लोकसभा चुनाव का काउंट डाउन शुरू हो गया है। हर एक राजनीतिक दल इसे लेकर अपनी- अपनी तैयारी में हैं। इसी के मद्देनजर बिहार के मिथिला संभाग की चर्चा यहां की जा रही है। मिथिला क्षेत्र विशेष के राजनीतिक समीकरण के गुणा-भाग के बारे में विस्तार से बात की गई है।

बि हार के मिथिला से ही भाजपा का विजय रथ आरंभ होता है। कम से कम नीतीश कुमार के कारण ही मधुबनी भाजपा के पास गया, नहीं तो यहां से राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी की जीत तय ही थी। बगल के चुनाव क्षेत्र झंझारपुर को भी नीतीश कुमार नहीं समझ पाए, यह भाजपा के खाते में यूं ही चला गया। मधुबनी, झंझारपुर, दरभंगा, उजियारपुर और समस्तीपुर। मिथिला का हृदय है मधुबनी और झंझारपुर। मधुबनी के वर्तमान सांसद हैं हुकुमदेव नारायण यादव, जो अब बढ़ती आयु के कारण चुनाव न लड़ने का फैसला कर चुके हैं। अब सवाल है कि भाजपा की ओर से कौन चुनाव लड़ेगा? मधुबनी के लिए दो नाम आ रहे हैं, पहला 2014 के पराजित सिद्दीकी का, क्योंकि नीतीश कुमार की कृपा से लगभग 20 हजार वोटों से हारे थे। नीतीश कुमार ने यहां से किसी युग में मिथिला के मुस्लिम नेता गुलाम सरवर के दामाद गुलाम गौस को अपना उम्मीदवार बना दिया था। गौस ने उतने ही वोट काटें, जितने से हुकुमदेव नारायण की जीत हो सकी। पर यहां एक और प्रश्न है कि क्या सिद्दीकी उम्मीदवार हो सकेंगे या 2004 के विजेता कांगेस के शकील अहमद होंगे।

मधुबनी से ही सटा झंझारपुर है। यह चुनाव क्षेत्र 1977 में चर्चित हुआ था, जब यहां उपचुनाव हुआ जिसमें कर्पूरी ठाकुर उम्मीदवार थे। देवेंद्र प्रसाद यादव ने उनके लिए अपनी विधानसभा सीट छोड़ी थी। उन्हें तब विधान परिषद का सदस्य बनाया गया। 1977 और 1980 में धनिक लाल मंडल (धानुक) लोकसभा के लिए चुने गए थे। वह 1967 से 1974 तक बिहार विधान सभा के सदस्य थे। वह केंद्र में गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री भी रहे। अतिपिछड़ों में इसे धानुक बहुल माना जाता है। पर देवेंद्र प्रसाद यादव यहां से 1998 को छोड़कर 1984 से 2004 तक सांसद रहे। बीच में वे देवगौड़ा सरकार में मंत्री भी रहे। परंतु 2009 में वह मगनी लाल मंडल (धानुक) से हारे। अतिपिछड़ा बहुल इस क्षेत्र में एक नई जाति केऊट का उदय हो चुका था। केऊट एक खेतिहर जाति है, इसका कोई संबंध केवट या मल्लाह से नहीं है। नीतीश कुमार इसे न समझ सके और 2009 के विजेता मंगनी लाल मंडल के बजाय देवेंद्र प्रसाद यादव को अपना उम्मीदवार बनाया। मंगनी लाल मंडल राजद के टिकट पर लड़े। परंतु भाजपा ने कभी बिहार विधान परिषद के उपसभापति रहे वीरेंद्र कुमार चौधरी को खड़ा कर दिया और वह जीत गए। ये नरेंद्र मोदी लहर के कारण संभव हुआ। दरभंगा में कीर्ति आजाद की जीत सरल थी। 2014 में तो मोदी लहर उनके साथ थी और उनकेखिलाफ जदयू ने संजय झा को उम्मीदवार बना दिया, जो तीसरे नंबर पर रहे। अब कीर्ति आजाद बाकायदा कांग्रेस में शामिल हो गये हैं। यहां से अब कौन प्रत्याशी होगा? भाजपा ने यह सीट जदयू को दे दी है और जदयू के संजय झा यहां से उम्मीदवार हो सकते हैं। मोहम्मद अली अशरफ फातमी को, ये सबसे अधिक दरभंगा से सांसद रहे -चार बार जीते और एक बार भाजपा के कीर्ति आजाद से हारे। दरभंगा में एक और हैं मुकेश सहनी -सन आफ मल्लाह! माना जाता है कि महागठबंधन के यही प्रत्याशी होंगे।

उत्तर बिहार में मल्लाह और कुशवाहा, ऐसा समुदाय हैं, जो किसी भी क्षेत्र से किसी को हरा या जिता सकते हैं। कमाल था कि राजीव गांधी अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब हर जगह से जीत रहे थे, तो ललित नारा़यण मिश्र के पुत्र विजय कुमार मिश्र 1984 में यहां से जीत गए। उजियारपुर, दरभंगा और समस्तीपुर से सटा हुआ है। यह क्षेत्र बना ही 2009 में और यह कुशवाहा बहुल क्षेत्र है। यहां से 2009 में कुशवाहा समाज से अश्वमेध देवी जीती थीं, पर 2014 में भाजपा के नित्यानंद राय (यादव) से हार गयीं। वे उम्मीदवार नंबर तीन हो गयीं। दूसरी जगह पर राजद के आलोक कुमार मेहता रहे। समस्तीपुर आरक्षित क्षेत्र है और 2014 में यहां से विजेता हैं रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान। 1952 में इसे समस्तीपुर पूर्व भी कहा जाता था। जब यह सामान्य क्षेत्र था, तब सत्य नारायण सिन्हा 1962 तक जीतते रहे। 1977 में कपूर्री ठाकुर भी जीते थे। उसके बाद कोई न कोई कुशवाहा ही जीतता रहा। रामचंद्र पासवान कांग्रेस के अशोक कुमार से महज 10 हजार वोट से जीत पाये। पर 2014 में निसंदेह मिथिला का पाग नरेंद्र मोदी का श्रेय है। मिथिला ही नहीं, आगे भी भाजपा का विजय रथ चलता ही रहेगा।

 

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