छत्तीसगढ़ में चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी चौथी पारी के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। यदि वे चुनाव जीतने में कामयाब होते हैं तो बीजेपी के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाएंगे। प्रदेश में चुनाव दो चरणों में होने वाले हैं। प्रथम चरण में12 नवंबर को बस्तर संभाग के सात जिलों की 12 विधानसभा सीटों पर और राजनांदगांव की छह विधानसभा सीटों पर चुनाव हो रहा है।

सतनामी समाज से लग सकता है झटका

छत्तीसगढ़ में सतनामी समाज की 14 से 16 फीसदी की हिस्सेदारी है। इस चुनाव में गुरु बालदास ने बीजेपी पर समाज के लोगों का सम्मान नहीं करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला किया है। वे खुद भी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। इसके बाद से ही कांग्रेस चुनाव में जीत हासिल करने की उम्मीद कर रही है। कहा जा रहा है कि पिछले चुनाव में सतनामी सेना द्वारा 21 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की वजह से बीजेपी को दस सीटों का फायदा हुआ था। इन उम्मीदवारों ने कांग्रेस के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई थी, जिससे बीजेपी उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे थे। मुंगेली में सतनामी सेना के उम्मीदवार रामकुमार टंडन ने कांग्रेस उम्मीदवार चंद्रभान बारमाते के 2304 वोट काटे। कुछ वोट नोटा के खाते में गए। इस तरह बरमाते केवल 2045 वोट से बीजेपी उम्मीदवार पुन्नूलाल मोहले से चुनाव हार गए थे। इसी तरह कवर्धा सीट पर भी सतनामी सेना ने 2858 वोट काटे। जिससे कांग्रेस के दिग्गज उम्मीदवार मोहम्मद अकबर महज 2558 वोट से बीजेपी के नए नवेले उम्मीदवार अशोक साहू से चुनाव हार गए। इसी प्रकार कई बीजेपी उम्मीदवार बहुत ही कम वोटों के अंतर से विजयी हुए थे।

जबकि शेष 72 सीटों के लिए वोटिंग दूसरे चरण में 20 नवंबर को होगी। इस बार चुनाव में बीजेपी-कांग्रेस के अलावा छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जोगी) और बीएसपी का गठबंधन भी मैदान में है और ये गठबंधन बीजेपी-कांग्रेस का समीकरण बिगाड़ भी सकता है। प्रदेश की कुल 90 सीटों में से 39 आरक्षित हैं। इनमें अनुसूचित जनजाति के लिए 29 सीटें और अनुसूचित जाति के लिए 10 सीटें आरक्षित है। प्रदेश के कुल 2.55 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 1.1 करोड़ अनुसूचित जाति और जनजाति के हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की संख्या भी यहां काफी अधिक है। प्रदेश की 51 सीट यद्यपि अनारक्षित हैं, लेकिन इन पर भी अनुसूचित जाति व जनजाति का वर्चस्व है। इसके बावजूद डॉ. रमन सिंह की अगुवाई में बीजेपी ने प्रदेश में संगठन को मजबूत किया है। यदि हम जीती हुई सीटों का आंकड़ा देखें, तो 2003 में बीजेपी को 50 सीटें, 2008 में 50 सीटें और 2013 में 49 सीटें मिली थी। वहीं कांग्रेस को 2003 में 37, 2008 में 38 और 2013 में 39 सीटों पर सफलता मिली थी।

आरक्षित सीटों पर नजर

अजित जोगी का गठबंधन राज्य की आरक्षित 39 सीटों पर अपनी नजरें गड़ाये हुए है। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस ने अनुसूचित जाति के वोटरों की चाहत में ही बीएसपी से गठबंधन किया है। इसके बावजूद गठबंधन के लिए बीजेपी का गढ़ भेद पाना आसान नहीं होगा। पिछले चुनाव में बस्तर की 12 सीटों में से बीजेपी को चार व कांग्रेस को आठ सीटें मिली थी। लेकिन इस बार बीजेपी पूर्व नियोजित तरीके से किए गए कार्य व विकास के नाम पर वोट हासिल करने में जुटी है। इसी विकास के दम पर पिछली बार भी सरकार बनाने में बीजेपी को कामयाबी मिली थी। बीजेपी ने इस चुनाव में 65 से अधिक सीट हासिल करने का लक्ष्य रखा है, जिसे हासिल करने के लिए वो हरसंभव प्रयास कर रही है। केंद्र सरकार के लिए भी छत्तीसगढ़ का विधानसभा चुनाव प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है।

इस चुनाव का असर 2019 के लोकसभा चुनाव पर पड़ने की भी संभावना है। इसलिए बीजेपी हर हाल में यहां विधानसभा का चुनाव जीतना चाहती है। चुनाव के ठीक पहले अनुसूचित जनजाति पर अच्छी पकड़ रखने वाले गुरु बालदास ने अपना पाला बदल लिया। इससे प्रदेश की लगभग दस सीटों पर बीजेपी की पकड़ कमजोर पड़ सकती है। इन सीटों पर बालदास की अच्छी पकड़ मानी जाती है। राज्य में सभी दलों के लिए अनुसूचित जनजाति के मतदाता सबसे ज्यादा महत्व रखते हैं। इन बहुचर्चित और महत्वपूर्ण सीटों पर न केवल पार्टी के रूप में बीजेपी और कांग्रेस का, बल्कि कई राजनेताओं का भविष्य भी तय होगा। इसके अलावा कुछ और फैक्टर हैं, जो विधानसभा चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। इसके लिए पिछले चुनाव पर ध्यान देना होगा। पिछले चुनाव में गुरु बालदास की सतनामी सेना काफी असरदार साबित हुई थी। सतनामी सेना का अनुसूचित जनजातियों पर सीधा प्रभाव है। गुरु बालदास के कारण पिछले चुनाव में बीजेपी को प्रत्यक्ष फायदा मिला था।

जोगी से बीजेपी को फायदा

राजनांदगांव से डॉ. रमन सिंह के खिलाफ कांग्रेस ने इस बार अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला को मैदान में उतारा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि करुणा शुक्ला कितने वोटों पर अपना कब्जा कर पाती हैं। इस विधानसभा सीट पर जोगी-मायावती गठबंधन के भी सक्रिय होने के कारण बीजेपी की जीत तय मानी जा रही है। क्योंकि ये गठबंधन कांग्रेस के वोट बैंक में ही सेंध लगाएगा। राजनांदगांव में कुल 6 सीटें हैं। इनमें से बीजेपी पिछले चुनाव में केवल दो सीट ही जीत पाई थी, जबकि 2008 में उसने यहां की 4 सीटें जीती थी। इस बार यहां की सीटों पर कब्जा करने के लिए जोगी के गठबंधन ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। बस्तर संभाग में कांग्रेस की अच्छी पकड़ रही है। बस्तर में एसटी की आरक्षित सीटों पर कांग्रेस लगातार जीतती आई है। लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस- बीएसपी गठबंधन तीसरे मोर्चे के रूप में बड़ा उलटफेर कर सकता है। जोगी ने पहले चरण की 18 सीटों के लिए 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि बीएसपी ने 6 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को टिकट दिया है।

छत्तीसगढ़ में मामूली झटकों के बावजूद बीजेपी अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलती दिख रही है। समय रहते ही पार्टी ने टिकट वितरण को लेकर असंतुष्ट हुए नेताओं को भी मनाने में सफलता पा ली है। ऐसे में इस चुनाव में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह नया इतिहास भी रच सकते हैं।

जोगी का बीएसपी के साथ गठबंधन इस बार विधानसभा चुनाव में क्या गुल खिलाएगा, यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन लोगों का मानना है कि जोगी-बीएसपी गठबंधन इस चुनाव में जितना ताकत झोंकेगा, बीजेपी को उतना ही फायदा होगा। अजीत जोगी ने टिकट वितरण में कांग्रेस के बागी उम्मीदवारों को काफी तरजीह दी है। उनको उम्मीद है कि चुनाव में उनके प्रत्याशियों को अच्छी संख्या में वोट मिलेंगे। मौजूदा हालात में कहा जा सकता है कि पहले चरण में बस्तर और राजनांदगांव का मुकाबला बीजेपी बनाम कांग्रेस का नहीं रह गया है। अजीत जोगी ने सीपीआई के साथ भी कई सीटों पर गठबंधन किया है। साफ है कि इस जोगी की अगुवाई वाले गठबंधन के चुनाव मैदान में होने का सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस को ही होगा। कांग्रेस के साथ एक बड़ी दिक्कत ये भी है कि उसके पास डॉ. रमन सिंह और अजीत जोगी जैसा कोई लोकप्रिय चेहरा भी नहीं है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अपने पुराने इतिहास और गांधी परिवार के नाम के बल पर ही अपनी नैया पार लगाने में जुटी हुई है।

साहू समाज को साधने की कोशिश

इस विधानसभा चुनाव में साहू समाज को भी साधने का भरपूर प्रयास किया गया है। टिकट वितरण में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने साहू समाज को साधने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है। प्रदेश में इस समाज के 14 नेताओं को टिकट देकर बीजेपी ने इस समाज की वर्षों पुरानी मुराद पूरी कर दी है। बीजेपी के अभी तक घोषित प्रत्याशियों में साहू समाज के हारे-जीते प्रत्याशियों समेत ओबीसी वर्ग को प्रमुखता दी गई है। ये दांव बीजेपी को चौथी बार सरकार बनाने में सबसे ज्यादा सहायक सिद्ध हो सकता है। यह बीजेपी की सोची समझी राणनीति है। बीजेपी हर हाल में चौथी बार सरकार बनाना चाहती है, इसीलिए उसने जोखिम भी लिया है। बड़ी बात तो ये है कि बीजेपी ने अंसुतष्टों की नाराजगी दूर करने में काफी हद तक कामयाबी पा ली है। जिन विधायकों का टिकट काटा गया है, उनको भी खुश करने का विकल्प खुला रखा है। कहा जा रहा है कि जिन लोगों के टिकट काटे गए हैं, उन्हें सरकार बनने के बाद निगम और बोर्ड में समायोजित करने का आश्वासन दिया गया है। बीजेपी ने चुनाव प्रचार के क्रम में पूरी तरह से विकास कार्यों को केंद्र में रखा है। पार्टी नेता कांग्रेस के समय के हालत की तुलना अभी के हालात से कर रहे हैं। जब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश से अलग होकर नया राज्य बना था, उस समय प्रदेश में मूलभूत सुविधाएं लगभग नगण्य थी। प्रदेश बनने के बाद अजीत जोगी की अगुवाई में कांग्रेस का शासन हुआ, लेकिन वे प्रदेश का विकास करवा पाने में सफल नहीं हो सके। इसके बाद 2003 में प्रदेश की जनता ने सत्ता की चाबी बीजेपी को सौंपी। तब से प्रदेश में विकास की योजनाओं की मानो बाढ़ सी आ गई। किसानों के लिए कई योजनाएं लागू की गई। जिससे किसानों के जीवन स्तर में काफी सुधार हुआ। बड़े उद्योगों के लिए रास्ते खोल दिए गए। प्रदेश के कामगार मजदूरों को अपने घर पर ही काम दिया गया। सड़कों की हालात में सुधार हुआ। प्रदेश में पीडीएस की जो पद्धति लागू की गयी, वो अन्य प्रदेश के लिए भी अनुकरणीय रही। किसानों को शून्य ब्याज दर पर ऋण मुहैया करवाना, सड़कों की स्थिति में सुधार करना, नई सड़कों का निर्माण आदि ने प्रदेश के विकास में अहम भूमिका निभायी। प्रदेश की एक बड़ी समस्या नक्सलवाद की है। प्रदेश सरकार ने विकास के दम पर नक्सलियों पर अंकुश लगाया। राज्य में नक्सलवाद पूरी तरह से खत्म तो नहीं हो सका है, लेकिन उसका विस्तार रुक गया है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि बीजेपी एक बार फिर सरकार बनाने में सफल रही तो नक्सलवाद का पूरी तरह से सफाया भी हो सकता है। बीजेपी इन्हीं मुद्दों के साथ मैदान है। वहीं कांग्रेस नक्सलवाद पर बात करने से भी घबरा रही है। देखा जाए तो कांग्रेस पूरी तरह से मुद्दा विहीन है। इसका भी फायदा प्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को ही मिलेगा।

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