म आदमी पार्टी के 20 विधायकों का मामला अचानक सामने नहीं आया। करीब दो साल पहले 13 मार्च, 2015 से उठा यह मामला इस साल 19 जनवरी को अपने चरम पर पहुंचा। दरअसल चुनाव आयोग ने लाभ के पद नियमों के उल्लंघन मामले में राष्ट्रपति को सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की थी, जिस पर राष्ट्रपति ने अपनी मंजूरी दे दी। राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद केंद्र सरकार ने इस बारे में अधिसूचना जारी की। इस प्रक्रिया में स्पष्ट हो गया कि एक निश्चित संख्या के अलावा विधायक सरकार में लाभ के ऐसे पद हासिल नहीं कर सकते, जिनमें भत्ते या अन्य शक्तियां मिलती हैं। ऐसे पदों के लिए विधानसभा से कानून पास किया जाता है। केंद्र शासित दिल्ली सरकार को इस प्रक्रिया में उपराज्यपाल की मंजूरी लेना जरूरी है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रक्रिया का पालन किए बगैर इन विधायकों को संसदीय सचिव बनाया था, जो लाभ का पद है। अब इनकी सदस्यता रद्द होने के बाद दिल्ली के इन 20 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव कराना होगा। फिलहाल, दिल्ली हाईकोर्ट ने 29 जनवरी तक चुनाव प्रक्रिया शुरू करने पर रोक लगाई है। हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि वह मामले की अगली सुनवाई तक दिल्ली में उपचुनाव की कोई अधिसूचना जारी न करे। दरअसल, पार्टी के 20 विधायकों में से आठ ने दिल्ली हाईकोर्ट में नोटिफिकेशन को चुनौती दी है। इन विधायकों ने अपनी याचिकाएं अलग-अलग दाखिल की हैं। कैलाश गहलोत, मदन लाल, सरिता सिंह, शरद चौहान और नितिन त्यागी ने एक याचिका दायर की जबकि राजेश ऋषि और सोमदत्त ने अलग अपील की। अल्का लांबा ने अपनी याचिका अकेले दाखिल की।

क्या हैं लाभ के पद

लाभ के पद को अगर सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब होता है, ‘जब कोई व्यक्ति सांसद या विधायक रहते हुए अन्य किसी पद पर भी कार्य कर रहा हो, जहां से उसे दूसरी इनकम हो रही हो तो इसे लाभ का पद कहा जाता है।’ संविधान के आर्टिकल 102 (1) (अ) में लाभ का पद (आॅफिस आॅफ प्रॉफिट) का जिक्र किया गया है। आर्टिकल 191(1)(अ) के तहत सांसद-विधायक दूसरा पद नहीं ले सकते हैं। इसके अनुसार सांसद या विधायक 2 अलग-अलग लाभ के पद पर कार्य नहीं कर सकते हैं।

नियम विरुद्ध नियुक्ति

गवर्नमेंट आॅफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी आॅफ देल्ही एक्ट, 1991 के तहत दिल्ली में सिर्फ एक संसदीय सचिव का पद हो सकता है। यह संसदीय सचिव मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़ा होगा, लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल ने सीधे 21 विधायकों को ये पद दे दिया। दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन के अनुसार अब नेशनल कैपिटल टेरिटरी आॅफ देल्ही एक्ट 10 प्रतिशत यानी 70 में से केवल सात विधायकों को ही मंत्री अथवा संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया जा सकता है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी को करीब तीन साल के अपने इतिहास में सबसे बड़ा झटका लगा है। पार्टी के 20 विधायक लाभ के पद हासिल करने के मामले में
विधानसभा की सदस्यता के लिए अयोग्य करार दिए गये हैं।

मामले एक जैसे नहीं?

चुनाव आयोग को दिल्ली सरकार की तरफ से जो आधिकारिक जानकारी दी गई, उसके मुताबिक, अल्का लांबा को कश्मीरी गेट पर दो दफ़्तर मिले।  पीडब्ल्यूडी ने दफ्तरों का रेनोवेशन कराया लेकिन नितिन त्यागी, मदन लाल और प्रवीण कुमार ने कोई अतिरिक्त दफ़्तर नहीं लिया। संजीव झा ने परिवहन मंत्रालय में एम्प्लोयी पेंशन स्कीम को लागू करने को लेकर बैठक की अध्यक्षता की और फैसले लिए। अनिल कुमार बाजपाई ने डीजीईएचएस अधिकारियों और दिल्ली सरकार के रिटायर्ड अफसरों के साथ बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में भी फैसले लिए गए। अवतार सिंह, कैलाश गहलोत, राजेश ऋषि और सरिता सिंह ने कोई फैसला लेने वाली बैठक नहीं की। आदर्श शास्त्री ने आईटी मंत्री के संसदीय सचिव के नाते डिजिटल इंडिया पर एक कांफ्रेंस में हिस्सा लिया और 15,479 रुपये का भत्ता लिया। ऐसा बाकी किसी विधायक के मामले में नहीं दिखा।

क्या है आप की रणनीति?

आठ विधायकों ने अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की हैं। ये याचिकाएं जान बूझकर अलग-अलग दाखिल की गई हैं। सूत्रों के मुताबिक कानून के जानकारों ने आप विधायकों को सलाह दी है कि विधायकों को मामला बिल्कुल एक जैसा नही है। इसलिए सभी एक साथ याचिका दायर नहीं करें। किसी केस में राहत मिलने से सबको राहत मिलने की उम्मीद होगी। यानी एक में नकारात्मक नतीजा आया तो दूसरे किसी में फिर भी उम्मीद बनी रहेगी।

सरकार को खतरा नहीं

विधानसभा द्वारा रिक्तियां घोषित किए जाने के बाद आप के विधायकों की संख्या 70 सदस्यीय विधासभा में 66 से घटकर 46 रह जाएगी। हालांकि सरकार चलाने के लिए पार्टी के पास बहुमत बरकरार रहेगा। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी कहते हैं, ‘‘हमारे 20 विधायकों पर झूठे केस कर दिए, मेरे ऊपर सीबीआई की रेड करा दी और तब भी इनको कुछ नहीं मिला। इनको पूरे देश में केजरीवाल ही करप्ट मिला, बाकी सब ईमानदार हैं। जब कुछ नहीं हुआ, तो इन्होंने हमारे 20 विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया। ऊपर वाले ने 67 सीट कुछ सोच कर ही दी थी। हर कदम पर ऊपर वाला आम आदमी पार्टी के साथ है, नहीं तो हमारी औकात ही क्या थी। बस सच्चाई का मार्ग मत छोड़ना।’’

दोनों विपक्षी दल तैयारी में

साल 2016 की जुलाई में कांग्रेस नेता अजय माकन भी कोर्ट में एक पक्षकार बनना चाहते थे। हालांकि चुनाव आयोग ने उनकी अर्जी नकार दी। शायद अजय माकन को यकीन है कि दिल्ली में 20 सीटों पर उपचुनाव हुए तो कांग्रेस को भी विधानसभा में घुसने का मौका मिलेगा। इस तरह वे कांग्रेस आलाकमान के सामने अपनी अहमियत का इजहार कर सकेंगे। फिलहाल दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस की एक भी सीट नहीं है। इसके विपरीत विधानसभा के आम चुनाव में सदन में बीजेपी के तीन विधायक पहुंचे, जबकि राजौरी गार्डेन सीट पर उपचुनाव में बीजेपी टिकट पर ही अकाली नेता मनजिंदर सिंह सिरसा चुन कर आये। स्वाभाविक तौर पर कांग्रेस किसी भी तरह सदन में अपने प्रवेश की कोशिश में है, तो बीजेपी को अपनी ताकत बढ़ाने का मौका मिलेगा।

पहले भी दिए गये ऐसे पद

दिल्ली में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने 2006 में कांग्रेस के 19 विधायकों को कई प्रकार के पद दिए थे। इनमें संसदीय सचिव से लेकर ट्रांस यमुना एरिया डेवलपमेंट बोर्ड के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन जैसे लाभ के पद शामिल थे। बाद में चुनाव आयोग ने 19 विधायकों को आॅफिस आॅफ प्रॉफिट का नोटिस भेज दिया। जवाब में शीला दीक्षित अपनी सरकार बचाने के लिए एक विधेयक ले आईं। इसके जरिए14 कार्यालयों को आॅफिस आॅफ प्रॉफिट के दायरे से बाहर कर दिया गया। उस दौरान शीला दीक्षित ने कहा था कि अपनी सरकार बचाना मेरा हक है और संवैधानिक तौर पर हम ऐसा कर रहे हैं।

फिलहाल, कर्नाटक में भी ऐसे 10 विधायकों  के नाम सामने आए हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या ने संसदीय सचिव नियुक्त किया था। ये सभी राज्य के मंत्रियों की तरह वेतन और भत्ते का लाभ ले रहे हैं। इनमें माकाबुल एस बागावन, राजा आलागुर, उमेश जी जाधव, डोडामनी रामाकृष्ण, चैन्नाबासाप्पा शिवाली, शकुंतला टी शेट्टी, सी पुटुरंगाशेट्टी, एच पी मंजुनाथ, ई थुकराम, के गोविंदाराज शामिल हैं।

इसी तरह 90 सीटों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा में भाजपा के 49 विधायक हैं, जिनमें से 11 संसदीय सचिव के पद पर अभी भी काम कर रहे हैं। वहीं राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार में 10 विधायक को इस तरह के पद दिए गये हैं, जो संसदीय सचिव के पद पर 40 हजार की सैलरी के अलावा 50 हजार अलाउंस भी लेते हैं। इसमें मेडिकल और बाकी सुविधाएं शामिल नहीं हैं। ये बिलकुल दिल्ली जैसा ही लाभ के पद का मामला है। पंडुचेरी में भी लाभ के पद का एक मामला सामने आया है। विधायक के लक्ष्मीनारायण संसदीय सचिव के पद पर हैं। वहीं पश्चिम बंगाल में टीएमसी की सरकार ने भी साल 2013 और2014 में 26 संसदीय सचिवों को नियुक्त किया था। हालांकि कलकत्ता हाई कोर्ट ने 2015 में इसपर रोक लगा दी थी। किसी की सस्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वहीं हरियाणा में भी चार विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया था। 18 जुलाई 2017 को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ये नियुक्तियां रद्द कर दीं। इन संसदीय सचिवों को 50 हजार सैलरी मिलती थी और एक लाख रुपये से ज्यादा भत्ता मिलता था। इस मामले में भी सिर्फ नियुक्तियां रद्द हुईं लेकिन, सदस्यता किसी विधायक की नहीं गई। इसी तरह मध्य प्रदेश विधानसभा के 118 विधायक ऐसे है जो इस तरह के  पद का लाभ उठा रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने इस मामले की शिकायत भी की थी। अगर दिल्ली की तरह यहां कदम उठाए गए तो शिवराज सरकार को इस्तीफा देने की नौबत आ सकती है।

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याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता प्रशांत पटेल

प्रशांत पटेल ने कहा कि राष्ट्रपति के निर्णय मामले में कोर्ट कोई राहत नहीं दे सकता। हालांकि वो विधायक कहीं भी जाने को स्वतंत्र हैं। सम्भवत: फरवरी माह में इन सीटों पर उपचुनाव होंगे। चुनाव आयोग की तरफ से आप विधायकों को बराबर मौके दिए गए। दिल्ली के मुख्य सचिव ने इसके सबूत दिए कि किस प्रकार इन्होंने पैसों की बंदरबांट की है। अब ये बहानेबाजी कर रहे हैं।

 

अयोग्य करार दिए गये विधायक

आदर्श शास्त्री, द्वारका

अल्का लांबा, चांदनी चौक

अनिल वाजपेई, गांधी नगर

अवतार सिंह, कालकाजी

कैलाश गहलौत, नजफगढ़

मदनलाल, कस्तूरबा नगर

मनोज कुमार, कोंडली

नरेश यादव, महरौली

नितिन त्यागी, लक्ष्मी नगर

प्रवीण कुमार, जंगपुरा

राजेश गुप्ता, वजीरपुर

राजेश ऋषि, जनकपुरी

संजीव झा, बुराड़ी

सरिता सिंह, रोहतास नगर

सोम दत्त, सदर बाजार

शरद कुमार, नरेला

शिव चरण गोयल, मोती नगर

सुखबीर सिंह, मुंडका

विजेंद्र गर्ग, राजेंद्र नगर

जरनैल सिंह, तिलक नगर

विधायक जरनैल सिंह पहले ही पंजाब विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे चुके हैं।

एक्सपर्ट कमेंट फोटो के  साथ

आप आए, आप छाए, आप ही आप चर्चा का विषय रहे, घर-घर में, हर खबर में, तो फिर किस बात की फिक्र आप को? प्रतिशोध की राजनीति ज्यादा लंबी नहीं चलेगी। चिंता न करो, खुश रहो।’


शत्रुघ्न सिन्हा
भाजपा सांसद

आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को अयोग्य ठहराने से संबंधित राष्ट्रपति का आदेश असंवैधानिक और लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।


आशुतोष
आप नेता

फैसला ‘दुखद है और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले राष्ट्रपति को उन्हें सुनना चाहिए था। याचिका 21 विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए दायर की गई थी, लेकिन एक ने कुछ महीने पहले इस्तीफा दे दिया था।-


अल्का लांबा
आप नेता

 

आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को अयोग्य ठहराने का राष्ट्रपति का फैसला न्याय की प्रकृति के खिलाफ है। इस मामले में कोई सुनवाई नहीं हुई और न ही हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार किया गया। यह तुगलकशाही का सबसे बुरा फरमान है।


यशवंत सिन्हा
भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री

घटनाक्रम

13 मार्च 2015 को मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया।

19 जून 2015 को अधिवक्ता प्रशांत ने लाभ के पद मामलें की याचिका राष्ट्रपति के समक्ष रखते हुए सदस्य्ता रद्द करने की मांग की।

24 जून 2015 को एक संशोधन बिल राष्ट्रपति को भेजा गया। इसमें पिछले समय से संसदीय सचिवों को छूट देने की बात कहीं गई।

13 जून 2016 को प्रणब मुखर्जी ने इसपर हस्ताक्षर करने से मना करते हुए इसे वापस लौटा दिया।

25 जून 2016 को सरकार ने संसदीय सचिव सम्बंधी बिल विधानसभा को भेजा।

14 से 21 जुलाई 2016 के बीच चुनाव आयोग ने 21 विधायकों की व्यक्तिगत सुनवाई की।

8 सितंबर 2016 को दिल्ली हाईकोर्ट ने संसदीय सचिव बनाने के आदेश को निरस्त कर दिया और उसी दिन चुनाव आयोग ने विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया।

24 जून 2017 को चुनाव आयोग ने विधायकों की अपील खारिज की।

9 अक्टूबर 2017 को फिर से नोटिस जारी कर चुनाव आयोग ने विधायकों से सफाई मांगी।

19 जनवरी 2018 को चुनाव आयोग ने सदस्य्ता रद्द करने की सिफारिश राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेजी। राष्ट्रपति ने 21 जनवरी को इस पर अपनी स्वीकृति दे दी। अगले दिन केंद्र सरकार ने इस मामले में नोटिफिकेशन जारी किया।

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