किसान क्रांति यात्रा की राजधानी से वापसी पर नरेन्द्र मोदी सरकार ने निश्चित रूप से राहत की सांस ली होगी। हालांकि विपक्ष को अवश्य इससे निराशा मिली होगी, जो ये सोच कर खुश हो रहा था कि गुस्से में दिख रहे किसान आसानी से नहीं मानेंगे और सरकार की समस्याएं बढ़ेंगी। यह यात्रा यदि दो-चार दिन भी दिल्ली या इसकी सीमा पर रुक जाती, तो संभव था कि विपक्षी नेता पहुंचकर सरकार के खिलाफ दहाड़ते। कांग्रेस इसमें शायद सबसे पहली पार्टी होती। इस वर्ष जहां भी किसान आंदोलन हुए है, उनमें कांग्रेस के नेताओं ने किसी न किसी समय अवश्य शिरकत की है। मध्य प्रदेश के आंदोलन में राहुल गांधी गए थे। जून में हुए गांव बंद, भारत बंद में भी कांग्रेस के नेता दिखे थे। इस बार यह मौका किसी को नहीं मिला। हां, दूसरी जगहों से नेताओं ने बयान अवश्य दिया। राहुल गांधी ने किसानों पर पुलिस कार्रवाई को मुद्दा बनाया, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि हम किसानों के साथ हैं, उनको दिल्ली आने दिया जाए। वास्तव में जिस तरह का दृश्य एक अक्टूबर से दो अक्टूबर तक गाजियाबाद-दिल्ली सीमा पर दिख रहा था, उसमें यह कल्पना कर पाना कठिन था कि आंदोलनकारी इतनी आसानी से सरकार के आश्वासन को स्वीकार कर शांति से वापस चले जाएंगे। इस दृष्टि से विचार करें तो नरेन्द्र मोदी सरकार के कुशल प्रबंधन को श्रेय देना ही होगा।

23 सितंबर को हरिद्वार से शुरू हुई किसान क्रांति यात्रा से विपक्ष काफी उत्साहित था। उसे इसके जरिए सरकार के खिलाफ मुद्दा मिलने की उम्मीद थी। लेकिन केंद्र सरकार न केवल किसानों को शांत रखने में सफल हुई, बल्कि उन्हें मनाने में भी कामयाब रही।

वास्तव में दो अक्टूबर को यात्रा में शामिल लोगों और पुलिस के बीच जिस तरह की मोर्चाबंदी का दृश्य टीवी के माध्यम से सामने आ रहा था, उससे यह भय पैदा हो गया था कि सरकार ने समय रहते यात्रा की गंभीरता को नहीं समझा। अब स्थिति नियंत्रण से बाहर जा रही है और इसका राजनीतिक परिणाम बीजेपी को भुगतना पड़ेगा। वैसे भी भारतीय किसान यूनियन ने पांच सितंबर को पत्रकार वार्ता करके बता दिया था कि उन्होंने सरकार के समक्ष अपनी मांगे रखी हैं तथा 23 सितंबर से वे हरिद्वार से यात्रा निकालकर दो अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन राजधानी दिल्ली पहुंचेंगे। नियत समय पर यात्रा निकली और दिल्ली की सीमा पर पहुंच गई। इस बीच उनसे संपर्क करने की कितनी कोशिशें हुईं, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं हैं। हां, किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की बात अवश्य बताई। मतलब ऐसा नहीं है कि इनसे संपर्क नहीं किया गया। संपर्क था लेकिन जिस तरह की बातचीत होनी चाहिए थी, उसमें कमी थी। जब वे सीमा पर आ गए, तो सरकार ज्यादा गंभीर हुई। प्रधानमंत्री ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह और किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह को लगाया। वे किसान नेताओं से बातचीत करते रहे। प्रधानमंत्री स्वयं उनसे संपर्क में थे। वित्त मंत्री अरुण जेटली भी संपर्क में थे। बातचीत अत्यंत ही सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई। किसान नेताओं को अहसास हो गया कि सरकार ईमानदारी से उनकी समस्याओं का समाधान चाहती है। कुछ मुद्दों पर सहमति भी बन गई।

जब किसान नेता संतुष्ट हो गए, तो प्रश्न था कि साथ आए किसान यात्रियों को सीमा से ही वापस कर दिया जाए या उनको अंदर आने दिया जाए। इनमें एक समस्या यह भी थी कि पुलिस की कार्रवाई से किसान गुस्से में थे। जिस तरह पुलिस बैरिकेड को तोड़ा गया, उनको ट्रैक्टरों से रौंदने की कोशिश हुई, उसमें पुलिस को भी पानी की बौछार, आंसू गैस का सहारा लेने के साथ ही लाठी तक चलाना पड़ा। हालांकि किसी को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ, फिर भी कुछ लोगों को चोटें आईं। आंदोलन को शांत कराना है, तो आंदोलनकारियों की गलती है या नहीं, इस पर विचार नहीं होता। उनकी सारी गलती माफ। पुलिस ही खलनायक बनती है। तो दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने बल प्रयोग के लिए क्षमा मांग लिया। इतना ही उनके लिए पर्याप्त था। किसी पर कोई मामला तो दर्ज हुआ नहीं था कि उनकी वापसी की मांग होती। किसान नेताओं की मांग थी कि वे राजघाट और किसान घाट यानी चौधरी चरण सिंह की समाधि तक जाना चाहते हैं। सरकार ने रात 12.40 बजे किसानों के जत्थे को दिल्ली में किसान घाट जाने की इजाजत दे दी। इसके बाद किसानों का दिल्ली में प्रवेश हुआ। सरकार की ओर से बसों की व्यवस्था की गई। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने उसी समय घोषणा कर दिया कि फिलहाल किसान राजघाट और किसान घाट पहुंचकर लौट जाएंगे। कई मांगें सरकार ने मान ली है और शेष के लिए सरकार ने समय मांगा है। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैट ने कहा कि किसान घाट पर फूल चढ़ाकर हम अपना आंदोलन खत्म कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चूंकि दिल्ली पुलिस ने हमें प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी, इसलिए हमने विरोध किया। हमारा लक्ष्य यात्रा को पूरा करना था जो किया गया है।

किसान क्रांति यात्रा 15 मांगों को लेकर आरंभ किया गया था। इनमें कुछ मांगें ऐसी थीं जिनको मानने में समस्या नहीं है, कुछ में विमर्श तथा बीच का रास्ता निकालने की आवश्यकता है तो कुछ स्वीकार नहीं किया जा सकता। ये बातें किसान नेताओं को भी मालूम थी। तो सरकार ने तत्काल सात मांगों को पूर्णतया या आंशिक रुप से स्वीकार किया। ये हैं-

दस वर्ष से अधिक डीजल वाहनों के संचालन पर एनजीटी की रोक के खिलाफ सरकार पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी। राज्यों को भी इसी की तर्ज पर कार्रवाई करने के लिए सूचित किया जाएगा।
मनरेगा को खेती से जोड़ने के लिए पहले ही नीति आयोग ने मुख्यमंत्रियों की उच्चस्तरीय समिति गठित कर दी है। अब इसमें किसानों के प्रतिनिधि को भी शामिल किया जाएगा।
खेती में काम आने वाली वस्तुओं पर पांच प्रतिशत जीएसटी करने के विषय को जीएसटी काउंसिल में रखा जाएगा।
सरकार की बजट घोषणा के अनुसार उत्पादन लागत पर 50 प्रतिशत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने के निर्णय का रबी फसलों में भी अनुपालन किया जाएगा। उसके अनुसार सभी अधिसूचित फसलों पर घोषणा की जाएगी। साथ ही फसल खरीद की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्य सरकारों को केंद्र की ओर से एडवाइजरी भेजी जाएगी, जिससे सभी फसलों का उचित दाम सुनिश्चित किया जा सकेगा।
पर्याप्त पैदावार होने वाली फसलों के आयात को रोकने के लिए कानून सम्मत प्रयास किया जाएगा। खरीद के लिए अनुमत अवधि को 90 दिन किया जाएगा।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के कार्यान्वयन के संबंध में उठाए गए मुद्दों पर कृषि राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की अध्यक्षता में एक समिति बनेगी। यह फसल बीमा योजना व किसान क्रेडिट कार्ड योजना के कार्यान्वयन में आ रही परेशानियों पर किसान संगठनों से विमर्श के बाद अपनी संस्तुति देगी। इस पर सरकार किसानों के हित में निर्णय लेगी।
जंगली पशुओं द्वारा फसलों को हो रहे नुकसान की भरपाई अब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत की जाएगी। इसके लिए योजना में संशोधन किया जाएगा।

इन आश्वासनों का परिणाम क्या आता है ये हमें देखना होगा। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तथा क्रेडिट कार्ड से संबंधित कैसा सुधार किसान चाहते हैं, यह भी बातचीत से ही स्पष्ट होगा। हालांकि यह मांग मानना मुश्किल है कि सभी बीमा सरकार अपने खर्च से कराए। आत्महत्या करने वाले किसान परिवारों को राहत तो मिलनी ही चाहिए। राज्य सरकारों ने अपनी ओर से कुछ योजनाएं बनाई हुईं हैं, लेकिन वे हर परिवार तक नहीं पहुंचती। वस्तुत: यह साबित करना जरा कठिन होता है कि आत्महत्या का कारण खेती से घाटा या खेती के कर्ज को न चुका पाना या फसलों का नष्ट होना आदि ही था। सबको नौकरी देना भी संभव नहीं, पर उनको बीमा योजनाओं के दायरे में लाकर लाभ जरूर दिया जा सकता है। मोदी सरकार ने जो तीन बीमा योजनाओं की घोषणा की है, उनको किसान परिवारों तक पहुंचाने की जरुरत है। किसान परिवारों का मतलब कृषक, मजदूरों तथा कृषि संबंधी अन्य कार्यों में लगे लोगों से है। उसी तरह 60 वर्ष से उपर के सभी किसानों को पेंशन देना संभव नहीं, लेकिन उनको अटल पेंशन योजना में शामिल तो किया जा सकता है। कोई रास्ता निकाला जाए। फसलों की लागत का डेढ़ गुणा मूल्य देने की घोषणा सरकार जुलाई में कर चुकी है। धान सहित खरीफ की 14 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में औसतन एक साथ 25 प्रतिशत की वृद्धि की गई, जो रिकॉर्ड है। हालांकि यह सी-2 के अनुसार नहीं है, लेकिन उसके एकदम पास है। इस पर बातचीत करके बीच का रास्ता निकल सकता है। क्रेडिट कार्ड में ब्याज कम किया जा सकता है तथा महिला किसानों के लिए अलग से क्रेडिट कार्ड बनाया जा सकता है। जंगली पशुओं का मामला पूरे देश में है। किसान हाहाकार कर रहे हैं। उनकी फसलें नष्ट हो रहीं हैं और किसान उन जानवरों को मार भी नहीं सकते। वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत वे अपराधी हो जाते हैं। हालांकि बिहार जैसे कुछ राज्यों ने उन पशुओं को मारने की इजाजत दी है। यह केन्द्र के साथ राज्यों का भी विषय है। बीमा इसका सही उपचार नहीं है। वन्य जीवों को खेती के क्षेत्र में छोड़ने की नीति बिल्कुल गलत थी, जिसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ रहा है। इन जंगली जानवरों का शिकार कई बार किसान परिवार के लोग भी हो जाते हैं। खेती और निवास के क्षेत्रों से इन्हें जंगलों की ओर धकेला जाए, इसके लिए अभियान चलाना होगा। 10 वर्ष पुराने डीजल वाहनों को खत्म करने का एनजीटी का फैसला तुगलकी फरमान जैसा है। सरकार को इसका विरोध पहले ही करना चाहिए था। किसी गाड़ी का स्वास्थ्य उसकी उम्र से नहीं, उसकी स्थिति से मापा जा सकता है। अगर गाड़ी सही स्थिति में है, प्रदूषण नहीं कर रही, तो उसे नष्ट करने का कोई तुक नहीं है भले उसकी उम्र कितनी भी हो गई हो। इसलिए यह फैसला हर हाल में बदला जाना चाहिए। कृषि पर विचार के लिए संसद का विशेष अधिवेशन बुलाने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। इस पर विचार होना चाहिए।

क्या है किसानों की मांग?

किसानों ने अपनी 15 मांगों को लेकर हरिद्वार से दिल्ली की यात्रा शुरू की थी। ये मांगें हैं

० न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैधानिक

दर्जा दिया जाए। देश भर के किसानों की सभी फसलों और सब्जियों का न्यूनतम समर्थन मूल्य और लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य स्वामीनाथन द्वारा सुझाए गए फार्मूले के अनुसार घोषित किया जाए। यानी सी-2 के अनुसार 50 प्रतिशत अधिक दिया जाए।

० किसानों के सभी तरह के कर्ज माफ किए जाएं। किसान क्रेडिट कार्ड पर ब्याज मुक्त कर्ज मिले तथा महिला किसानों के लिए भी अलग से किसान क्रेडिट कार्ड मिले।

० एनजीटी ने 10 वर्ष से अधिक पुराने डीजल वाहनों के संचालन पर रोक लगा दी है। इसे हटाया जाए।

० प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों के बजाय बीमा कंपनियों को लाभ मिल रहा है। योजना में किसानों के हितों के अनुसार बदलाव कर प्रीमियम का पूर्ण भुगतान सरकारों द्वारा किया जाए।

० किसानों की न्यूनतम आमदनी सुनिश्चित की जाए। लघु व सीमांत किसानों को 60 वर्ष की आयु के बाद कम से कम 5,000 रुपये मासिक पेंशन दी जाए।

० नीलघोड़ा, जंगली सुअर जैसे आवारा पशुओं के लिए एक नीति बनाई जाए, जिससे किसान को नुकसान की भरपाई हो सके।

० किसानों का बकाया गन्ना भुगतान ब्याज सहित बिना देरी भुगतान किया जाए। चीनी का न्यूनतम मूल्य 40 रुपये प्रति किलो तय किया जाए।

० किसानों को सिंचाई हेतु नलकूप की बिजली मुफ्त उपलब्ध कराई जाए।

० पिछले 10 वर्ष में सरकारी रिकार्ड के अनुसार तीन लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार का पुनर्वास और आश्रितों को सरकारी नौकरी दी जाए।

० मनरेगा को खेती से जोड़ा जाए।

० खेती में काम आने वाली सभी वस्तुओं को जीएसटी से मुक्त किया जाए।

० कृषि को विश्व व्यापार संगठन से बाहर रखा जाए। मुक्त व्यापार समझौतों में कृषि पर चर्चा न की जाए।

० देश में पर्याप्त मात्रा में पैदावार होने वाली फसलों का आयात बंद किया जाए।

० देश में सभी मामलों में भूमि अधिग्रहण पुनर्वास अधिनियम-2013 से ही किया जाए। भूमि अधिग्रहण को केंद्रीय सूची में रखते हुए राज्यों को किसान विरोधी कानून बनाने से रोका जाए।

० किसानों की समस्याओं पर

संसद का विशेष संयुक्त अधिवेशन

बुलाया जाए, जिसमें एक माह तक किसानों की समस्याओं पर चर्चा कर समाधान किया जाए।

वैसे देखें तो ज्यादातर मांगों का केन्द्रबिन्दू एक ही है। और वह है- किसानों की आय सुनिश्चित हो, वे परिवार के भविष्य की चिंता से मुक्त हों तथा कृषि में उनकी लागत कम हो। आज की व्यवस्था में किसानों को सुखी बनाने का यही सूत्र है। बिजली मुफ्त, सिंचाई मुफ्त आदि लंबे समय तक संभव नहीं है। अगर किसानों की पैदावार समय पर और सही कीमत पर बिके, उनकी आवश्यक सुविधाएं उचित मूल्य पर उपलब्ध हो जाएं तो फिर उनको ऐसी मांग करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य तय किया है और यह नहीं कह सकते कि उस दिशा में काम नहीं हो रहा है। इसके लिए सरकार कृषि मंडियों को दुरुस्त कर रही है, इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार (ईनैम) का विस्तार हो रहा है। बिचौलियों को कम करने की कोशिश हो रही है। नीति आयोग ने इसके लिए कुछ अनुशंसाएं की हैं। किंतु इन सबमें राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है। साथ ही कृषि से जुड़े उद्योग को स्थानीय स्तर पर खड़ा किया जाए, ताकि सारे पैदावार बाजार में बेचने की जगह वहां उपयोग हो सकें।

वीरेंद्र सिंह ‘मस्त’ ने निभायी अहम भूमिका

लेखक — आशुतोष कुमार पाण्डेय

केंद्र सरकार से बातचीत करने के बाद किसानों की यात्रा की अगुवाई कर रहे नरेश टिकैट ने तो राजघाट होते हुए किसान घाट पहुंचने के बाद अपने आंदोलन को खत्म कर दिया था, लेकिन भारतीय किसान यूनियन (भानु गुट) के अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह के अगुवाई में दिल्ली पहुंचे किसानों ने तीन अक्टूबर को जंतर मंतर पहुंचकर अपना आंदोलन जारी रखा। ये लोग अपनी अन्य मांगों के साथ ही दिल्ली-गाजियाबाद सीमा पर किसानों पर हुए लाठीचार्ज के आरोपित पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करने की भी मांग कर रहे थे। उनके साथ काफी संख्या में किसान वहां दिन भर डटे रहे। अंत में बीजेपी किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह ‘मस्त’ ने इन आंदोलनकारी किसानों से बातचीत की और उनकी मांगों के समाधान का भरोसा दिलाया। इसके बाद भानु गुट के किसानों ने भी अपना आंदोलन खत्म कर दिया। वीरेंद्र सिंह ‘मस्त’ ने इस संबंध में कहा कि किसानों को पूरा अधिकार है कि वो राजधानी में आकर अपनी बात रखें। बातचीत से हर समस्या को सुलझाया जा सकता है। इसी उद्देश्य से वे खुद आंदोलन कर रहे किसानों के बीच पहुंचे। उन्होंने बताया कि एक किसान होने के नाते उन्हें खुद भी किसानों की परेशानियों का अहसास है। हमारी सरकार किसानों के विकास के लिए लगातार काम कर रही है। जिन मुद्दों को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं, वे मुद्दे संवाद के जरिए ही सुलझाए जा सकते हैं और उसका समाधान निकाला जा सकता है। पुलिस द्वारा 2 अक्टूबर को दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर किसानों के साथ किए गए बल प्रयोग के बारे में पूछे जाने पर वीरेंद्र सिंह ‘मस्त’ ने कहा कि पुलिस को किसानों के साथ शालीनता से पेश आना चाहिए था। उन्होंने किसानों का आंदोलन समाप्त हो जाने पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्र सरकार किसानों की मांग को लेकर काफी गंभीर है और जल्द ही किसानों के हित में फैसले लिए जाएंगे।

इससे किसानों की आय भी बढ़ेगी। हालांकि हमारे देश की समस्या है कि लोग रेस्टोरेंट में एक बार के भोजन का कई हजार का बिल आसानी से दे देते हैं, लेकिन खाद्यान्न, सब्जी, फलों के दाम में थोड़ी भी बढ़ोतरी पर महंगाई का रोना शुरू हो जाता है। आम आदमी की बात तो समझ में आती है, लेकिन मध्यम एवं उच्च वर्ग को अपना यह रवैया बदलना पड़ेगा। अगर किसानों को पैदावार का मूल्य ज्यादा मिलेगा तो बाजार में भी उसकी कीमत उसी अनुसार निर्धारित होगी। लागत कम करने के लिए शून्य बजट खेती, जैविक खेती आदि का प्रशिक्षण ज्यादा से ज्यादा किसानों को मिले।

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