माई समीकरण के बूते एक दशक से भी अधिक समय तक बिहार की राजनीति के अजेय योद्धा रहे लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप की बगावत से महागठबंधन की संभावनाओं को पलीता लगना तय है।

हार में इन दिनों लोकसभा के चुनावी महाभारत में लालू परिवार में सियासी जंग छिड़ा है। खुद को कृष्ण और छोटे भाई तेजस्वी को अर्जुन बताने वाले लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप ने राजद में अपनी अहमियत कायम रखने के लिए बगावत का बिगुल बजा दिया है। पांडवों के पांच गांव की मांग की तर्ज पर लोकसभा की जहानाबाद और शिवहर सीटों से अपने पसंदीदा को उम्मीदवार नहीं बनाने और सारण से ससुर चंद्रिका राय को उम्मीदवार बनाने के विरोध स्वरूप तेज प्रताप ने लालू-राबड़ी मोर्चा बनाकर कम से 20 सीटों पर राजद से जुड़े लोगों को उम्मीदवार बनाने के साथ खुद भी सारण से ही निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है।

दूसरी तरफ, तेज प्रताप यादव की बगावत को लेकर बीजेपी और जेडीयू उन पर मेहरबान दिख रही हैं। चुनावी संग्राम के बीच दोनों विरोधी पार्टियां लालू के बेटे तेज प्रताप के पक्ष में उतर आई हैं। यानी घरवालों से नाराज लालू के बेटे को बाहर वालों का साथ मिलने लगा है। तेजप्रताप के जरिए पारिवारिक कलह सतह पर आने से कोर्ट-कचहरी, सीबीआई, आईटी और इडी की कार्रवाई से मुश्किलों में घिरे लालू परिवार की राजनीतिक फजीहत हो रही है। विपक्ष की ओर से ताना मारा जा रहा है कि नमो-नीतीश को लोकसभा के चुनाव में छह दलों को साथ लेकर घेरने चला राजद खुद पारिवारिक विवाद में उलझ गया है। इस चुनाव में तेजप्रताप की बगावत क्या गुल खिलायेगी यह तो आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा।

वंशवाद की कलह झेल रहा राजद:
सुशील मोदी भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने तेजप्रताप की बगावत को वंशवाद की कलह करार दिया है। उनका कहना है कि वंशवादी राजनीतिक पार्टियों में जब दो वारिस हो जाते हैं, तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सुशील मोदी के मुताबिक यह दो वारिसों के बीच का संघर्ष है। सारण से तेज प्रताप यादव के ससुर को टिकट देना उनके लिए जले पर नमक छिड़कने जैसा है। आरजेडी तेज प्रताप के जले पर नमक छिड़कने का काम कर रही है। सुशील मोदी यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि आरजेडी के कार्यकर्ताओं में तेज प्रताप की मांग ज्यादा है। लोगों का कहना है कि तेज प्रताप के भाषण देने की शैली लालू प्रसाद जैसी है। यह संघर्ष अब थमने वाला नहीं है।

फिलहाल तीन दशक के दौरान पहली बार लालू की अनुपस्थिति में हो रहे इस चुनाव में तेजप्रताप मीडिया के फोकस बनने के साथ विपक्ष के लिए राजनीतिक हथियार बनने की ओर अग्रसर हैं। वैसे राजनीतिक पंडितों का मानना है कि तेजप्रताप का विरोध कहें या बगावत, जिस तरह से मीडिया की सुर्खियां बटोर रही है उससे पार्टी की संभावनाओं पर बुरा असर पड़ने से इनकार नहीं किया जा सकता। तेजप्रताप के तेवरों को देखकर लग रहा है कि वे इस बार आरपार के मूड में हैं। फिलहाल उन्होंने शिवहर से अंगेश सिंह और जहानाबाद से सुरेन्द्र यादव की जगह चंद्र प्रकाश यादव को उम्मीदवार बनाने के लिए पार्टी को अल्टीमेटम दे रखा है। राबड़ी देवी को सारण से उम्मीदवार बनाये जाने की भी उनकी मांग है।

भाइयों की जंग में बहन भी एक कोण
लालू-राबड़ी देवी की सात बेटियां और दो बेटे हैं। राजद के संस्थापक अध्यक्ष लालू प्रसाद ने चारा घोटाला मामले में सजा के बाद जेल जाने की नौबत देख छोटे बेटे को राजनीतिक विरासत संभालने की जिम्मेवारी सौंप दी थी। भाजपा के विरोध के बहाने बिहार की सत्ता में नीतीश के साथ भागीदारी मिलने पर लालू ने अपने दोनों बेटों को स्थापित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। पहली बार राघोपुर विधानसभा क्षेत्र से जीते छोटे बेटे तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री के साथ पथ एवं भवन निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी दिलवायी। उसी तरह बड़े बेटे तेजप्रताप को भी पहली बार महुआ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीताकर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और वन एवं पर्यावरण विभागों की जिम्मेदारी दिलवायी। फिलहाल पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी पार्टी की वरीय उपाध्यक्ष और विधान परिषद में विपक्ष की नेता हैं। छोटे बेटे पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। बड़ी बेटी डा. मीसा भारती राज्यसभा की सदस्य और फिलहाल पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र से राजद की उम्मीदवार हैं। राजद में लालू प्रसाद के मुख्यमंत्रित्वकाल में दो साले साधु-सुभाष की चलती बनती थी। लालू के जेल में जाने के बाद अब राजद में तेजस्वी की चलती बनती है। जानकारों की मानें तो लालू परिवार में सियासी विरासत की लड़ाई में दो भाइयों के साथ-साथ मीसा भी एक कोण हैं। लोकसभा के पिछले चुनाव में बेटी मीसा को उम्मीदवार बनाने से नाराज होकर रामकृपाल यादव ने पार्टी छोड़ भाजपा प्रत्याशी के रूप में मीसा को हराया था। लोकसभा चुनाव हारने के बाद मीसा को विधानमंडल में जगह नहीं मिलने से परिवार में उभरे असंतोष को दबाने के लिए ही उन्हें जुलाई, 2016 में राज्यसभा भेजा गया था। इस बार के चुनाव में मीसा को उम्मीदवार बनाने के लिए तेजप्रताप ने न सिर्फ पहले आवाज बुलंद की, बल्कि मनेर से चुनाव अभियान भी शुरू कर दिया था। टिकट के दावेदार मनेर के राजद विधायक भाई वीरेन्द्र आहत भी हुए पर लालू परिवार के सत्ता संघर्ष में अपने को किनारे रखना ही मुनासिब समझा है।

वह तो यहां तक कह चुके हैं कि सारण उनकी पारिवारिक सीट है। यहां से किसी अन्य की उम्मीदवारी वह नहीं मानेंगे, चाहे वह पार्टी का कोई नेता ही क्यों न हो। अगर राबड़ी देवी चुनाव नहीं लड़ेंगी तो वह खुद ही लालू-राबड़ी मोर्चा के तहत इस सीट से लड़ने की बात कह चुके हैं। बहरहाल, पिछले तीन दशकों से लालू प्रसाद सत्ता में रहे या सत्ता से बाहर लेकिन बिहार की राजनीति की एक धुरी बने रहे हैं। लालू समर्थन और विरोधी की धारा। यादव-मुस्लिम सामाजिक समीकरण के बूते लालू का न सिर्फ किसी अन्य नेता की तुलना में सबसे बड़ा जनाधार माना जाता है बल्कि आज भी स्वजातीय मतदाताओं पर उनका जादू कायम हैं। इसी का प्रभाव है कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी लालू के आगे नतमस्तक रही है।

राजनीतिक हक की लड़ाई:
नीरज कुमार राज्य की सत्ताधारी दल जनता दल यू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने भी तेज प्रताप के पक्ष में उतरते हुए कहा कि यह राजनीतिक हक की लड़ाई है, जो तेज प्रताप लड़ रहे हैं। नीरज कुमार का कहना है कि तेज प्रताप महुआ सीट से अपने छोटे भाई तेजस्वी से ज्यादा अंतर से विधानसभा चुनाव में विजयी हुए थे। इसके बावजूद उनको वाजिब हक नहीं दिया गया।

फ्रंटफुट पर खेलने का दंभ भरने वाली कांग्रेस को नौ सीटें लेकर समझौता करना पड़ा है। महागठबंधन में कांग्रेस से अधिक 11 सीटें रालोसपा, हम और वीआईपी पाटियों ने मिलकर ले ली। राजद और सहयोगियों को उम्मीद है कि भाजपा के विरोध में मुस्लिम मतदाताओं का एकमुश्त वोट इन्हें मिलेगा। महागठबंधन की जीत की उम्मीद को तेजप्रताप का विरोध पलीता लगा सकता है ऐसा महागठबंधन में शामिल दल नहीं मानते। हालांकि कुछ वोटों के नुकसान होने से इनकार नहीं करते। अगर तेजप्रताप की नाराजगी दूर नहीं हुई और उन्होंने अपनी धमकी के अनुरूप 20 सीटों पर बागियों को मैदान में उतार दिया तो यह महागठबंधन की सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। जानकारों के मुताबिक बागी उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रभाव के अलावा तेजप्रताप के समर्थकों की भी एक अच्छी खासी तादाद है।

 

पार्टी में आपने बगावत क्यों कर दी ?
तेजप्रताप : इसे आप जो समझे। बागी समझे। कोई 10, तो कोई 4 सीट लेकर जा रहा है, लेकिन जब हमने 3 सीट मांगी तो इसपर विवाद शुरू हो गया है। ऐसा क्यों? पार्टी ने जहानाबाद सीट से तीन बार से हार रहे सुरेन्द्र यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है। जो जीत सकता है पार्टी उसे अपना उम्मीदवार क्यों नहीं बनाना चाहती है। मैंने ऐसे ही कुछ बुनियादी सवाल पार्टी के सामने खड़े किए हैं और इसको लेकर ही हमारा विरोध है। मैं सिर्फ ये चाहता हूं कि जो लोग जीत सकते हैं पार्टी उसे अपना उम्मीदवार बनाये। तेजस्वी को आज भी मैं अपना अर्जुन मानता हूं। आशीर्वाद है ऊंचाई पर पहुंचे और कामयाब हो। वह कुछ गलत लोगों से घिरा है। यही लोग परिवार में विवाद कराना चाहते हैं।

बात नहीं मानी तो अगला कदम क्या होगा?
तेजप्रताप : आखिर पार्टी की ऐसी क्या मजबूरी है कि बार-बार उन्हें ही अपना प्रत्याशी बना रही है जो लगातार हार रहे हैं। जो लोग पार्टी को मजबूत बनाने के लिए दिन रात काम करते हैं मैं उनका समर्थन कर रहा हूं। इसमें हर्ज क्या है। बात नहीं मानी तो लालू-राबड़ी मोर्चा के बैनर तले कम से कम के 20 सीटों पर प्रत्याशी खड़े होंगे और मैं उनका प्रचार भी करूंगा। स्पष्ट कर दूं कि मैं बागी नहीं हूं। मैनें मोर्चा बनाया है क्योंकि मैं आरजेडी में एकता चाहता हूं और उसे आगे लेकर जाना चाहता हूं। लेकिन, कुछ ऐसे लोग पार्टी के अंदर हैं जो परिवार के सदस्यों के बीच गलतफहमी पैदा कर रहे हैं और आरजेडी को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं। मैं ऐसा नहीं होने दूंगा।

आप राजद के हिस्से वाली ही 20 सीटों पर प्रत्याशी देंगे?
तेजप्रताप: ऐसा नहीं है। विधानसभा चुनाव के समय भी हमने कुछ लोगों को पिता जी से कह कर टिकट दिलाने का काम किया था। पिता जी ने मेरी बात मानी थी और जिन-जिन लोगों को टिकट दिया था वे सभी जीत गए थे। जबकि पार्टी यहां पर पहले किसी और को अपना प्रत्याशी बनाना चाहती थी। इस दफा भी मैं उन लोगों को ही टिकट देने को कह रहा हूं जो जीत सकते हैं। लेकिन पार्टी मेरी बात नहीं मान रही है। इसी से हमने लालू राबड़ी मोर्चा बनाया है।

क्या आप नई पार्टी बनायेंगे?
तेजप्रताप : नहीं, अभी कोई नई पार्टी बनाने की मंशा नहीं है। लेकिन, मोर्चा के माध्यम से हम अपनी राजनीतिक गतिविधियों को जारी रखेंगे।

क्या आप सारण से चुनाव लड़ेंगे?
तेजप्रताप: ये सीट लालू राबड़ी जी की है। मेरे परिवार की रही है। इस सीट पर मेरे ही परिवार के सदस्य चुनाव लड़ेंगे। कोई बाहरी इस सीट से चुनाव लड़े, मैं सहन नहीं कर सकता। ऐसा हुआ तो फिर मैं स्वंय यहां चुनाव लड़ूंगा।

आपने जो लालू राबड़ी मोर्चा बनाया है क्या इसे आपके माता-पिता का भी समर्थन है?
तेजप्रताप : हम अलग कहा हैं। मैं तो माताजी से सारण से चुनाव लड़ने का अनुरोध कर रहा हूं। मुझे जनता का समर्थन है। लोकतंत्र में जनता ही सब कुछ होती है। इसलिए हमने मोर्चा बनाने की सोची है।

ऐसे में महागठबंधन उम्मीदवारों के समीकरण गड़बड़ा भी सकते हैं। कुल मिलाकर तेजप्रताप के तेवर को देखते हुए साफ लग रहा है कि लालू के दोनों बेटों का सत्ता संघर्ष अब थमने से रहा। फिलहाल तेजस्वी परिवार का मामला बताकर तेजप्रताप की बगावत पर बोलने से बच रहे हैं। राजद से सहानुभूति रखने वाले कुछेक लोगों का मत है कि कि तेजप्रताप को ही सारण के चुनावी जंग में कूदाकर वहां व्यस्त कर देना बेहतर हो सकता है। विवाह के छह महीने के अंदर ही पत्नी ऐश्वर्या को तलाक देने की कानूनी लड़ाई लड़ रहे तेजप्रताप फिलहाल लालू परिवार की मुश्किलें बढ़ाने के एक नये कोण बन गये हैं। साथ-साथ मीसा भी एक कोण हैं। लोकसभा के पिछले चुनाव में बेटी मीसा को उम्मीदवार बनाने से नाराज होकर रामकृपाल यादव ने पार्टी छोड़ भाजपा प्रत्याशी के रूप में मीसा को हराया था। लोकसभा चुनाव हारने के बाद मीसा को विधानमंडल में जगह नहीं मिलने से परिवार में उभरे असंतोष को दबाने के लिए ही उन्हें जुलाई, 2016 में राज्यसभा भेजा गया था। इस बार के चुनाव में मीसा को उम्मीदवार बनाने के लिए तेजप्रताप ने न सिर्फ पहले आवाज बुलंद की, बल्कि मनेर से चुनाव अभियान भी शुरू कर दिया था। टिकट के दावेदार मनेर के राजद विधायक भाई वीरेन्द्र आहत भी हुए पर लालू परिवार के सत्ता संघर्ष में अपने को किनारे रखना ही मुनासिब समझा है।

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