कांगड़ा लोकसभा सीट पर भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने प्रत्याशी मैदान में उतार दिए हैं। प्रदेश में सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली इस सीट पर दोनों पार्टियां फूंक-फूंककर कदम रख रही हैं।

कहा जाता है कि हिमाचल में सत्ता का रास्ता कांगड़ा जिले से होकर ही गुजरता है। पर लोकसभा चुनाव की नजर से सबसे अधिक जनसंख्या वाले कांगड़ा की अहमियत कम नहीं हैं। यहां उम्रदराज नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार के पीछे हटने के बाद भाजपा ने पहली बार गद्दी कार्ड खेला है, जबकि कांग्रेस पहले से कई बार आजमा चुकी ओबीसी कार्ड पर दांव लगा रही है। कांगड़ा की लोकसभा एक ऐसी सीट है जहां गद्दी, ओबीसी और गुज्जरों का दबदबा रहा है। कांगड़ा 1966 में हिमाचल में मिलने से पहले पंजाब का संसदीय क्षेत्र था।
जबकि वर्तमान में कांगड़ा लोकसभा का चंबा जिला हिमाचल में ही 1967 तक संसदीय क्षेत्र था। 1971 में दोनों को मिलाकर कांगड़ा संसदीय क्षेत्र अस्तित्व में आया। आजादी के बाद अब तक हुए लोकसभा चुनावों की बात करें, तो 1952 कांगड़ा-चम्बा संसदीय क्षेत्र से पहली दफा कांग्रेस के टिकट पर 1952 में ए.आर. सेवल सांसद बने थे। इसी तरह 1957 में हुए दूसरे आम चुनावों में चंबा से कांग्रेस के पद्म देव सांसद चुने गए। इसके बाद 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के हेम राज सांसद बने। 1962 में हुए लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव में कांग्रेस के छतर सिंह सांसद बने और 1967 में कांग्रेस के हेम राज को फिर चुना गया। 1967 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बिक्रम चंद महाजन, 1977 में लोकदल से दुर्गा चंद, 1980 में कांग्रेस नेता बिक्रम चंद महाजन, 1984 में कांग्रेस की चंद्रेश कुमारी सांसद बनीं। लेकिन इसके बाद 1989 में पहली बार भाजपा ने जीत का परचम लहराया और शांता कुमार सांसद बने।
1991 में भाजपा के डीडी खनोरिया ने बाजी मारी, जबकि साल 1996 में कांग्रेस के सत महाजन सांसद बने। 1998 और 1999 में भाजपा के शांता कुमार फिर सांसद बने, लेकिन 2004 में कांग्रेस के चौधरी चंद्र कुमार ने शांता कुमार को हरा दिया। 2009 में भाजपा के डॉ. राजन सुशांत सांसद चुने गए और 2014 के लोकसभा चुनाव में शांता कुमार चुनाव जीत चौथी बार सांसद बने। इस बार भाजपा ने गद्दी समुदाय से संबंध रखने वाले साफ छवि के ईमानदार व तेजतर्रार नेता विधायक किशन चंद कपूर पर दांव खेला है। कपूर धर्मशाला विधानसभा क्षेत्र से वर्तमान विधायक और जयराम ठाकुर की सरकार में कबीना मंत्री भी हैं। उनके पास खाद्य आपूर्ति विभाग का जिम्मा है।
भाजपा अगर एकजुट होकर चुनाव लड़ती है और भीतरघात नहीं होता है, तो उनकी जीत की प्रबल संभावना है। वहीं कांगड़ा सीट पर लंबी जद्दोजहद के बाद कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी पवन काजल का ऐलान किया है। पवन काजल कांगड़ा के मौजूदा विधायक हैं और पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। 45 वर्षीय पवन काजल मृदुभाषी हैं और ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में इस वर्ग के करीब 27 से 30 फीसदी वोटर हैं। खास बात यह भी है कि पवन काजल पूर्व में भाजपा से भी जुड़े रहे हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव में पवन काजल को भाजपा ने टिकट नहीं दिया, लेकिन वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीत कर विधायक बने।
विधायक बनने के बाद काजल ने हाथ थाम लिया। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें 2017 के विधानसभा चुनाव में भी प्रत्याशी बनाया था। उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार संजय चौधरी को 6,208 मतों के अंतर से हरा दिया था। कांगड़ा लोकसभा क्षेत्र में 17 विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें कांगड़ा जिला की नूरपुर, इंदौरा, फतेहपुर, ज्वाली, शाहपुर, कांगड़ा, पालमपुर, बैजनाथ, नगरोटा बगंवा, सुलह, जयसिंहपुर और धर्मशाला हैं। इसी तरह चम्बा की चार विधानसभा सीटों में से चम्बा सदर, भटियात, चुराह और बनीखेत शामिल हैं।
कांगड़ा लोकसभा क्षेत्र में लगभग 12 लाख वोटर हैं, जिसमें 6,04,496 पुरुष वोटर और 5,95,669 महिला वोटर शामिल हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में शांता कुमार को 4,56,163 वोट और कांग्रेस उम्मीदवार चौधरी चंद्र कुमार को 2,86,091 वोट मिले थे। इस बार ऊंट किस करवट बैठता है, यह देखना होगा।

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