दीनदयाल उपाध्याय का भारतीय राजनीति में जब भी जिक्र होता है, उनके बारे में एकांगी तरीके से ही विचार बनाया जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के प्रति जिस तरह का नैरेटिव विकसित हुआ है, उसकी वजह से दीनदयाल की राजनीतिक महत्ता को नकार दिया जाता है। लेकिन दीनदयाल उपाध्याय के भाषणों और साहित्य के साथ ही उनके राजनीतिक कदमों से जैसे गुजरते हैं, तो पता चलता है कि वे गांधी, लोहिया का ही विस्तार हैं।

दीनदयाल उपाध्याय अपने भाषणों और साहित्य से गांधी और लोहिया का ही विस्तार लगते हैं। तीनों ने अपने प्रखर विचारों, भारतोन्मुखी सोच और पुरातन जड़ों के साथ आधुनिकता की मुकम्मल तलाश करने की जो कोशिश की है, वही इनको बाकी विचारकों से अलग बनाती है।

1962 में नैनीताल में सप्तक्रांति सुझाते हुए लोहिया ने जो व्याख्यान दिया था, उसमें बीसवीं सदी को दुनिया की अब तक की सबसे क्रूर सदी बताया था। यह संयोग ही है कि इसी क्रूर सदी को भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे ज्यादा जिन तीन शख्सियतों ने प्रभावित किया, उनमें से एक दीनदयाल उपाध्याय भी थे। इस सूची में पहला नाम निश्चित तौर पर लोहिया के गुरु महात्मा गांधी का है और दूसरा नाम राम मनोहर लोहिया का है। तीनों ने अपने प्रखर विचारों, भारतोन्मुखी सोच और पुरातन जड़ों के साथ आधुनिकता की मुकम्मल तलाश करने की जो कोशिश की है, वही उनको बाकी विचारकों से अलग बनाती है। गहराई से देखें तो तीनों की दृष्टि इन बिंदुओं पर एक समान है। गांधी जी ने भावी भारत की व्यवस्था के लिए 1909 में जिस किताब हिंद स्वराज को लिखा था, इसके ठीक 56 साल बाद दिए अपने व्याख्यानों में दीनदयाल उपाध्याय उसी का विस्तार करते हैं। एकात्म मानववाद के तौर पर विख्यात दीनदयाल उपाध्याय का यह विचार भारत को समझने, अपने सांस्कृतिक उत्स के सहारे न सिर्फ भौतिक, बल्कि वैचारिक विकास की ओर प्रेरित करने की भी कोशिश करता है। लोहिया भी जब राम, शिव या कृष्ण या आगे जाकर सप्तक्रांति की बात करते हैं, तो दरअसल वे भी भारतीयता की पारंपरिक वैचारिक भूमि पर सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न विकास की ही बात करते हैं।

गांधी जब खुद को हिंदू कहते हैं, तो वे दरअसल हिंदुत्व की उस सांस्कृतिक ताकत को स्वीकार करते हैं, जिसके सहारे भारतीयता की अजस्र धारा हजारों-हजार साल से अपनी यात्रा करती हुई यहां तक पहुंच पाई है। उन्होंने जिस रामराज की कल्पना की है, वह निश्चित तौर पर त्रेता युग के राम का ही राज्य है, जिसके बारे में तुलसीदास कहते हैं-

दैहिक, दैविक, भौतिक तापा।

रामराज नहिं काहुहि ब्यापा।।

गांधी राजनीति में रहते हुए भी एक हद तक मौजूदा राजनीति की कलाबाजियों से दूर थे। इसीलिए उनके राजनीतिक दर्शन में प्रवाह दिखता है, सहजता भी दिखती है। कई बार संत की तरह कोमलता भी नजर आती है। गांधी के संकल्पों और सोच में उस भारतीय नागरिक का विकास केंद्र में है, जो हाशिए पर है, जो आखिरी पंक्ति का व्यक्ति है, जिसे वे दरिद्रनारायण कहते हैं। लोहिया चूंकि सीधे राजनीति में थे, आधुनिक राजनीति के तौर-तरीकों के बीच उन्हें अपनी राह बनानी थी, इसलिए वे कई बार गांधी की तरह संत नहीं दिखते। उनमें गांधी जैसी विनम्रता नहीं दिखती। क्षुब्ध होने पर वे गांधी की तरह अनशन नहीं करते, बल्कि खुलकर मैदान में आ जाते हैं। संसद में तीन आने बनाम पच्चीस हजार की बहस इसी का विस्तार है। लोकसभा में लोहिया 1963 में पहुंचे और उन्होंने लोकसभा की बहसों को जनोन्मुखी बना दिया। संसद की बहसों के केंद्र में जो आम आदमी आया, वह दरअसल गांधी का ही दरिद्रनारायण था। चूंकि दीनदयाल को संसद पहुंचने का मौका नहीं मिला, इसलिए संसदीय बहस में उनका सीधा कोई योगदान नहीं बन पाया, लेकिन अपने वैचारिक दर्शन में वे जिस अंत्योदय की बात करते हैं, उसके केंद्र में भी वही आम आदमी है, जिसके लिए रोजाना तीन आने भी मयस्सर नहीं। साठ के दशक में जब लोहिया ने लोकसभा में तीन आने बनाम पच्चीस हजार की बहस चलाई थी, उस समय एक आम भारतीय बमुश्किल रोजाना तीन आने कमा पाता था, जबकि तब प्रधानमंत्री का रोजाना का खर्च पच्चीस हजार रुपये था। गांधी जहां हिंद स्वराज में दरिद्रनारायण की रोटी में भगवान का अंश देखते हैं, वहीं लोहिया इसमें समाजवाद का विस्तार देखते हैं। लेकिन दीनदयाल इससे भी आगे की बात करते हैं। वे कहते हैं कि संस्कृति पर विचार किए बिना स्वराज का कोई मायने नहीं। अगर इसे सही अर्थों में विस्तारित किया जाए तो एकात्म मानववाद सांस्कृतिक रामराज का ही व्याख्यायित रूप है। रामराज की कल्पना के मूल में है, जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी। लोहिया की तकरीरों और दीनदयाल के विराट दर्शन के मूल में इसी का विस्तार है।

गांधी और दीनदयाल के विचारों में एक और समानता नजर आती है। दोनों धर्म और राजनीति में साम्यता के मुद्दे पर एक हैं। दोनों ही धर्म को पश्चिमी रिलीजन के अर्थ में नहीं लेते। 1916 में मद्रास में स्वदेशी पर भाषण देते हुए गांधी ने कहा था मेरे लिए धर्मरहित राजनीति शव के समान है। जिसे दफना देना ही उचित है और मुझे ऐसा लगता है कि यदि राजनीति को धर्म से विछिन्न करने का प्रयत्न नहीं किया गया होता, जैसा कि आज हो रहा है तो जिस हद तक राजनीति का आज पतन हुआ है, दिखाई पड़ रहा है, वह उस हद तक न गिरती।

दीनदयाल भी गांधी के इस विचार की ही तरह धर्म को राजनीति के लिए जरूरी मानते हैं। उनके मुताबिक भी बिना धर्म के राजनीति में सर्वांगीण विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। लोहिया तो इससे आगे की बात कहते हैं। लोहिया कहते हैं, आज धर्म और राजनीति का रिश्ता बिगड़ गया है। धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म है। धर्म श्रेयस की उपलब्धि का प्रयत्न करता है। राजनीति बुराई से लड़ती है। जब धर्म में बुराइयां आ जाती हैं, तो वह झगड़ालू बन जाता है। जब राजनीति बुरी लगती है, मुर्दा होकर श्मशान शांति बन जाती है।

गांधी ने एक जगह कहा है मेरे राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक विचार एक ही वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं। लेकिन कोई मूर्ख या भीरू यदि धर्मरूपी हीरा बेचकर राजनीतिक कंकड़ लेने लगे तो क्या मैं अपना धर्म छोड़ दूं, दीनदयाल भी इसी तरह राजनीति को संयमित करने के लिए धर्म को केंद्रीय तत्व मानते थे। उनकी विचारधारा प्रलोभनों के सहारे धर्मांतरण के विरोध में थी, तो गांधी भी ऐसा ही सोचते थे। गांधी जहां हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते रहे, वहीं लोहिया भी दीनदयाल की तरह मानते थे कि देश के मुसलमानों के पूर्वज भी हिंदू ही हैं। इसलिए दोनों एक ही हैं।

गांधी, लोहिया और दीनदयाल के विचारों में समानता देखनी हो तो अस्पृश्यता, जाति प्रथा, ट्रस्टीशिप, हर हाथ को काम, विकेंद्रित अर्थव्यवस्था, ग्रामोदय, अंत्योदय, लघु-कुटीर उद्योगों के विकास, ग्राम स्वराज, गौवंश संरक्षण, साधनों की पवित्रता, शिक्षा और संस्कृति, मातृभाषा, आदि विषयों के संबंध में गांधी, लोहिया और दीनदयाल के विचारों में समानता खूब दिखती है। तीनों का प्रमुख उद्देश्य मानवता की सेवा है, इसलिए तीनों के विचारों में राजनीति राष्ट्रसेवा का साधन है, जिंदगी का लक्ष्य नहीं।

गांधी को छोड़ दें तो लोहिया ने समाजवादी मंच से हिमालय बचाओ, तीर्थों की स्वच्छता, गंगा-यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने, रामायण मेला आदि का अभियान चलाया, मातृभाषा को ताकत दिलाने के लिए आंदोलन किया, वहीं दीनदयाल ने संपत्ति के सामाजिक स्वामित्व, अधिकतम और न्यूनतम आय के विषयों को जनसंघ के मंच पर रखा। यानी समाजवादी मंच पर लोहिया ने उन बातों को रखा, जो जनसंघ के लक्ष्यों में शामिल थे तो जनसंघ के मंचों से दीनदयाल ने समाजवादी लक्ष्यों को प्रस्तुत किया। मानवता की सेवा के लिए दोनों ने अपने वैचारिक दर्शन में लचीलापन दिखाया। शायद यही वजह है कि दोनों को लेकर सबसे उल्लेखनीय विचार डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी के हैं। एक व्याख्यान में उन्होंने कहा है, ‘सिद्धांतों की दृष्टि से डॉक्टर लोहिया और दीनदयाल एक-दूसरे के पूरक थे। सामान्यत: माना जाता है कि दीनदयाल जी राष्ट्रवादी मंच के समाजवादी विचारक थे।’

दुनिया जानती है कि लोहिया समाजवादी होते हुए भी गांधी के भक्त थे। इस लिहाज से देखें तो दीनदयाल के विचार भी गांधी के विचारों से मिलते हैं। तीनों ने निष्काम राजनीतिक धर्म की जो परिभाषा देश को दी है, देश का कल्याण उसी विचार पर चलकर हो सकता है। इसे पहली बार 1963 में डॉक्टर लोहिया ने समझा और गैर कांग्रेसवाद का सिद्धांत दिया। जिस पर आगे चलकर 1967 में जनसंघ और समाजवादी दलों के बीच वैचारिक और राजनीतिक सहयोग शुरू हुआ। जिसने भारतीय इतिहास को ही बदलकर रख दिया। जब देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। गांधी, लोहिया और दीनदयाल के बीच की वैचारिक समानता ही रही कि 1974 के छात्र आंदोलन में समाजवादी और राष्ट्रवादियों ने मिलकर मोर्चा संभाला। 1977 के आम चुनावों में समाजवाद और राष्ट्रवाद के मेल की वजह से ही इंदिरा गांधी की शक्तिशाली सत्ता को शिकस्त दी जा सकी।

गांधी और दीनदयाल के विचार एक और जगह मिलते हैं। गांधी राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर ही बदलाव की उम्मीद देखते थे। दीनदयाल उपाध्याय कार्यकर्ताओं को लेकर कैसी सोच रखते थे, इसके बारे में विश्वनाथ नारायण देवधर ने लिखा है कि दल का संगठन करते समय पंडितजी मनुष्य निर्माण का कार्य भी करते थे। वह कहते थे कि कार्यकर्ता निर्जीव वस्तु नहीं होता, जिसे पोस्टर की भांति जहां चाहा, चिपका दिया।

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