सीबीआई में जो कुछ हुआ, वह हर दृष्टि से देश की शीर्ष जांच एजेंसी की छवि पर बट्टा लगाने वाला है। विपक्ष सरकार पर हमले कर रहा है, वकीलों का एक समूह भी सरकार पर सीबीआई की स्वायत्तता में हस्तक्षेप करने का आरोप लगा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो यहां तक कह दिया कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को इसलिए हटाया गया, क्योंकि वो राफेल सौदे के कागजात जुटा रहे थे, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फंसने वाले थे। ये ठीक है कि अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा आदि ने सीबीआई निदेशक से मिलकर राफेल संबंधी शिकायती दस्तावेज दिया था। किंतु सीबीआई ने इसमें न प्राथमिकी दर्ज की, न इसके लिए कोई जांच टीम गठित की।

सीबीआई में जो हो रहा है, उससे सिर्फ इस संस्था की छवि दागदार हुई है। जांच एजेंसी के दो शीर्ष अधिकारियों के बीच शुरू हुआ विवाद सारी सीमाओं को लांघ चुका है। सरकार ने सीवीसी की सलाह पर दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया। विवाद का अंत क्या होगा, नहीं कहा जा सकता है।

सवाल ये भी है कि राहुल गांधी और उनकी सुर में सुर मिला रहे नेताओं को ये जानकारी कहां से मिल गई कि आलोक वर्मा राफेल से संबं कागजात जुटा रहे थे? इस सौदे से संबंधित कागजात प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय, सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति, फ्रांस के राष्ट्रपति का कार्यालय, फ्रांस की दसॉल्ट कंपनी, रिलायंस डिफेंस सहित वो तमाम कंपिनयां, जिनके साथ दसॉल्ट ने करार किया है, के पास हो सकते थे। क्या सीबीआई के लोग इनमें से कहीं गए? वस्तुत: वर्मा की छुट्टी को राफेल से जोड़ना निहायत ही घटिया और निराधार आरोप है। कांग्रेस का वर्मा के पक्ष में देश में किया गया प्रदर्शन भी केवल राजनीति है। दरअसल, कांग्रेस किसी भी सीमा तक जाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि को दागदार साबित करने की रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस अभी वर्मा की हमदर्द बनी हुई है, लकिन उसने ही निदेशक के रूप में उनके चयन का विरोध किया था। अब कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में वर्मा को छुट्टी पर भेजने की तीखी आलोचना की। अपनी चिट्ठी में खड़गे ने लिखा, ‘पूर्ववर्ती अधिकारी (आलोक वर्मा) के खिलाफ लंबित कोई एफआईआर, कोई मामला, कोई अभियोजन नहीं है और चयन समिति के सामने उनके विरुद्ध कोई साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसने 17 महीने पहले उनका चुनाव किया था। जबकि विशेष निदेशक (अस्थाना) की नियुक्ति के समय ही उनके विरुद्ध कई आरोप लगाए गए थे।’ कांग्रेस ने ही नहीं, कॉमन कॉज की ओर से वर्मा की छुट्टी के खिलाफ याचिका डालने वाले प्रशांत भूषण ने भी उनका उस समय विरोध किया था।
उन पर कई आरोप लगाए थे। प्रशांत भूषण तो अंतरिम निदेशक एम नागेश्वर राव पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सब कुछ जानबूझकर एक विशेष एजेंडा के तहत किया जा रहा है। तथ्य और सच्चाई से इनका लेना-देना नहीं है। न ही इनको सीबीआई की साख, विश्वसनीयता या उसकी कार्यकुशलता से सरोकार है। हर संस्थान में अमूमन समान स्तर के या नंबर एक एवं नंबर दो के अधिकारियों के बीच द्वंद्व रहता है। किंतु यहां मामला सारी सीमाओं को लांघ गया था। निदेशक के निर्देश पर विशेष निदेशक के खिलाफ ही घूस लेने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई। उसके पहले विशेष निदेशक ने निदेशक के खिलाफ कैबिनेट सचिव एवं केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के पास घूसखोरी सहित भ्रष्टाचार एवं अनियमितता के दस आरोप वाला शिकायत पत्र दायर किया था। जब लड़ाई यहां तक पहुंच गई, तो फिर सरकार को कुछ न कुछ कदम तो उठाना ही था। तात्कालिक रास्ता यही था कि दोनों अधिकारियों को उनके प्रभार से तत्काल मुक्त कर छुट्टी पर भेज दिया जाए। उच्चतम न्यायालय ने भी सरकार के इस कदम की परोक्ष रूप से पुष्टि ही की है। वास्तव में यह एक असाधारण स्थिति में उठाया गया कदम है। इस प्रकरण से न केवल सीबीआई की विश्वसनीयता, साख और प्रतिष्ठा पर गहरा आघात लगा है, बल्कि कामकाज का माहौल भी खराब हुआ है। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने भी आलोक वर्मा की याचिका पर शीर्ष अदालत के पूर्व जज की देखरेख में सीवीसी द्वारा दो हμते में जांच पूरी करने का निर्देश दिया है। सीवीसी ने स्वयं आलोक वर्मा के रवैये को अस्वीकार्य बताया है। सीवीसी को 24 अगस्त 2018 को राकेश अस्थाना की ओर से शिकायत मिली थी, जिसमें निदेशक सहित सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों पर विभिन्न आरोप लगाए गए थे। सीवीसी ने तीन नोटिस जारी कर सीबीआई निदेशक को आयोग के समक्ष 14 सितंबर को फाइल और दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। इन दस्तावेजों को उपलब्ध कराने के लिए सीबीआई को कई मौके दिये गए लेकिन हर बार निराशा मिली। अंत में सीबीआई ने आयोग को 24 सितंबर को तीन हμतों में दस्तावेज मुहैया कराने का आश्वासन दिया। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सीवीसी ने साफ कहा कि गंभीर आरोपों से जुड़े मामलों में आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराने में सीबीआई निदेशक सहयोग नहीं कर रहे थे। सीबीआई निदेशक का रवैया असहयोगजनक था और उन्होंने इरादतन आयोग की कार्यप्रणाली को बाधित करने की कोशिश की। सीवीसी ने इसे असाधारण और अभूतपूर्व परिस्थिति करार देते हुए सीवीसी कानून 2003 की धारा 8 के तहत कार्रवाई करते हुए अगले आदेश तक निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना से सारे अधिकार एवं क्रियाकलाप वापस लेने की अनुशंसा की। इसके बाद सरकार ने असाधारण और अभूतपूर्व परिस्थिति मानते हुए सीवीसी की रिपोर्ट एवं अनुशंसाओं का अध्ययन करन् ो के बाद दोनों को छुट्टी पर भेज दिया। बता दें कि ज ब अनिल सिन्हा निदेशक पद से 2 दिसंबर 2016 को सेवानिवृत्त हुए तो राकेश अस्थाना को अंतरिम निदेशक का पद भार दिया गया। उस समय ऐसा लगा कि अंतत: अस्थाना को ही यह पद मिलेगा। किंतु विपक्ष व सक्रियतावादियों ने इतना हंगामा किया कि ऐसा न हो सका। फिर चयन समिति की अनुशंसाओं के आधार पर आलोक वर्मा को 1 फरवरी 2017 को निदेशक नियुक्त किया गया। उस समय अस्थाना सबसे वरिष्ठ थे। उसके बाद उनको प्रोन्नत करने की कोशिश हुई। अक्टूबर 2017 में उनकी विशेष निदेशक के रूप में नियुक्ति पर विचार करने के लिए सीवीसी के नेतृत्व वाले पांच सदस्यीय पैनल की बैठक में वर्मा ने विरोध किया। वर्मा का मानना था कि अधिकारियों के इंडक्शन को लेकर उनके द्वारा की गई सिफारिश को अस्थाना ने बिगाड़ दिया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि स्टर्लिंग बायोटेक घोटाले में अस्थाना की भूमिका के कारण सीबीआई भी घेरे में आ गई। उनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं। उसमें उन पर 3.88 करोड़ घूस लेने का आरोप लगा। हालांकि पैनल ने आपत्ति को खारिज कर दिया। मामला उच्चतम न्यायालय भी गया जहां उनकी नियुक्ति को सही करार दिया गया। पर वर्मा अपनी पराजय स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। सीबीआई पर नजर रखने वालों को पता है कि वर्मा ने अस्थाना को महत्वहीन बनाने की पूरी कोशिश की। दूसरी ओर अस्थाना ने भी इस लड़ाई में वर्मा के विरुद्ध उनके अधिकार क्षेत्र में जो हो सकता था किया। दोनों के बीच इतना गहरा टकराव चल रहा था। मीडिया के माध्यम से खबरें आ रही थी।

सरकार को उम्मीद नहीं थी कि मामला यहां तक पहुंच जाएगा। जो प्राथमिकी दर्ज हुई, उसके अनुसार तेलंगाना के कारोबारी सतीश बाबू सना ने मांस कारोबारी मोईन कुरैशी मामले से अपनी मुक्ति के लिए सीबीआई के विशेष निदेशक को 2.95 करोड़ रुपये दिए हैं। 4 अक्टूबर को वर्मा गुट ने सना को पकड़ा और उसने अस्थाना के खिलाफ बयान दे दिया। अस्थाना और देवेन्द्र कुमार के अलावा सीबीआई की एफआईआर संख्या 13।/2018 में मनोज प्रसाद और सोमेश्वर प्रसाद उर्फ सोमेश का नाम भी अभियुक्त के तौर पर दर्ज किया गया है। एफआईआर में दिसंबर 2017 से अक्टूबर 2018 के बीच रिश्वत लेने की बात कही गई है। वर्मा के आदेश पर सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज करने से पहले 9 फोन कॉल रिकॉर्ड किए थे। सीबीआई कह रही है कि अस्थाना और खुफिया विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के बीच 17 अक्टूबर 2018 को चार बार फोन पर बात हुई। सीबीआई ने उन नौ फोन कॉल्स को सुबूत के तौर पर रखा है, जो बिचौलिये मनोज प्रसाद की गिरμतारी के बाद की गईं। इनके अतिरिक्त कई वाट्सएप संदेशों को भी सुबूत के तौर पर रखा गया है। ये संदेश मनोज के मोबाइल फोन से बरामद हुए हैं। इन सबके बीच ही वर्मा ने अस्थाना से कई महत्वपूर्ण मामले वापस लेकर एके शर्मा को सौंप दिया। इसमें दिल्ली सरकार के मामले, आईआरसीटीसी घोटाला, पी चिदंबरम और अन्य के खिलाफ जांच शामिल थी। अस्थाना के स्टाफ का भी तबादला कर दिया गया। जिस सना से रिश्वत लेने का आरोप अस्थाना पर लगा है, उसी सना के बयान के आधार पर अस्थाना ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर आलोक वर्मा पर उससे दो करोड़ रुपये घूस लेने का आरोप लगाया था। अब मामले को एक साथ मिलाकर देखिए। अस्थाना एवं अन्य पर दर्ज प्राथमिकी एवं वर्मा के खिलाफ अस्थाना के आरोप दोनों सतीश सना के बयान के ही आधार पर हैं। किंतु एक ओर पूछताछ का हवाला है, जबकि दूसरी ओर सना की लिखित शिकायत तथा 164 के अंतर्गत दर्ज बयान है। इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि अगर अस्थाना ने घूस लिया था, तो उनकी अगुवाई वाली टीम ने ही सना के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर क्यों जारी किया, जिसके कारण वह सपरिवार विदेश न जा सका? यह भी समझना मुश्किल है कि अगर उन्होंने घूस लिया था तो फिर सना को गिरμतार कर पूछताछ करने के लिए निदेशक के पास पत्र क्यों भेजा? अगर उन्होंने घूस लिया तो कैबिनेट सचिव एवं मुख्य सतर्कता आयुक्त को भेजे पत्र में वर्मा पर दो करोड़ घूस लेने का आरोप क्यों लगाया? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर तो स्वतंत्र जांच से ही मिल सकेगा। आलोक वर्मा को घेरने के लिए अस्थाना सतीश सना से कड़ाई करना चाहते थे। दूसरी ओर वर्मा के लोग उसी सतीश सना का इनके खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश में लगे थे। यह साफ देखा जा सकता है कि लंबे समय से सीबीआई ने प्रमुख और चर्चित मामलों में कोई प्रगति नहीं की है। अस्थाना कई हाई प्रोफाइल मामलों की जांच की निगरानी कर रहे थे। इसमें अगस्ता वेस्टलैंड चॉपर घोटाला, शराब कारोबारी विजय माल्या कर्ज धोखाधड़ी, आईएनएक्स मीडिया और एअरसेल मैक्सिस घोटाला, जिसमें कार्ति चिदम्बरम एवं पी. चिदम्बरम आरोपी हैं, भूपेन्द्र हुड्डा द्वारा जमीन आवंटन का मामला (इसमें रॉबर्ट वाड्रा भी फंस सकता है), लालू यादव का आईआरसीटीसी घोटाला एवं परिवार संबंधी मामले आदि शामिल हैं। प्रश्न है कि ऐसी स्थिति में सरकार कुछ न करे तो सरकार होने का अर्थ क्या रह जाएगा? स्वायत्ता का अर्थ यह नहीं है कि संस्था के अंदर गंद मचाने की पूरी आजादी हो। आलोक वर्मा तो एम. नागेश्वर राव की नियुक्ति को भी चुनौती दे रहे हैं। वे सरकार के साथ सीवीसी के कदम को भी अवैध करार दे रहे हैं। उन्होंने सरकार पर भी आरोप लगा दिया है।

किसने लिया घूस
कहां गया पैसा?

इस मामले में इतना तो तय है कि सतीश सना ने रुपये दिए हैं। रुपये किसके पास पहुंचे यह कहना मुश्किल है। अस्थाना ने स्वयं उसी सना के बयान के आधार पर कैबिनेट सचिव एवं सीवीसी को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि आलोक वर्मा ने दो करोड़ रुपये घूस लिये। कैबिनेट सचिव ने इसी शिकायती पत्र को सीवीसी के पास जांच के लिए भेजा। वर्मा के खिलाफ अस्थाना ने भले ही प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई लेकिन सीवीसी के यहां शिकायत तो की ही है। अस्थाना ने प्राथमिकी दर्ज होने के चार दिन बाद 19 अक्टूबर को सना को गिरμतार कर पूछताछ करने की अनुमति मांगी थी। मतलब ये कि तब तक उन्हें अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी का पता नहीं था। उनके मुताबिक इस संबंध में 20 सितंबर, 2018 को निदेशक को एक प्रस्ताव भेजा गया था। निदेशक ने करीब चार दिनों तक फाइल रखी और 24 सितंबर, 2018 को उसे अभियोजन निदेशक (डीओपी) के पास भेजने का निर्देश दिया। अभियोजन निदेशक ने रिकॉर्ड में मौजूद सभी सबूत मांगे। अस्थाना ने कहा है कि यह फाइल डीओपी द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर के साथ फिर तीन अक्टूबर को सीबीआई निदेशक के समक्ष रखी गई लेकिन अबतक नहीं लौटी है। अस्थाना ने यह भी दावा किया कि फरवरी में जब उनकी टीम ने सना से पूछताछ की कोशिश की थी, तो वर्मा ने फोन कर रोक दिया। अस्थाना की ओर से जो बातें बाहर आई हैं, उनके अनुसार सतीश सना ने एक अक्टूबर, 2018 को पूछताछ में बताया कि वह टीडीपी के सांसद एसएम रमेश से मिला, जिसने वर्मा से मुलाकात करने के बाद उसे आश्वासन दिया कि इस मामले में उसे क्लीनचिट दे दी जाएगी। उसने दो करोड़ रुपये देने की बात इसी में कही है। हालांकि रमेश बाबू ने इस तरह की किसी घटना से ही इनकार किया है। वे कह रहे हैं कि आज तक उनकी सीबीआई की किसी चपरासी तक से भेंट नहीं हुई है। किंतु सना ने केवल उनका ही नाम क्यों लिया? यह भी जांच का विषय है।

वर्मा ने केंद्र और केंद्रीय सतर्कता आयोग के कदम को प्रमुख जांच एजेंसी की स्वायत्तता में हस्तक्षेप कहा है। उनका कहना है कि सीबीआई को स्वतंत्र होना चाहिए, नहीं तो जांच एजेंसी का स्वतंत्र संचालन प्रभावित होता है। यह एक बड़ा प्रश्न है जिसमें सीबीआई को सरकार के किसी विभाग से ही अलग करने की अपील है। इस तरह देश की सारी संस्थाएं अगर सरकार से अपने को अलग करने की मांग करें तो फिर सरकार की जरुरत क्या रह जाएगी? इनकी स्वच्छंदता को नियंत्रित कौन करेगा? ये सच है कि इतना बड़ा आॅपरेशन प्रधानमंत्री की सक्रियता से ही हुआ है।

पूरी रात वे स्थिति समझ रहे थे। सीवीसी का विचार उन तक पहुंच चुका था। उसके बाद निर्णय की बारी थी। अगर सच में सरकार का हस्तक्षेप होता तो अस्थाना पर प्राथमिकी दर्ज ही नहीं होती। विपक्ष अस्थाना को मोदी का चहेता अधिकारी बता रहा है। लेकिन अस्थाना ने गुजरात के ही दूसरे अधिकारी एके शर्मा को भी वर्मा के साथ लपेट दिया। एके शर्मा को भी मोदी और अमित शाह का विश्वासपात्र कहा जा रहा है। इस पूरे प्रकरण का परिणाम जो भी हो, यह साफ हो गया है कि सीबीआई के हालात अच्छे नहीं हैं। सीबीआई के अंदर लड़ाई चरम पर थी, जो इस मामले से सामने आ गई है। अंदर और भी ऐसा बहुत कुछ होगा, जिसकी जानकारी हमको-आपको नहीं है। अगर ठीक से जांच हो, तो जड़ जमा चुकी गुटबंदी, गंदगी, भ्रष्टाचार तथा अधिकारियों के बिचौलियों से संबंधों का पूरा तंत्र सामने आएगा। उम्मीद करनी चाहिए कि सीवीसी की निगरानी में इस पूरे तंत्र का पदार्फाश हो सकेगा। इस पूरे प्रसंग से सीबीआई की छवि पर यकीनन बड़ा धब्बा लगा है। इस छवि से संस्था को बाहर निकालने की आवश्यकता है। यह सबकी जिम्मेदारी है। 

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