भारतीय इतिहास में सरदार वल्लभभाई पटेल एक मात्र ऐसे महापुरुष हैं, जिन्हें दुनिया भी ‘लौह पुरुष’ मानती है। 182 मीटर ऊंची ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल के भारत राष्ट्र के एकीकरण में उनके योगदान के लिए उन्हें उपयुक्त भावांजलि देने की कोशिश की है। यह स्टैच्यू भविष्य में ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की मिसाल भी बनेगा।

गु जरात के अहमदाबाद से 200 किलो मीटर दूर नर्मदा जिले में केवडि़या के पास, सरदार सरोबर बांध से लगभग 3.2 किलोमीटर दक्षिण में साधु-बेट द्वीप पर ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की मिसाल 182 मीटर ऊंचा ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ बनकर तैयार हो गया है। इसका लोकार्पण 31 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे। यह भारत के लिए एक गौरव का क्षण होगा। क्योंकि इसके साथ ही यह मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बन जाएगी। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की यह मूर्ति अमेरिका की स्टैच्यू आॅफ लिबर्टी से ऊंचाई में दुगनी है। गौरतलब है कि भारत की आजादी के बाद भारत की 562 छोटी-बड़ी देशी रियासतों को एक सूत्र में बांधने का काम सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया था। वे स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री थे। देश में एकता और अखंडता बनाए रखने के कारण ही उन्हें ‘लौह पुरुष’ कहा गया था। ऐसा काम भारत ही नहीं विश्व में भी शायद ही किसी ने किया हो। इसीलिए इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल ने सरदार पटेल के बारे में कहा था, ‘‘ऐसे व्यक्ति को भारत की सीमाओं के भीतर खुद को सीमित नहीं रखना चाहिए, पूरी दुनिया उनके बारे में और अधिक सुनने की हकदार है।’’ ऐसे दूरदर्शी और कुशल प्रशासक, जिन्होंने हाल ही में स्वतंत्र हुए भारत को सुदृढ़ बनाया। ऐसे अनूठे महामानव, जिन्होंने देश को एकता की राह दिखा भारत संघ की कल्पना को साकार किया।

ऐसे महामानव के प्रति उनके अनन्य योगदान को योग्य भावांजलि अर्पण करने और भविष्य की पीढ़ी को प्रेरणा देने के लए इस स्मारक का निर्माण किया गया है। इस स्मारक की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए 2010 में की थी, लेकिन इसकी नींव 31 अक्टूबर, 2013 को सरदार पटेल की 138 वीं जयंती के अवसर पर रखी थी। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी की इच्छा थी कि वल्लभभाई पटेल की एक ऐसी प्रतिमा बने जो कि विश्व में सबसे ऊंची हो। साथ ही वे इसे शैक्षणिक, ऐतिहासिक, राष्ट्रीय और आध्यात्मिक मूल्यों के संदर्भ में आने वाली पीढि़यों के लिए एक प्रेरणास्रोत के रूप में विकसित करना चाहते थे। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट की कमान सरदार सरोवर नर्मदा निगम के अध्यक्ष और गुजरात के हाइवे व कैनालमैन एसएस राठौड़ को दिया। सरदार सरोवर बांध, हाइवे व हजारों किलोमीटर नर्मदा नहर बनाने वाले राठौड़ की देखरेख में ही यह स्टैच्यू आॅफ यूनिटी तय समय करीब 42 माह में बनकर तैयार हो पाया। जबकि अमेरिका के स्टैच्यू आॅफ लिबर्टी के निर्माण में 5 साल का समय लगा था। स्टैच्यू आॅफ यूनिटी के निर्माण के लिए गुजरात सरकार ने देश के 6,50,000 गांवों में से प्रत्येक गांव से लोहे का एक कृषि औजार मांगा था। इस प्रतिमा में उन औजारों का उपयोग होना था, जिससे यह प्रतिमा पूरे भारत के किसानों की साझी रचना बने। इसके लिए सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट ने वर्ष 2013-2014 के दौरान गांव स्तर पर ‘लोहा अभियान’ चलाया। इस अभियान से 1,69,000 लोहे के कृषि औजार एकत्रित हुए। इन औजारों को गलाकर लोहे की छड़ बनायी गयी और उसका प्रयोग स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी की नींव में हुआ। बताते चलें कि लौह पुरुष सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची इस मूर्ति के निर्माण में 18,500 मीट्रिक टन लोहे और 22,500 मीट्रिक टन सीमेंट, 1850 मीट्रिक टन कांसा और 5,700 मीट्रिक टन स्ट्रक्चरल स्टील का इस्तेमाल किया गया है। आप के मन यह प्रश्न भी उठ सकता है कि स्टैच्यू आॅफ यूनिटी की ऊंचाई 182 मीटर ही क्यों रखी गई? तो आपको बता दें कि स्टैच्यू की ऊंचाई गुजरात की विधानसभा की कुल सीट 182 के बराबर रखी गई है। 21 अगस्त, 2012 में ट्रस्ट ने स्टैच्यू आॅफ यूनिटी के निर्माण के लिए कंस्ट्रक्शन कंपनी के चुनाव के लिए कंसलटेंट के रूप में एक मल्टी- फर्म कंसोर्टियम को काम दिया। इस कंसोर्टियम में माइकल ग्रेव्स आर्किटेक्चर एंड डिजाइन, मैनहार्ट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और टर्नर प्रोजेक्ट मैनेजमेंट आॅफ इंडिया लिमिटेड (जो इससे पहले दुनिया की सबसे ऊंची इमारत ‘बुर्ज खलीफा’ बना चुकी है) शामिल हैं। वहीं 27 अक्टूबर, 2014 को डिजाइन और इंजीनियरिंग का काम लार्सन एंड टूब्रो लिमिटेड को सौंपा गया। इस स्टैच्यू के निर्माण के साथ 15 साल तक संचालन और रख-रखाव का काम भी लार्सन एंड टूब्रो के पास ही है। सरदार पटेल की इस अत्याधुनिक प्रतिमा को तय समय 42 महीने में तैयार करने के लिए 4076 मजदूरों ने दो शिफ्टों में काम किया है। इस मूर्ति का निर्माण 800 भारतीय और 200 चीन के कारीगरों ने मिलकर किया है। इस स्टैच्यू की बनावट की खासियत यह है कि यह मूर्ति इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर का एक नायाब नमूना बन गयी है।
सरदार पटेल के इस स्टैच्यू को बनाने के लिए चार धातुओं का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन स्टैच्यू का रंग कांस्य रखा गया है। यह दावा किया जा रहा है कि यह स्टैच्यू 220 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलने वाले तूफान और 6.5 तीव्रता वाले भूकम्प को भी झेल सकता है। स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी को बनाने में कुल खर्च 2,989 करोड़ रुपये हुए हैं । स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के काम में लगे लार्सन एंड टूब्रो लिमिटेड के अधिकारी ने बताया कि यह कंस्ट्रक्शन चार चरणों में पूरा हुआ है। मॉक-अप, 3 डी स्कैनिंग तकनीक, कंप्यूटर न्यूमैरिकल और कंट्रोल प्रोडक्शन तकनीक। मूर्ति के निचले हिस्से को ऊपर के हिस्से की तुलना में थोड़ा पतला किया गया है और ऊपर के हिस्से को चौड़ा रखा गया है। स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी बाहर से जितना भव्य है, अंदर से भी उतना ही मनमोहक है। स्टैच्यू के अंदर दो लिफ्ट बनीं हैं जो यहां आने वाले पर्यटकों को 153 मीटर ऊपर तक ले जाएंगी, जहां सरदार पटेल के दिल के पास एक गैलरी बनाई गई है।

श्रेष्ठ भारत भवन
स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी को देखने के लिए यहां पहुंचने वाले पर्यटकों के लिए यहां 52 कमरों वाला ‘श्रेष्ठ भारत भवन’ भी बनाया जा रहा है। ग्राउंड फ्लोर आम लोगों के लिए होगा। इस फ्लोर पर पर्यटकों को भोजन मिलेगा। इसी फ्लोर पर एक बॉल रूम और मीटिंग व इवेंट रूम है। ऊपर के दो फ्लोर पर अतिथियों के लिए गेस्ट रूम है। यहां पर्यटकों को तीन सितारा होटल की सुविधा मिलेगी। नदी की तरफ बिल्डिंग का किंग साइज रूम और सूइट होगा, जिसके बालकनी से पर्यटक फूलों की घाटी का मजा ले सकते हैं।

यहां से एक साथ 200 पर्यटकों को सरदार सरोवर बांध और नर्मदा वैली का मनमोहक नजारा देखने को मिलेगा। शिल्पकार पद्मश्री राम सुतार और उनके पुत्र अनिल सुतार ने अपनी कला से स्टैच्यू को सरदार पटेल का आकार दिया है। शिल्पकार राम सुतार का कहना है कि प्रतिमा को सिंधु घाटी सभ्यता की कला से बनाया गया है। यह प्रतिमा सात हिस्सों में तैयार की गई है। इसमें 4 धातुओं का उपयोग किया गया है जिसमें बरसों तक जंग नहीं लगेगा। इस स्टैच्यू में 85 प्रतिशत तांबे का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते थे कि सरदार लोगों के दिलों में जिस तरह बसे हैं, प्रतिमा का स्वरूप भी वैसा ही होना चाहिए। सरदार का चेहरा कैसा हो, इसके लिए सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट की एक कमेटी बनी जिसमें दस लोग शामिल थे। इसके लिए हमने अमेरिकन आर्किटेक्चर माइकल ग्रेस और टनल एसोसिएट्स कंपनी को साथ लेकर काफी शोध किया। भारत में लगी सरदार की कई प्रतिमाओं का महीनों अध्ययन कर सरदार के नैन-नक्श और चेहरे को फाइनल किया गया। उसके बाद 30 फीट का चेहरा बनाया गया। जब सरदार के इस चेहरे को ट्रस्ट की कमेटी की स्वीकृति हमें मिल गई, तब इस पर हमने काम करना शुरू किया। अब यह स्टैच्यू पूरी तरह तैयार है। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी इसे एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं। 31 अक्टूबर को इस स्टैच्यू के लोकार्पण के अवसर पर देश के सभी मुख्यमंत्रियों को आने के लिए निमंत्रण भेजा जा चुका है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री विजय रुपाणी जहां खुद आमंत्रण देने असम पहुंचे, वहीं उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने मुंबई में मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को न्यौता दिया तथा गुजरातियों से स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी देखने आने का आग्रह किया। गौरतलब है कि यहां इस स्टैच्यू के अलावा एक श्रेष्ठ भारत भवन, एक म्यूजियम, एक अनुसंधान केंद्र, एक गार्डन और बोटिंग के अलावा सेवा और मनोरंजन की सुविधा भी है।

पर्यटन केंद्र
इसे एक पर्यटन केंद्र के रूप में भी विकसित करने की योजना है। आसपास के आदिवासियों के लिए रोजगार को ध्यान में रखते हुए यहां पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके लिए गुजरात के सीएम विजय रूपाणी ने देश के सभी मुख्यमंत्रियों को उद्घाटन में आने के साथ-साथ यहां अपने राज्य के लोगों के लिए भवन बनाने का आमंत्रण भी भेजा है।

सरदार पटेल संग्रहालय
यहां सरदार पटेल के जीवन पर केंद्रित एक संग्रहालय भी बनाया गया है। इसमें एक दृश्य-श्रव्य गैलरी भी है, जिसमें सरदार पटेल के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को समेटा गया है।

 

 

लेजर लाइट एंड साउंड शो
भारत के एकीकरण में सरदार पटेल के योगदान को पर्यटकों को एक अद्भुत लेजर लाइट एंड साउंड शो के जरिये दिखाया जाएगा।

 

 

 

नाव की सवारी
यहां आने वाले लोगों को वाहनों की ट्रैफिक और प्रदूषण से दूर नर्मदा नदी में स्टैच्यू के पास लगभग 3 किलोमीटर में नौका विहार का मौका मिलेगा। लोग नौका से सीधे स्टैच्यू के प्रवेश स्थल तक पहुंच सकते हैं।

 

अनुसंधान केंद्र
सरदार पटेल देश में सुशासन और कृषि का विकास करना चाहते थे। इसलिए इस अनुसंधान केंद्र में सुशासन और कृषि विकास पर अनुसंधान किया जा सकेगा। इसके अलावा जल प्रबंधन और आदिवासियों के विकास पर भी यहां शोध और अनुसंधान किया जाएगा।

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