हाड़ी राज्य मेघालय में पांच वर्ष बाद फिर से विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। राज्य की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस एक बार फिर मतदाताओं से पांच वर्ष के लिए जनमत मांग रही है। गत 15 वर्षों से सत्ता पर बैठी कांग्रेस के कामकाज को लेकर जनता में भारी आक्रोश है। लोग कांग्रेसी सरकार को विकास विरोधी करार दे रहे हैं। इस तरह का आरोप भारतीय जनता पार्टी भी सत्ताधारी पार्टी पर लगा रही है। वहीं नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) ने जनता के पैसे को लूटने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है।

60 सदस्यीय सीटों वाले मेघालय विधानसभा के चुनाव में कुल 443 उम्मीदवारों ने अपना नामांकन दाखिल किया है। मुख्य मुकाबला कांग्रेस, एनपीपी, भाजपा, एनसीपी, यूडीपी समेत अन्य कई क्षेत्रीय पार्टियों के बीच होने वाला है। वहीं काफी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। शांतिपूर्ण मतदान के लिए बड़ी संख्या में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के साथ ही राज्य पुलिस को भी तैनात किया गया है। वहीं राज्य से लगने वाली राज्य व अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को सील कर गहन तलाशी अभियान चलाया जा रहा है।

विपक्षी आरोपों के बीच यह देखना होगा कि क्या विपक्ष के आरोपों में दम है या हवा-हवाई है। राज्य में किए गए विकास कार्यों पर नजर दौड़ाएं तो काफी हद तक स्थिति साफ होती दिखाई देती है। मेघालय में विकास के नाम पर राज्य सरकार के द्वारा आम नागरिकों के लिए मुहैया कराए जाने वाले मूलभूत सुविधाओं के नाम पर कुछ भी दिखाई नहीं देता है। हालांकि गत तीन वर्षों में राज्य में राष्ट्रीय राजमार्गों का विकास तो हुआ है, लेकिन राज्य सरकार की सड़कों की हालत बेहद खराब है। जबकि कोयला उत्पादन करने वाले राज्य में बिजली आम लोगों के घरों तक आज तक नहीं पहुंच पाई है। सरकार ने कोयला तो जमीन से जरूर निकाला, लेकिन उसको बेचकर पैसा राजनेता, अधिकारी अपनी जेबों में भरते रहे।

मुख्य मुकाबला कांग्रेस, एनपीपी, भाजपा, एनसीपी, यूडीपी समेत अन्य कई क्षेत्रीय पार्टियों के बीच होने वाला है। वहीं काफी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव में
अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

विकास की दूसरी तस्वीर रेलवे को देखने से साफ हो जाएगी कि राज्य सरकार विकास पक्षधर है या नहीं। संभवत: देश के रेल इतिहास में यह पहली बार हुआ होगा कि कोई स्वीकृत योजना इसलिए बंद कर दी गई, क्योंकि राज्य सरकार रेलवे को जमीन मुहैया नहीं करा पाई। यह बेहद शर्मनाक बात है। राजधानी गुवाहाटी से सड़क मार्ग के जरिए लगभग 120 किमी की दूरी पर मेघालय की राजधानी शिलांग स्थित है। रेलवे विभाग गत कई वर्षों से गुवाहाटी के सोनापुर से बनीर्हाट तक रेलवे लाइन बिछाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन आज तक वह पूरा नहीं हो पाया। जबकि दूसरे फेज में बनीर्हाट से शिलांग तक रेलवे लाइन बिछानी थी।

सरकार स्थानीय संगठनों व छात्र संगठनों के दबाव में आकर रेलवे लाइन बिछाने के लिए सुरक्षा मुहैया नहीं करा पाई। उपद्रवी तत्वों ने रेलवे की संपत्ति आग के हवाले कर देते थे। ठेके पर काम कर रहे लोगों की पिटाई भी की गई। राज्य में रेलवे के विरोध के पीछे तर्क दिया जाता है कि हमारी जमीनों पर किसी और का कब्जा हो जाएगा। जिसे हम स्वीकार नहीं कर सकते। जबकि कहानी कुछ और ही है। यहां से निकलने वाला कोयला ट्रकों के जरिए राज्य से बाहर जाता है। जिसकी मलाई राजनेता, अधिकारी, सामाजिक संगठन व छात्र संगठनों के नाम पर अपनी दुकानदारी चला रहे युवा जमकर खाते हैं। सभी को पता है कि अगर रेलवे लाइन बिछ गई तो उनका यह धंधा चौपट हो जाएगा। मेघालय में कोयले से उगाही के लिए सरकारी चेक गेटों के अलावा सामाजिक संगठन व छात्र संगठनों के भी चेक गेट हैं, जहां पर जमकर पैसे उगाहे जाते हैं। अपनी जेब भरने के लिए आम नागरिकों को मूलभूत अधिकारों की सत्ताधारी पार्टी बलि दे रही है।

मेघालय राज्य प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण राज्य है। जहां राज्य में प्रचूर मात्रा में कोयला है, वहीं धरती पर पाया जाने वाला सबसे कीमती धातु यूरेनियम भी मौजूद है। बावजूद यह राज्य विकास की दौड़ में आज भी कोसों पीछे खड़ा है। इस बार के चुनाव में मतदाता आशा भरी नजरों से विकास का सपना लिए मतदान करने के लिए खड़े दिखाई दे रहे हैं। मतगणना के बाद ही साफ होगा कि राज्य में बदलाव होता है या फिर से पुरानी कहानी दोहाई जाएगी।

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