किसी भी लोकतंत्र में संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को कोई भी संगठन छीन नहीं सकता है। किसी भी लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व चुनाव होता है। नगालैंड में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व पर कुछ संगठनों द्वारा ग्रहण लगाने की कोशिश की गई। लेकिन संविधान और लोकतंत्र की विजय हो गई। यह जीत चुनाव की नहीं बल्कि, चुनाव को न होने देने वाले तत्वों की हार पर हुई है। 60 सदस्यीय नगालैंड विधानसभा का चुनाव 27 फरवरी को होने वाला है। शांतिपूर्ण मतदान के लिए बड़ी संख्या में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के साथ ही राज्य पुलिस को भी तैनात किया गया है। जबकि राज्य से लगने वाली सीमाओं को सील कर गहन तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। चुनाव में आतंकियों द्वारा गड़बड़ी की आशंका के मद्देनजर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।

राज्य की राजनीति को पर्दे के पीछे से चलाने वाले संगठन अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं को बंधक बनाने के लिए नागा अधिकारों की दुहाई देते हुए गहरी साजिश रची थी। इस साजिश में राज्य के सभी राजनीतिक दल फंस गए। एक समय लगा कि राज्य में चुनाव नहीं होगा। 5 फरवरी तक एक भी नामांकन-पत्र नहीं भरा गया। हालांकि, भाजपा ने चुनाव में हिस्सा लेने का एलान कर दिया था, जिसके बाद धीरे-धीरे सभी राजनीतिक दल चुनाव विरोधी तंत्र के चंगुल से आजाद होते हुए चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने के लिए तैयार हो गए। इस तरह से दो दिनों में यानि 7 फरवरी को नामांकन-पत्र दाखिल करने के अंतिम दिन तक कुल 253 उम्मीदवारों ने अपना पर्चा दाखिल कर दिया।

उल्लेखनीय है कि ‘सोल्यूशन बिफोर एलेक्शन’ का नारा देते हुए कोर कमेटी आॅफ नगालैंड ट्राइबल होहोज एंड सिविल आॅगेर्नाइजेशन (सीसीएनटीएचसीओ) ने नगालैंड विधानसभा के चुनाव का बहिष्कार करते हुए सभी पार्टियों से एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर कराकर चुनाव में भाग लेने से सामाजिक तौर पर रोक लगा दिया। वहीं प्रतिबंधित संगठन एनएससीएन (आईएम) ने कड़ी चेतावनी जारी करते हुए चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने वालों को परिणाम भुगतने तक की धमकी दे दी। एनएससीएन की धमकी का असर भी दिखा। कोई भी पार्टी अपने उम्मीदवारों के नाम तक की घोषणा नहीं कर पा रही थी। लेकिन जैसे ही भाजपा ने चुनाव में हिस्सा लेने की घोषणा की, सभी पार्टियां एक-एक कर सामने आती चली गईं।

अंत में सीसीएनटीएचसीओ के संयोजक थेजा थेरिएह ने भाजपा पर धोखा देने के आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा के इस फैसले को नगाओं के इतिहास में याद रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि भाजपा द्वारा चुनाव में शामिल होने की घोषणा के बाद एक-एक करके राजनीतिक दल चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं। जिस पर सीसीएनटीएचसीओ को कहने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि, यह उन सबकी अपनी नैतिक जिम्मेदारी है कि वे नगा समस्याओं का समाधान चाहते हैं या नहीं। बार-बार सीसीएनटीएचसीओ के द्वारा नगा चर्चों से अपील की गई है कि वे रविवार की प्रार्थना में नगा समस्याओं का शीघ्र ही समाधान किए जाने के लिए प्रार्थना करें। इसके मायने क्या हैं। इसको समझना होगा। उल्लेखनीय है कि राज्य में बैप्टिस्ट चर्च की सामाजिक व राजनीतिक दोनों हल्कों में काफी गहरी पैठ बताई जाती है। बैप्टिस्ट चर्च के इशारे पर आतंकी समूह भी आगे-पीछे होते रहते हैं।

विधानसभा चुनाव में कुल 253 उम्मीदवारों ने अपने नामांकन दाखिल किए हैं। इसमें एनपीएफ (59), एनडीपीपी (40), कांग्रेस (20), जद (यू) (15), एलजेपी (2), एनसीपी (6),
आप (3) और निर्दलीय (17) उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।

कुछ स्थानीय संगठन व लोगों का कहना है कि सोल्यूशन बिफोर एलेक्शन का राजनीतिक खेल बैप्टिस्ट चर्च के इशारे पर ही खेला गया। इसके पीछे बड़ी साफ राजनीति दिखाई देती है। राज्य में कांग्रेस का जनाधार पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। ऐसे में भाजपा कहीं राज्य की सत्ता के पास न पहुंच जाए, इसको रोकने के लिए एक सोची-समझी साजिश के तहत सोल्यूशन बिफोर एलेक्शन का नारा दिया गया। इसके दो मायने हैं। अगर केंद्र सरकार इस ट्रैप में फंसती है तो ‘हां’ में भी फायदा और ‘ना’ में भी फायदा चुनाव विरोधी तंत्र का ही होता। जिसको चुनावों के दौरान भाजपा के विरोध में भुनाया जा सकता था। लेकिन भाजपा द्वारा चुनावों में उतरने की रणनीति ने चुनाव विरोधी तंत्र के किए-कराए पर पानी फेर दिया। नगालैंड विधानसभा चुनाव में नगालैंड में कार्यरत बैप्टिस्ट चर्च मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए जगह-जगह सेमिनारों का आयोजन कर रहे हैं। चुनाव में चर्च नई भूमिका में दिख रहे हैें वे चुनाव को लेकर मतदाताओं को अलग तरीके से पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। चुनाव का विरोध कर रहे संगठनों द्वारा जारी प्रत्येक विज्ञप्ति में नगालैंड के बैप्टिस्ट चर्च से अपील की जाती है कि वे ईश्वर से प्रार्थना करे कि चुनाव से पूर्व नगा समझौता पूरा हो जाए। बैप्टिस्ट चर्च द्वारा इस तरह की प्रार्थना ईश्वर से की जा रही है अथवा नहीं इसकी तो जानकारी नहीं मिली, लेकिन चर्चों द्वारा चुनाव के दौरान सेमिनार आयोजित करने की खबरें लगातार आती रही हैं।

इसी प्रकार का एक सेमिनार कोहिमा के चाखेसांग बैप्टिस्ट चर्च में आयोजित की गई थी। हालांकि, इस सेमिनार के बारे में इसके समापन के बाद नगालैंड बैप्टिस्ट चर्च काउंसिल द्वारा पारदर्शी चुनाव से संबंधित संदेश सेमिनार में लोगों को सुनाए जाने की बात कही गयी। इसके मुख्य आयोजक डॉ. वेवो फेसाओ के अनुसार इसमें चुनाव के दौरान वोटर आइडेंटिटी कार्ड लेने, एक व्यक्ति एक वोट के मार्ग पर चलने, क्रिश्चियन होने के नाते लालच में आकर वोट नहीं बेचने, राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए गए घोषणा-पत्र पर नजर रखने, चुनाव में खड़े हुए उम्मीदवार के व्यक्तित्व पर नहीं बल्कि पार्टी के घोषणा-पत्र को महत्व देने आदि के बारे में सेमिनार में उपस्थित लोगों को जानकारी दी जा रही। सेमिनारों को चर्च के पादरियों द्वारा संबोधित किया जा रहा। अपने संबोधन में किसने क्या कहा यह बातें तो स्पष्ट रूप से बाहर नहीं आ सकीं हैं। लेकिन इस प्रकार के आयोजित किए जा रहे कार्यक्रमों के आधार पर राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि नगालैंड के बैप्टिस्ट चर्च राज्य के मतदाताओं पर अपना प्रभाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उस प्रभाव का असली स्वरूप चाहे जो भी हो। लेकिन इतना तो तय है कि आसन्न विधानसभा चुनाव में नगालैंड के बैप्टिस्ट चर्चों की एक महत्वपूर्ण भूमिका बनती जा रही है।

नगालैंड विधानसभा चुनाव में कुल 253 उम्मीदवारों ने अपने नामांकन दाखिल किए हैं। जिसमें एनपीएफ (59), एनडीपीपी (40), कांग्रेस (20), जद (यू) (15), एलजेपी (2), एनसीपी (6), आप (3) और निर्दलीय (17) उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस पार्टी अंतिम समय तक एनपीएफ के साथ गठबंधन की कोशिश करती रही, लेकिन उसके हाथ खाली रहे। वहीं कांग्रेस ने एनपीपी के साथ भी चुनावी तालमेल के लिए हाथ-पैर मारा। वहीं से भी उसे निराशा हाथ लगी। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस को नगालैंड में चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशी नहीं मिल रहे थे। अंत में उसने किसी तरह से 20 उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा। एक समय राज्य में शासन करने वाली पार्टी कांग्रेस की हालत सबसे दयनीय बन चुकी है।

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