बिहार में माई समीकरण के बलबूते दशकों तक एकछत्र राज करने वाले लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप की बगावत क्या रंग लायेगी। कहीं यह पिछड़ों की राजनीति को तार-तार तो नहीं कर देगी।

बिहार में छिड़े विरासत की जंग का आखिरकार परिणाम क्या निकलेगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तो तय है कि एक समय बिहार के महाबली समझे जाने वाले राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति उनकी पार्टी के लिए घातक साबित हो रही है। उनके परिवार का सत्ता संघर्ष सड़क पर आकर मीडिया की सुर्खियां बटोर रहा है। बड़े बेटे तेज प्रताप ने साफ-साफ कह दिया है कि अगर उनके समर्थकों को पार्टी का टिकट नहीं मिला तो वे उन्हें निर्दलीय लड़ायेंगे। इसके लिए बाकायदा उन्होंने लालू-राबड़ी मोर्चा भी बना लिया है। महाभारत के दौरान पांडवों के लिए पांच गांव मांगने की तर्ज पर तेजप्रताप के इस विद्रोह की शुरुआत लोकसभा की जहानाबाद और शिवहर सीटों से अपने समर्थकों को उम्मीदवार बनाने की मांग के साथ शुरू हुई।
उन्होंने न केवल टिकट की मांग की बल्कि अपने समर्थकों को पर्चा भरने तक के लिए कह दिया। इस दौरान उन्होंने अपने छोटे भाई तेजस्वी के ईर्द गिर्द गलत लोगों की मौजूदगी की ओर इशारा करते हुए कहा कि यही लोग उनके परिवार में फूट डालने का काम कर रहे हैं। दरअसल, ससुर चंद्रिका राय को सारण सीट से राजद उम्मीदवार बनाया जाना तेजप्रताप के जले पर नमक डालने सरीखा साबित हुआ। इससे भन्नाये तेज ने बगावत का बिगुल फूंक दिया। पत्नी ऐश्वर्या से तलाक के लिए केस फाइल कर चुके तेजप्रताप ने इशारों ही इशारों में यह भी जता दिया कि सारण सीट से अपने ससुर की उम्मीदवारी उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं है। उन्होंने इस सीट से अपनी मां राबड़ी देवी से चुनाव लड़ने का आग्रह किया और ऐसा नहीं होने पर खुद ही ताल ठोंकने की मुनादी कर दी।
ऐसे में यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि नमो-नीतीश की जोड़ी को बिहार से बेदखल करने की हूंकार भरने वाले महागठबंधन की हवा निकालने में उसके अपने ही पूरी शिद्दत से जुटे हुए हैं। तेज प्रताप के विद्रोही स्वर ने न केवल आम चुनाव बल्कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में राजद के भविष्य को लेकर लालू परिवार के साथ ही लाखों-करोड़ों समर्थकों की बेचैनी बढ़ा दी है। इन पंक्तियों का लेखक साढ़े चार दशकों से भी ज्यादा वक्त से लालू परिवार को बेहद करीब से जानता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछड़े, दबे-कुचले तबकों को उनकी ताकत का एहसास कराने का श्रेय लालू प्रसाद को जाता है। 10 मार्च 1990 से 2005 तक यानी 15 साल तक बदस्तूर लालू बिहार के बेताज बादशाह थे। केंद्र में भी मनमोहन सरकार में बतौर रेल मंत्री उनका सिक्का खूब चला था। रेल मंत्री के रूप में उनके मैनेजमेंट की ख्याति सात समंदर पार तक जा पहुंची थी। तेजप्रताप ने भले ही विद्रोह का बिगुल अब फूंका है लेकिन यह चिंगारी तभी दहकने लगी थी, जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी सरकार में राजद कोटे से बड़े बेटे के बजाय लालू प्रसाद ने छोटे बेटे तेजस्वी को डिप्टी सीएम बना दिया था। तब तेजप्रताप को मात्र स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया।
तेज के विद्रोह का एक कारण यह भी है कि उनके व पत्नी के विवाद में परिवार उनका साथ देने के बजाय उनके ससुरालवालों के साथ खड़ा है। सारण से उनके ससुर व राजद के वर्तमान विधायक चंद्रिका राय को टिकट दिया जाना उन्हें गहरे तक चोट पहुंचा गया। उल्लेखनीय है कि तेज प्रताप की पत्नी ऐश्वर्या राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा राय की पौत्री हैं। देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी उनकी मांगों को मानते हुए पूर्वघोषित उम्मीदवारों के बदले तेज प्रताप के उम्मीदवारों को टिकट देती है या इसे अनसुना कर देती है।
ऐसे में उनकी बगावत कहां जाकर थमेगी इस पर पैनी निगाहें होंगी। यक्ष प्रश्न यह है कि चारा घोटाले में जेल में बंद लालू प्रसाद के परिवार में मचा यह सत्ता संघर्ष बिहार की पिछड़ी राजनीति के लिए कहीं वाटर लू न साबित हो जाय। बहरहाल, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को रोकने के लिए बने महागठबंधन का नेतृत्व करने वाले लालू के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की इस फूट से जहां महागठबंधन के साथी दल सकते में हैं वहीं विरोधी दलों की बांछे खिली हुई हैं। भाजपा जहां तेजप्रताप को तेजस्वी से ज्यादा लोकप्रिय बता चुकी है, वहीं जनता दल यू इसे राजनीतिक हक की लड़ाई करार दे चुका है।

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