने इसे रस्मी बना दिया है। तीन महीने बाद विभागों या निगमों के हिंदी और राजभाषा विभाग कथित तौर पर वर्कशॉप यानी कार्यशाला आयोजित करते हैं। जिसमें हिंदी के विद्वान को बुला लिया जाता है। उसे गुलदस्ता दिया जाता है, एक शॉल ओढ़ाया जाता है। फिर उनसे संक्षिप्त भाषण कराया जाता है। फिर उसे दक्षिणा देकर विदा कर दिया जाता है। कार्यशाला का मतलब होता है कि व्यवहारिक तौर पर टिप्पणी आदि लिखने का अभ्यास किया जाए। लेकिन ऐसा नहीं होता।

हिंदी को अगर सचमुच राजकाज की भाषा बनाना है तो सबसे पहले पाखंड का पखवाड़ा मनाने पर रोक लगा दिया जाना चाहिए। हिंदी दिवस के मौके पर सालाना प्रतियोगिताएं कराने की बजाय अधिकारियों और कर्मचारियों के सीआर में एक स्तंभ उनके हिंदी में कामकाज को भी जोड़ दिया जाना चाहिए। किस अधिकारी या कर्मचारी ने सालभर हिंदी में कितना कामकाज किया, उसके आधार पर उसका वरिष्ठ उसकी सीआर भरे। अगर ऐसा हो गया तो दफ्तरों में हिंदी में कामकाज को बढ़ावा मिलेगा। अधिकारी और कर्मचारी हिंदी में कामकाज करने को मजबूर होंगे। हिंदी पखवाड़ा पर खर्च होने वाली रकम भी बचेगी, पाखंड के नाम पर निबंध प्रतियोगिता में चुराकर निबंध चेपने वाले कर्मचारियों पर नकेल लगेगी और हिंदी के नाम पर पिकनिकनुमा माहौल भी खत्म होगा। तब जनता की भाषा में जनता का कामकाज हो सकेगा। हिंदी को हकीकत में राजभाषा बनाने के लिए संसदीय राजभाषा समिति को तिमाही आधार पर होने वाली कार्यशालाओं की निगरानी के लिए भी तंत्र विकसित करना होगा और उसकी पूरी रिपोर्ट मांगनी होगी। कार्यशाला में विशेषज्ञों द्वारा कर्मचारियों-अधिकारियों से कराए गए कार्यों की कॉपियां समिति को मंगानी होगी। एक चीज और देखी जाती है। हिंदी दिवस के कार्यक्रमों में अखिल भारतीय सेवाओं से चुनकर आए अधिकारी शायद ही शामिल होते हैं। उन्हें भी कार्यशालाओं में शामिल होने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। तभी जाकर हिंदी राजभाषा के सिंहासन पर विराजमान हो सकेगी।

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