राजस्थान में नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार ने घोषणापत्र में किए वादे के अनुरूप ही किसानों की कर्ज माफी का ऐलान कर दिया है। हालांकि संपूर्ण कर्ज माफ करने की जगह किसानों द्वारा 30 नवंबर 2018 तक लिए गए दो लाख तक के कर्ज माफ करने के आदेश जारी किए गए हैं। इस घोषणा से सरकार पर 18,000 करोड़ रुपये का भार पड़ेगा। राजस्थान में पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार ने भी किसानों द्वारा सहकारी बैंकों से लिए गए 50,000 रुपये तक का कर्ज माफ किया था, जिससे खजाने पर 8,000 करोड़ रुपये का भार पहले ही आ चुका था। अब इस कर्जमाफी से जहां राज्य के खजाने की सेहत पर असर पड़ेगा, वहीं सम्पूर्ण कर्ज माफी का वादा पूरा नहीं करने के बाद सरकार भी विपक्ष के निशाने पर आ गई है। कर्ज माफी की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने स्पष्ट किया कि सहकारी बैंकों के पात्र ऋणी किसानों के 30 नवम्बर, 2018 की स्थिति में समस्त बकाया अल्पकालीन फसली ऋण को माफ किया गया है।

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने किसानों की कर्ज माफी की घोषणा कर दी है। इसमें जो शर्तें जोड़ी गई हैं, उसकी वजह से किसानों का कुल 18,000 करोड़ रुपये का कर्ज ही माफ हो सकेगा, जबकि 81,995 करोड़ रुपये का कर्ज अभी भी बचा रहेगा।

राज्य सरकार ने राष्ट्रीयकृत बैंकों, अनुसूचित बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से अल्पकालीन फसली ऋण लेने वाले पात्र किसानों के भी दो लाख रुपये तक के अवधिपार एवं कालातीत फसली ऋण को माफ करने का निर्णय लिया है। यह कर्ज भी उन्हीं किसानों का माफ होगा, जो संकटग्रस्त ह और अपना ऋण नहीं चुका पा रहे है। आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो सरकार का किसानों के कर्ज माफ करने का लोकलुभावन फैसला खजाने की सेहत बिगाड़ सकता है। सहकारिता विभाग के सूत्रों के अनुसार सरकार एक वित्त वर्ष में विभिन्न योजनाओं के लिए वित्तीय संस्थानों से करीब तीस हजार करोड़ का कर्ज ले सकती है। इस वर्ष करीब चौबीस हजार करोड़ का कर्ज पहले ही लिया जा चुका है। अब सरकार मात्र छह हजार करोड़ का ऋण ले सकती है। यानि कांग्रेस सरकार की कर्ज माफी के बाद आए 18,000 करोड़ का भार अगले वित्त वर्ष पर भी पड़ना निश्चित है। इसके अलावा आम जनता से जुड़ी विकास योजनाओं का भविष्य भी गड़बड़ा सकता है, जबकि इसी वित्त वर्ष के तीन महीने बचे हुए हैं।

जानकारों के अनुसार पिछले नौ महीने में अनुमानित राजकोषीय घाटा भी चुनाव वर्ष के कारण साढे पांच हजार करोड़ से बढ़ कर सवा ग्यारह हजार करोड़ हो चुका है। इसके अलावा प्रदेश के खर्च में 35 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि राजस्व प्राप्ति में मात्र 17 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में कर्ज माफी की योजना राज्य की आर्थिक स्थिति को दयनीय बना सकती है। उदय योजना के कर्ज के बाद अब किसानों की ऋण माफी से राज्य के बिगड़ते माली हालात को कैसे पटरी पर लाया जा सकेगा, इसका जवाब किसी भी राजनेता या सरकार के पास नहीं है। कुछ सामाजिक संगठनों का कहना है कि राज्य का किसान कर्ज माफी नहीं चाहता, बल्कि स्थायी ऋण मुक्ति चाहता है। इसके लिए वो सरकार से सुविधाएं चाहता है, जिससे उसे राहत मिल सके। यदि सरकार फसलों के उचित मूल्य, मुनाफाखोरों पर लगाम, दलालीप्रथा पर रोक और फसलों की निर्धारित समय पर खरीद की व्यवस्था कर दे तो काफी हद तक किसानों को राहत मिल सकेगी। इधर बीच किसानों के सम्पूर्ण कर्ज माफी का वादा पूरा नहीं करने के बाद सरकार को विपक्ष ने आड़े हाथों लिया है। पूर्व मंत्री डॉ. राजेन्द्र राठौड़ का कहना है कि कांग्रेस के किसान ऋण माफी आदेश ने अन्नदाताओं के साथ छलावा किया है। उन्होंने गहलोत सरकार से सवाल किया कि कांग्रेस द्वारा चुनावी वादे में किसानों का मूलधन, ब्याज और पेनाल्टी समेत पूरा कर्जा माफ करने की बात कही गई थी। वर्तमान में राज्य में कुल 59 लाख किसान हैं, जिन पर लगभग 99,995 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है। जिसमें से अगर वर्तमान आदेश के मुताबिक 18,000 करोड़ रुपये का ऋण माफ कर दिया जाता है, तब भी किसानों पर 81,995 करोड़ रुपये का कर्ज बाकी ही रहेगा। साफ है कि सरकार ने कर्ज माफी का दिखावा जरूर किया है, लकिन इसकी आड़ में एक बार फिर किसानों के साथ छल ही हुआ है। ये बात आने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए भारी भी साबित हो सकती है।

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