बैंकों के बैड लोन का मसला लगातार गंभीर होता जा रहा है। बैंकों की गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) साढ़े ग्यारह लाख करोड़ के स्तर को भी पार कर गयी हैं। इस वक्त सरकारी और गैर सरकारी दोनों क्षेत्रों के बैंक एनपीए की समस्या से जूझ रहे हैं। दिसंबर 2017 तक बैंकों का एनपीए बैंकों में जमा कुम धन का 10.11 फीसदी हो चुका था। अनुमान है कि अभी ये लगभग 11.5 फीसदी तक पहुंच चुका है। इसको लेकर राजनीतिक बयानबाजी तो चल ही रही है, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने संसद की प्राक्कलन समिति को एनपीए की बाबत भेजे अपने एक जवाब में यूपीए सरकार के दौरान मुक्तहस्त से कॉरपोरेट सेक्टर को लोन बांटने की बात की पुष्टि कर आग में और घी डाल डालने का काम किया है।

देश के बैंकों की हालत खस्ता है। तमाम कोशिशों के बावजूद एनपीए बढ़ता जा रहा है। अब इस बात का खुलासा होने लगा है कि कैसे कारोबारियों, भ्रष्ट अधिकारियों और कुछ राजनेताओं ने मिलकर बैंकों को चूना लगाया। सवाल है कि कौन हैं ये गुनहगार और उन्होंने कैसे किया बैंकों को खोखला?

राजन ने अपने जवाब में प्राक्कलन समिति को बताया है कि 2006 से 2008 के बीच बैंकों ने बड़ी कंपनियों को धड़ाधड़ कर्ज दिये। इस काम में एसबीआई कैप्स और आईडीबीआई जैसे बैंक सबसे आगे थे। लेकिन इनकी देखादेखी बाकी बैंकों ने भी खुले हाथ से बड़ी कंपनियों को कर्ज देना शुरू कर दिया। इस दौरान इस बात की भी जांच-परख नहीं की गयी कि इन कंपनियों द्वारा कर्ज लेकर शुरू की जाने वाली परियोजनाएं लाभप्रद होंगी या नहीं। या फिर ये कंपनियां भविष्य में बड़े कर्जों को लौटा भी पायेंगी या नहीं। बाद में 2008 में जब वैश्विक मंदी का दौर आया तो कॉरपोरेट सेक्टर के लाभ कमाने के सारे अनुमान एक झटके में ध्वस्त हो गये और बैंकों द्वारा दी गयी भारी-भरकम राशि एनपीए में तब्दील होती चली गयी।

आर्थिक मंदी के दौरान नकारात्मक माहौल को टालने के इरादे से इन बड़े बकायेदारों से उस समय कर्ज की वसूली भी नहीं की गयी। और तो और, बड़े बकायेदारों की स्थिति सुधारने के लिए उनके कर्ज को रीस्ट्रक्चर करके उन्हें और भी राशि दे दी गयी, ताकि वे अपने काम को फिर से पटरी पर लाकर पुराना कर्ज भी वापस कर सकें। लेकिन ऐसा हो नहीं सका और बैड लोन की मात्रा बढ़ती गयी। हालांकि रघुराम राजन ने अंधाधुंध तरीके से बड़ी कंपनियों को कर्ज बांटे जाने का पूरा दोष बैंकों और उनके शीर्ष प्रबंधन पर मढ़ दिया है, लेकिन इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि बैंक ऐसा अपनी मर्जी से तबतक नहीं कर सकते, जबतक की उनके ऊपर ऐसा करने के लिए राजनीतिक दबाव न डाला जाये।

इसी एक सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक का उद्घाटन करते हुए बैंकों की डूबी रकम के गुनहगारों की ओर संकेत किया था। हालांकि किसी व्यक्ति विशेष का नाम लेने की जगह उन्होंने इशारों में ही साफ कर दिया कि यूपीए के शासनकाल में बैंकों में जमकर कर्ज घोटाला हुआ। इस दौरान बेहिसाब तरीके से लोगों को कर्ज बांटे गये। प्रधानमंत्री का तो यहां तक आरोप था कि एक परिवार विशेष के करीबी उद्योगपतियों को उनकी पात्रता न होने के बावजूद आंख बंद कर कर्ज दिये गये। उनके मुताबिक बैंक के अधिकारियों के पास खास लोगों की ओर से फोन आते थे। फोन के बाद कर्ज के रूप में भारी राशि उद्योगपति विशेष के नाम से जारी कर दी जाती थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने जो कुछ भी कहा है, कुछ वैसी ही बातें द फाइनेंशियल टाइम्स के भारत में संवाददाता रहे जेम्स क्रैबट्री ने अपनी किताब ‘द बिलिअनेयर राज’ में बैंकिंग सेक्टर के आला अधिकारियों और अर्थशास्त्रियों के हवाले से भी कही है। इस किताब में कुछ उद्योगपतियों की धूर्तता का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ऐसे लोगों ने बैंकों के सामने झूठे आकलन पेश किये और परियोजनाओं की लागत को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया। कुछ लोगों ने अपनी परियोजना की लागत दोगुनी करके दिखाई और उसमें 25 फीसदी प्रोमोटर्स तथा शेयरधारकों का निवेश दिखाया, जबकि 75 फीसदी कर्ज के लिए आवेदन कर दिया। ऐसे में प्रोमोटर्स अपनी ओर से निवेश करने से पूरी तरह से बच गये और बैंक लोन तथा शेयरधारकों की पूंजी से ही उन्होंने न केवल अपनी परियोजना की शुरुआत कर दी, बल्कि कर्ज के बड़े हिस्से को अपनी किसी अन्य परियोजना में लगा दिया। इसी तरह कुछ उद्योगपतियों ने एक साथ दो बैंकों से कर्ज लेने की कोशिश की। एक बैंक को प्रोमोटर्स की हिस्सेदारी की जो राशि बतायी जाती थी, उस राशि को दूसरे बैंक से कर्ज के रूप में ले लिया जाता था। इस तरह से दोनों बैंकों से कर्ज लेकर परियोजना शुरू कर दी जाती थी। चूंकि ऐसी परियोजनाओं में प्रोमोटर्स का धेला भी नहीं लगा होता था, इसलिए उसे इन परियोजनाओं के डूबने से भी फर्क नहीं पड़ता था। परियोजना चल गयी तो भी अच्छा और नहीं चली तब भी उनका कोई नुकसान नहीं होता था। जो भी नुकसान होता था, वो बैंकों का ही होता था।

किताब में जेम्स क्रैबट्री ने भारतीय स्टेट बैंक की पूर्व प्रमुख अरुंधती भट्टाचार्य के हवाले से लिखा है कि वो स्वयं तथा अन्य बैंकों के प्रमुख भी लंबे समय तक कुछ उद्योगपतियों की इस चाल को नहीं समझ सकी थीं। उनके मुताबिक बैंक की नजरों में लाभप्रद ऐसी कई परियोजनाओं के बारे में बाद में खुलासा भी हुआ, जो पूरी तरह से कर्ज में डूबी थीं और उनमें प्रोमोटर्स की हिस्सेदारी न के बराबर थी। ऐसी परियोजनाओं के डूबने का अर्थ सिर्फ और सिर्फ बैंकों का ही नुकसान था। इसमें उद्योगपतियों को थोड़ा भी नुकसान नहीं होता। बाद में नुकसान को कवर अप करने के लिए बैंकों की ओर से और कर्ज जारी किया जाता था, ताकि परियोजना को लाभप्रद बनाकर नये तथा पुराने दोनों कर्जों की वापसी करायी जा सके। इस तरह से कर्ज पर कर्ज चढ़ता जाता था और अन्तत: उसका भार बैंकों को ही झेलना पड़ता था।

प्रधानमंत्री ने भी एक सितंबर को इसी ओर संकेत किया था। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में सरकारी बैंकों में अंधाधुंध तरीके से कर्ज का वितरण किया गया। यह बात इस तथ्य से भी समझी जा सकती है कि आजादी के बाद के साठ-इकसठ साल में यानी 1947 से लेकर 2008 तक सरकारी बैंकों ने कुल 18 लाख करोड़ रुपये का कर्ज वितरित किया था, लेकिन उसके बाद के छह साल में ही यानी 2014 तक ही यह राशि बढ़कर 52 लाख करोड़ रुपये हो गयी। मतलब सिर्फ छह साल की अवधि में ही 34 लाख करोड़ रुपये के नये कर्ज जारी किये गये।

विडंबना यह है कि इस 34 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का ही एक बड़ा हिस्सा आज एनपीए के रूप में तब्दील हो चुका है। जब भी किसी को कर्ज दिया जाता है, तो उसकी प्रक्रिया में बैंक पहले इस बात की पड़ताल करता है कि कर्ज लेने वाली पार्टी पैसे का भुगतान कर पाने में सक्षम है या नहीं। एक मामूली आदमी को भी अगर वाहन या घर के लिए कर्ज लेना होता है, तो उसे अपनी आय के संबंध में और पुनर्भुगतान क्षमता के संबंध में कई कागजात जमा करने पड़ते हैं। इसके बाद ही उसके पक्ष में कर्ज की राशि जारी होती है। ऐसे में यह राशि कुछ हजार से लेकर कुछ लाख तक हो सकती है। लेकिन यूपीए के शासनकाल के आखिरी छह वर्षों में 34 लाख करोड़ रुपये के जो कर्ज बांटे गये, उनमें उद्योगपतियों को दी गयी कर्ज की राशि हजारों करोड़ रुपये तक की है।

हजारों करोड़ रुपये की राशि कर्ज के रूप में बैंकों ने आनन-फानन में उद्योगपतियों के पक्ष में जारी कर दिया। ऐसे में अब यह पूछा जाना चाहिए कि क्या बैंकों ने कर्ज देने की प्रक्रिया का उल्लंघन किया और अगर उन्होंने उल्लंघन किया, तो ऐसा क्यों किया? इसकी दो वजह हो सकती है। पहली वजह तो बैंकिंग सेक्टर के कुछ अधिकारियों के भ्रष्टाचार को माना जा सकता है। वहीं दूसरी वजह बैंक अधिकारियों पर पड़ने वाला राजनीतिक दबाव भी हो सकता है।

जेम्स क्रैबट्री ने अपनी किताब ‘द बिलिअनेयर राज’ में इस विषय पर आला बैंक अधिकारियों के हवाले से कई जानकारियां दी हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके रघुराम राजन के हवाले से इस किताब में लिखा है कि उन्होंने अपनी पहली प्रेस कान्फ्रेंस में ही स्पष्ट कर दिया था कि देश की अर्थव्यवस्था को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने ये भी कहा था कि कंपनियों के प्रोमोटरों को उनकी नाकाम परियोजनाओं के पुनर्पूंजीकरण के लिए बैंकिंग सिस्टम का दुरुपयोग नहीं करने दिया जायेगा। आगे के दिनों में ऐसा हो नहीं सका। रघुराम राजन ने सरकारी बैंकों की बुरी स्थिति की वजह का पता लगाने के लिए अमेरिकी निवेश बैंक मोर्गन स्टेनली के पूर्व कंट्री हेड पीजे नायक की अध्यक्षता में एक आयोग का भी गठन किया था। इस आयोग ने 2014 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि प्रतिद्वंद्विता की भावना की कमी, पूंजी की कमी और राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से बनी अपंगता सरकारी बैंकों की दयनीय स्थिति की वजह थी। नायक ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बैड लोन के मामले में स्थिति और बिगड़ने की संभावना बनी हुई थी और बैंकों की हालत सुधारने के लिए केंद्र की ओर से तत्काल सहायता जरूरी थी।

रघुराम राजन के हवाले से ‘द बिलिअनेयर राज’ में बताया गया है कि जब उन्होंने बैड लोन की स्थिति जानने के लिए सरकारी बैंकों में जांच करायी तो दहलाने वाली जानकारियां मिलीं। बैंकों द्वारा दिये गये कई बड़े कर्ज जिन्हें आधिकारिक तौर पर पॉजिटिव कटेगरी में रखा गया था, उनकी वास्तविक स्थिति बैड लोन की हो चुकी थी। उनमें से अधिकांश की वापसी की उम्मीद भी खत्म हो गयी थी। इसी तरह कई बड़ी औद्योगिक परियोजनाएं, जिन्हें लाभप्रद परियोजना बताया जा रहा था, उनकी स्थिति भी दयनीय हो चुकी थी और इनमें बैंकों की काफी बड़ी पूंजी फंसी हुई थी।

जेम्स क्रैबट्री ने अपनी किताब में रघुराम राजन के हवाले से ही आगे लिखा है कि जब बैंकों के बैड लोन की जांच रिपोर्ट उनके पास आई तो वे खुद भी हतप्रभ रह गये, क्योंकि स्थिति उनके अनुमान से कई गुना ज्यादा खराब थी। जांच रिपोर्ट में इस समस्या के लिए पूरी तरह से भ्रष्टाचार को जिम्मेदार माना गया था। 2014 में सिंडिकेट बैंक के चेयरमैन को भारी-भरकम कर्ज देने के एवज में घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था। रघुराम राजन ने उस वक्त भ्रष्टाचार के साथ ही ‘पॉवर इंबैलेंस’ को भी जिम्मेदार माना था। जेम्स क्रैबट्री का दावा है कि खुद राजन ने उन्हें बताया था कि उद्योगपतियों के बीच तब ये भावना काम कर रही थी कि यदि नुकसान का सामना करना पड़ता है तो उन्हें कर्ज का भुगतान करने की कोई जरूरत नहीं है। नुकसान होने के बाद भी यदि कोई कर्ज का भुगतान करता था, तो उसका यही अर्थ होता था कि उसे कोई नया कर्ज लेना है। उस समय जब कारोबारियों पर कर्ज की वापसी के लिए बैंक द्वारा दबाव डाला जाता था, तो वह दिल्ली जाकर शिकायत करते थे और बहुधा उन्हें राहत मिल भी जाती थी। लेकिन 2014 के बाद इस स्थिति में बदलाव आया। क्योंकि तब उन्हें स्पष्ट संदेश दिया जाने लगा था कि वे अपनी परेशानियों से खुद निपटें। राजन के हवाले से किताब में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि 2014 में सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकों द्वारा कर्ज देने और कर्ज की वसूली में किसी भी तरह के राजनीतिक हस्तक्षेप पर पूरी तरह रोक लगा दी।

हाल के दिनों में भी जब एनपीए का दबाव बैंकों पर बढ़ा और जवाबी कार्रवाई शुरू की गयी, तो कुछ बैंकों के आला अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में दंडित भी किया गया। कई अधिकारियों के खिलाफ जांच भी चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक का उद्घाटन करते हुए भी जो संकेत दिया है, वह बैंक अधिकारियों पर पड़ने वाले राजनीतिक दबाव की ओर ही इशारा करता है। यह एक तथ्य है कि एनपीए के संबंध में यूपीए सरकार लगातार देश के सामने झूठे आंकड़े पेश करती रही थी। 2014 तक एनपीए को महज ढाई लाख करोड़ ही बताया गया था। इसके विपरीत एनपीए का वास्तविक आंकड़ा 9 लाख करोड़ के आसपास था। ब्याज को शामिल करके आज की तिथि में यह आंकड़ा 11.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। इसमें से 12 डिफॉल्टर तो ऐसे हैं, जिनके ऊपर लगभग पौने तीन लाख करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है। वहीं 27 बकायेदार ऐसे हैं, जिनके ऊपर बैंकों का एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज बाकी है। ये सारे कर्ज यूपीए शासनकाल में ही दिये गये थे।

बैंकों द्वारा दिये गये कई बड़े कर्ज जिन्हें आधिकारिक तौर पर पॉजिटिव कटेगरी में रखा गया था, उनकी वास्तविक स्थिति बैड लोन की हो चुकी थी। उनमें से अधिकांश की वापसी की उम्मीद भी खत्म हो गयी थी।

रधुराम राजन, पूर्व गवर्नर, आरबीआई

हालांकि प्रधानमंत्री मोदी के आरोपों से कांग्रेस पार्टी इनकार कर रही है। उसका कहना है कि यूपीए के शासनकाल में कर्ज लेने वाले सारे उद्योगपति समय से कर्ज और उसके ब्याज का भुगतान कर रहे थे, लेकिन मौजूदा एनडीए सरकार की नीतियों के कारण देश में उद्योग-धंधे ठप हो गये हैं। इस कारण अधिकांश उद्योगपति अपने कर्ज का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं और इसी वजह से उनका कर्ज एनपीए के रूप में तब्दील हो गया है। इससे अलग यदि आंकड़ों को देखा जाये तो साफ पता चल जाता है कि कांग्रेस थोथी बयानबाजी करके अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है। विकास दर के आंकड़ों से स्पष्ट है कि औद्योगिक क्षेत्र में लगातार विकास हो रहा है और जीडीपी विकास दर की उछाल में इसका अहम योगदान है। अगर कांग्रेस के आरोपों के मुताबिक उद्योग-धंधे ठप हो गये होते तो विकास दर में इसकी स्पष्ट झलक नजर नहीं आती।

ये सब होने के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मोदी सरकार पर अब ऐसे बकाएदारों के खिलाफ कदम उठाने की बड़ी जिम्मेदारी बन गयी है। इससे बैंकों की डूबी हुई रकम की वसूली हो सकेगी। इसके साथ ही जिन ‘नामदारों’ की ओर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में संकेत किया है, उनके नामों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। ऐसे लोगों के नाम सामने आने ही चाहिए, जो बैंकों की बर्बादी के लिए जिम्मेदार हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने बैंकों का कर्ज हड़पने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। इस कार्रवाई का ही परिणाम है कि पिछले एक साल के दौरान ही एनपीए मानी जा चुकी राशि में से लगभग 87,000 करोड़ रुपये बैंकों के पास वापस आ गये हैं। संशोधित दिवालिया कानून की वजह से भी बैंकों का कर्ज लेकर दबा जाने वाले लोग अब पैसा लौटाने के लिए सामने आने लगे हैं।

परेशानी ये है कि कर्ज वापसी की यह गति धीमी है और इसी की वजह से अभी तक एनपीए की रिकवरी के मामले में अपेक्षित नतीजे सामने नहीं आ सके हैं। इसकी एक बड़ी वजह नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के कामकाज की धीमी रफ्तार भी है। ट्रिब्यूनल के पास पिछले साल जितनी भी कंपनियों के मामले भेजे गये, उनमें से अभी तक सिर्फ एक ही मामले का निपटारा हो सका है। जब तक इस काम में तेजी नहीं लायी जायेगी, तब तक बैंकों का पैसा हड़पने वाली कंपनियां सीधे रास्ते पर नहीं आयेंगी।

केंद्र की मौजूदा सरकार को एनपीए के नाम पर डूबे पैसे की वसूली को तेज करना ही होगा। तभी बैंकों का डूबा हुआ पैसा निकल सकेगा। देश की अर्थव्यवस्था की सेहत के लिहाज से भी यह जरूरी है। इसके साथ ही सरकारी बैंकों के प्रति भरोसा बनाने के लिए भी ऐसा कदम उठाना आवश्यक है। बैंकों के भारी भरकम एनपीए और लगातार हो रहे नुकसान की खबरों की वजह से उनके प्रति आम लोगों में विश्वसनीयता घटी है। ये स्थिति सरकारी बैंकों के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरनाक है। बैंकों को घाटे से निकालना जरूरी भी है और समय की मांग भी है। यह काम जितना जल्दी हो सके, किया जाना चाहिए।

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रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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