अजमेर शहर विधानसभा सीटों की दृष्टि से उत्तर और दक्षिण में बंटा हुआ है। राजनीतिक दृष्टि से भी इन दोनों ही सीटों से चुने गए जनप्रतिनिधि एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। विगत दो दशकों में कभी ऐसा नहीं हुआ, जब अजमेर की दो विधानसभा सीटों पर एक से बीजेपी और दूसरे पर कांग्रेस जीती हो। हर बार दोनों ही सीटों पर एक ही पार्टी के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। इस बार लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि ये मिथक टूटेगा या बना रहेगा। अघोषित तौर पर बीजेपी के लिए दो दशकों से अजमेर उत्तर विधानसभा सीट सिंधी समुदाय के लिए आरक्षित रहती आई है। लगातार 15 वर्षों से वासुदेव देवनानी यहां से विधायक हैं। इसे पहले हरीश झामनानी हुआ करते थे। वर्तमान में शिक्षा एवं पंचायती राजमंत्री रहते देवनानी लगातार चौथी बार चुनाव लड़ने को तैयार हैं।

अजमेर की दोनों विधानसभा सीटें आगामी चुनाव की दृष्टि से काफी अहम मानी जा रही हैं। फिलहाल बीजेपी और कांग्रेस यहां की राजनीति में फंसी हुई है। जहां कांग्रेस सिंधी व गैर सिंधी के भंवर में है, वहीं बीजेपी को मत ध्रुवीकरण का भय सता रहा है।

वहीं अजमेर दक्षिण सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। दक्षिण से महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री अनीता भदेल भी चौथी बार मतदाताओं का समर्थन पाने की इच्छुक हैं। अनीता से पहले इस सीट से श्रीकिशन सोनगरा विधायक हुआ करते थे। इससे पूर्व अजमेर की दोनों सीट कांग्रेस के पास थी। इस बार आमजन में बीजेपी सरकार के प्रति नाराजगी है। इससे बीजेपी को अपनी इन दोनों ही सीटों पर चेहरा बदलकर चुनावी जंग जीतने का दबाव बना हुआ है। अगर सरकार इन चेहरों को बदलती है, तो मतदाताओं के बीच गलत संदेश जाने की भी संभावना है। और नहीं बदलती है, तो बीजेपी के सामने सीट बचाने की बड़ी चुनौती है ही। यहां की जनता ने यद्यपि अजमेर में लोकसभा व विधानसभा उपचुनाव दोनों में ही इस बात के संकेत दे दिए हैं। जबकि अजमेर से कांग्रेस के डॉ. रघु शर्मा विजयी होकर संसद पहुंचे हैं। बीजेपी ने 2014 का चुनाव मोदी लहर में भारी बढ़त के साथ जीता था।

सामने खड़ा सिंधी-गैरसिंधी विवाद

अजमेर शहर विधानसभा सीट को लेकर सिंधी-गैरसिंधी दावेदारी का मामला हर चुनाव में उठता रहा है। वर्तमान में भी अघोषित रूप से सिंधी आरक्षित समझे जाने वाले इस विधानसभा क्षेत्र से 28 पार्षदों में सिर्फ एक ही सिंधी पार्षद चुना गया है। यहां गैर सिंधी को चुनाव में उतारे जाने का रिस्क बीजेपी ने कभी नहीं उठाया। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि इस अघोषित सिंधी सीट के कारण ही बीजेपी दक्षिण की सीट पर भी जीत दर्ज करती आई है। परिसीमन के बाद अजमेर दक्षिण सीट पर सिंधी समाज की प्रभावी भूमिका बनने लगी है। बीजेपी के पास प्रदेश भर में सिंधी समुदाय को बांधे रखने के लिए श्रीचंद कृपलानी व वासुदेव देवनानी दो ही चेहरे फिलवक्त उपलब्ध हैं। इन चेहरों को बदलना यद्यपि मुश्किल है, किन्तु प्रदेश भर में ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत समुदाय की बीजेपी से बढ़ती नाराजगी के दृष्टिगत डैमेज कंट्रोल करने की गरज से कुछ भी संभव हो सकता है। यहां बता दें कि 2014 के विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते अजमेर उत्तर सीट बीजेपी ने 20,000 मतों से जीती थी। उपचुनाव में इस सीट से 7,000 मतों का बीजेपी को फटका लगा। लिहाजा बीजेपी को सीट बनाए रखने में खासी मशक्कत करनी होगी। इसी तरह अजमेर दक्षिण सीट पर भी मोदी लहर में भारी मतों के अंतर से जीतने वाली अनीता भदेल का उपचुनाव में 13 हजार मतों से पिछड़ना व नगर निगम चुनाव में अपने ही वार्ड से पार्षद उम्मीदवार को विजयश्री नहीं दिला पाना उनके विरोधियों को संबल दे रहा है।

वहीं उपचुनाव में ही जनता ने कमजोर उम्मीदवारी के चलते बीजेपी को पटखनी दे दी। यदि लोकसभा चुनाव को विधानसभा 2018 चुनाव का सेमीफाइनल नहीं भी माना जाए, तो भी मतों के ध्रुवीकरण का खेल दोनों ही तरफ से सही प्रत्याशियों के चयन पर टिका हुआ है। मजेदार बात ये है जिन लोगों के पास पूरे जिले की सीट बचाने और जिताने का दारोमदार है, वे ही उम्मीदवारों की कतार में खड़े हैं। इस वजह से मौजूदा विधायकों को चुनौती मिल रही है। अजमेर शहर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट का संसदीय गृह क्षेत्र है। गत लोकसभा चुनाव हारने के बाद सचिन ने यहां मजबूत स्थिति बनाई है। लिहाजा कांग्रेस के पास अजमेर की दोनों सीटों पर खोने को कुछ भी नहीं है, जबकि बीजेपी को न सिर्फ सीट गंवाने का खतरा है, अपितु टिकट वितरण सही नहीं हुआ, तो मतदाताओं का ध्रुवीकरण होने का भी भय सता रहा है।

उम्मीदवारी के लिए खींचतान

अजमेर की दोनों सीटों पर जिन लोगों पर पार्टी की जीत का दारोमदार होना चाहिए, वे ही दावेदार बनकर चुनौती पेश कर रहे हैं। बीजेपी से एडीए अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा, पूर्व सभापति सुरेन्द्रसिंह शेखावत, तीन बार के पार्षद व बीजेपी के प्रदेश मीडिया सह प्रभारी नीरज जैन, राजस्थान धरोहर प्रोन्नति प्राधिकरण के सदस्य कंवल प्रकाश किशनानी, बीजेपी संगठन से जुड़े तुलसी सोनी ने अजमेर उत्तर से खुली दावेदारी कर वासुदेव देवनानी के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। अजमेर दक्षिण से जिला प्रमुख वंदना नोगिया, पूर्व मेयर प्रत्याशी डॉ. प्रियशील हाड़ा, विधि प्रकोष्ठ के अध्यक्ष मनोज डीडवानिया, पूर्व विधायक बाबूलाल सिंगारिया, हीरा लाल जीनगर आदि बीजेपी संगठन से जुड़े लोगों ने ताल ठोक रखी है। उधर, कांग्रेस से पीसीसी सचिव महेन्द्र रलावता, कांग्रेस से शहर अध्यक्ष विजय जैन दावेदारी कर रहे हैं। सिंधी समुदाय की ओर से सचिन पायलट के नजदीकी मानेजाने वाले दीपक हासानी भी कतार में हैं। वहीं दक्षिण से कांग्रेस के पूर्व प्रत्याशी समाजसेवी व उद्योगपति हेमन्त भाटी, कांग्रेस के पूर्व मेयर कमल बाकोलिया, पूर्व विधायक राजकुमार जयपाल सहित एक दर्जन से अधिक ने पार्टी टिकट पर दावेदारी जताई है।

यहां छाए हैं ये मुद्दे

अजमेर की मूलभूत आवश्यकता पानी, बिजली, चिकित्सा, शिक्षा व सुरक्षा के प्रति सरकार का गंभीर न होना है। केंद्र द्वारा अजमेर को स्मार्टसिटी घोषित करने के बावजूद कोई अपेक्षित लाभ दिखाई नहीं दे रहा है। अजमेर ठोस कचरा प्रबंधन, सीवरेज, पार्किंग, यातायात व्यवस्थाओं आदि में कोई सफलता हासिल नहीं कर पाया है। बजरी खनन पर रोक, निर्माण कार्यों पर नोट बंदी व जीएसटी की मार से दिहाड़ी श्रमिकों के प्रति सरकार ने कोई विशेष संवेदनाएं नहीं दिखाई हैं। युवा और बेरोजगार सरकार से खफा हैं। राज्य कर्मचारी और मध्यमवर्गीय लोग रोज बढ़ते पेट्रोल के दाम व महंगाई से स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। बहरहाल जनता नवम्बर के प्रथम सप्ताह में प्रत्याशियों की सूची का इंतजार कर रही है।

सत्तारूढ़ बीजेपी और प्रतिपक्ष कांग्रेस में इस बार फिर किसको मौका मिलता है, इस पर मतदाताओं की निगाहें लगी हुई हैं। यहां जोरदार पहलू ये है कि यदि टिकट वितरण में सचिन पायलट की चली, तो उत्तर से हासानी, रलावता या जैन किसी को भी मैदान में उतारा जा सकता है। दक्षिण से हेमंत भाटी और कमल बाकोलिया में से कोई उम्मीदवार हो सकता है। यदि टिकट वितरण में अशोक गहलोत की चली, तो इस आरक्षित सीट से डॉ. राजकुमार जयपाल का नाम फिर से उभर सकता है। जबकि गहलोत की ओर से उत्तर सीट पर उम्मीदवारी को लेकर रहस्य बना हुआ है। बहरहाल सभी को दीपावली का इंतजार है।

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