पंचायत चुनावों में जहां तृणमूल नंबर वन पार्टी बनकर उभरी, वहीं भाजपा ने वाम मोर्चा को पछाड़ते हुए दूसरा स्थान हासिल किया।


पश्चिम बंगाल में चुनाव हो और खून–खराबा न हो, यह कतई मुमकिन नहीं है। यहां चुनावी हिंसा का पुराना इतिहास रहाहै। दिलचस्प तथ्य यह है कि बंगाल में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तुलना में स्थानीय निकाय चुनावों मेंअधिक हिंसा होती रही है। इस बार के पंचायत चुनाव में जिस तरह से हिंसा का तांडव मचाया गया उसकी आशंका पहलेसे ही थी। चुनाव की अधिसूचना जारी होने के साथ खून–खराबे का जो सिलसिला शुरू हुआ वह नतीजे आने के बाद तकचलता रहा। चुनावी हिंसा में दो दर्जन से अधिक लोगों की मौत हुई जबकि सैकड़ों घायल हुए। इतने बड़े पैमाने पर हुएखून–खराबे को लेकर विपक्षी पार्टियों के साथ समाज की चिन्ता करने वाले बुद्धिजीवियों ने भी काफी हो–हंगामा किया, लेकिन राज्य सरकार ऐसे अंजान बनी रही जैसे कुछ हुआ ही न हो। सरकार और प्रशासन ने तो हिंसा से जुड़े सच्चाई कोकबूल करने की हिम्मत भी नहीं दिखाई, उल्टे यह जताने की कोशिश करती रही कि इस बार जो हिंसा हुई वह पहले केचुनावों की तुलना में काफी कम थी।

पंचायत चुनाव में किसी भी तरह अपना वर्चस्व कायम रखने की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की पिपाशा से विपक्षी पार्टियांपहले से ही आशंकित थी। नामांकन दाखिल करने के दौरान विपक्षी उम्मीदवारों पर हमले की घटनाओं और सरकारीमशीनरी के दुरुपयोग के दर्जनों उदाहरण सामने आने के बाद विपक्षी पार्टियों ने अदालत की शरण ली। मामला सुप्रीमकोर्ट तक जा पहुंचा जिसके चलते चुनाव आयोग को तीन चरणों में चुनाव मतदान करवाने के अपने पूर्व निर्धारितकार्यसूची में फेरबदल करना पड़ा और लंबी कानूनी जद्दोजहद के बाद 14 मई को एक ही चरण में पूरे राज्य में मतदानकरवाया जा सका। हालांकि सत्ता में होने का लाभ उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस ने लगभग 34 प्रतिशत सीटें पहले हीनिर्विरोध जीत ली। कुल 58 हजार 692 में से 20 हजार 76 सीटों पर प्रत्याशियों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करदिया गया।

14 मई को हुए मतदान के दौरान राज्य के प्रत्येक जिले से हिंसा की खबरें आई। इस दौरान बम और बंदूकों से लैसअपराधियों ने बूथ कैप्चरिंग, वोटरों को धमकाने और बैलेट बाक्स उठाने अथवा जलाने की दर्जनों घटनाओं को अंजामदिया। जाहिर तौर पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस हिंसा के केंद्र में रही। तृणमूल समर्थकों ने राज्य भर में जम कर तांडवमचाया। कुछ स्थानों पर अन्य दलों की ओर से उन्हें प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ा। 14 मई को दिन भर चलीराज्यव्यापी हिंसा में 18 लोग मारे गये। चुनावी हिंसा में मारे गये लोगों में विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों तरफ के लोगशामिल थे। राज्य चुनाव आयोग ने मतदान से पूर्व पुख्ता सुरक्षा इंतजाम किये जाने के जो दावे किये थे वे खोखले साबितहुए। कई मतदान केंद्रों पर पुलिस नजर ही नहीं आई।

मतदान में हुई व्यापक खून–खराबे से विपक्षी पार्टियां उबल पड़ी। वहीं तृणमूल के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन नेपिछले चुनावों से हिंसा की तुलना करते हुए कहा कि इस बार जो हिंसक घटनायें हुई हैं वे 1990 की हिंसा तुलना मेंबेहद मामूली हैं। राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजी) सुरजीत करपुरकायस्थ ने भी सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के सुर मेंसुर मिलाते हुए बयान दिया कि मतदान के दौरान हुई हिंसा पिछली बार यानी 2013 के पंचायत चुनाव के मुकाबलेकाफी कम रही। उधर मतदान के दिन कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश ज्योतिर्मय भट्टाचार्य ने चुनावी हिंसा कालाईव फुटेज देखने के बाद राज्य चुनाव आयुक्त और गृह सचिव को समन जारी किया। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने भीराज्य सरकार से रिपोर्ट तलब किया। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को फोन करहालात की जानकारी ली। भाजपा ने केंद्रीय गृहमंत्री के अलावा राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी और राज्य चुनाव आयुक्तअमरेन्द्र सिंह से भी सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ शिकायत की।

जंगलमहल में भाजपा की सेंध

भाजपा ने लंबे समय तक नक्सल आंदोलन से प्रभावित रहे जंगलमहल की तीन-चार जिलों में भी उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। जंगल महल के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में भाजपा ने उल्लेखनीय कामयाबी हासिल कर तृणमूल के विजय की खुशी का रंग कुछ हद तक फीका कर दिया। जंगलमहल के चार में से दो जिलों पुरुलिया और झारग्राम में भाजपा को अच्छी खासी सफलता मिली। पुरुलिया में भाजपा ने जिला परिषद की दस सीटों पर सफलता हासिल की, जो उसके लिए एक बड़ी उपलब्धि है। पिछले चुनाव में यहां भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। यहां तृणमूल कांग्रेस को 6 सीटों का नुकसान हुआ। इसी तरह झारग्राम में भी भाजपा पिछले चुनाव में खाता नहीं खोल सकी थी, लेकिन इस बार उसने यहां जिला परिषद की तीन सीटें जीत कर तृणमूल को चौंका दिया। बांकुड़ा जिले में भाजपा को जिला परिषद में कामयाबी भले ही नहीं मिली हो लेकिन यहां उसने ग्राम पंचायत और पंचायत समिति में 2013 के चुनाव की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया। ममता बनर्जी ने सत्ता में आने के बाद जंगलमहल के पिछड़े इलाकों के विकास के लिए विशेष योजनाएं शुरू की थी। इस बार के नतीजों से भाजपा जहां उत्साहित है, वहीं तृणमूल जीत के बावजूद आत्ममंथन करने को मजबूर है।

आश्चर्य की बात यह रही कि इतने बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुप्पी साधे रहीं। यहां तककि उन्होंने हिंसा में मारे गये लोगों के प्रति संवेदना जताना भी जरूरी नहीं समझा। मुख्यमंत्री की तो बात छोड़िये, जिसचुनाव आयोग पर निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान कराने की जिम्मेदारी थी, उसकी तरफ से भी हिंसा पर कोई प्रतिक्रियानहीं आई। मतदान संपन्न होने के बाद शाम 7 बजे के करीब आयोग के दफ्तर से बाहर निकले राज्य चुनाव आयुक्तअमरेन्द्र कुमार सिंह मतदान के दौरान हुई हिंसा में 18 लोगों की मौत और 70 से अधिक लोगों के घायल होने संबंधीसवाल का जबाव देने के बजाये ‘कल बोलूंगा’ कहकर मीडिया से भागते नजर आये।

चुनावी प्रक्रिया संपन्न होने के बाद भी पंचायत चुनाव कानूनी पचड़ों से बाहर नहीं निकल सका है। मतगणना के बाद गत21 मई को बुद्धिजीवियों के एक फोरम ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की जिसमें चुनाव आयोग पर शांतिपूर्ण और निष्पक्षचुनाव कराने में असफल रहने तथा हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए पंचायतचुनाव प्रक्रिया रद्द करने का अनुरोध किया गया है। अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार व निर्वाचनआयोग को 29 जून तक हलफनामा जमा करने को कहा है। मामले पर आगामी 6 जुलाई से सुनवाई की जायेगी।

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