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र लोकसभा और दस विधानसभा उपचुनावों में मतदान के दिन से लेकर उसके बाद तक राजनीतिक दलोंने जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन या ईवीएम को खलनायक बनाने की कोशिश की है, वहनिश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। पिछले काफी समय से भाजपाविरोधी दल ईवीएम की शिकायतें करते रहे हैं। उसे हैक करने से लेकर उसमें छेड़छाड़ किए जाने तक का दावा भी करदिया। दुष्प्रचार इतना किया गया कि जो लोग ईवीएम की कार्यप्रणाली को नहीं जानते उन्हेंने भी संदेह हो जाए कि कुछ नकुछ गड़बड़ी अवश्य है। इन उपचुनावों के दौरान इसे जितने जोर–शोर से उठाया गया, उससे लगा कि वाकई ईवीएम मेंइतने व्यापक पैमाने पर यदि गड़बड़ी हुई है, तो फिर इससे लोकसभा चुनाव कराना कैसे संभव होगा? कैराना लोकसभाक्षेत्र में तो सैंकड़ों की संख्या में ईवीएम खराब होने की शिकायत की गई। महाराष्ट्र के गोंदिया भंडारा से भी ऐसी हीशिकायत की जाने लगी। मतदान कितना हो रहा है, किस तरह वहां सुरक्षा व्यवस्था है आदि पर चर्चा ही खत्म। चर्चाकेवल ईवीएम की। टीवी चैनलों पर भी बहस आरंभ और यह रात तक चलती रही। अंत में यह निष्कर्ष दिया गया किकरीब 25 प्रतिशत ईवीएम में कोई न कोई गड़बड़ी हुई और इससे मतदान प्रभावित हुआ। चुनाव आयोग के दिल्ली स्थितमुख्यालय से लेकर राज्य चुनाव आयोगों के दफ्तरों तक नेताओं के प्रतिनिधिमंडल ने ईवीएम की शिकायत की। इसमेंभाजपा का प्रतिनिधिमंडल भी शामिल था।

यह शोर अब भी जारी है कि ईवीएम में निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित नहीं हो सकते, इसलिए इसे हटाकर मतपत्रों वालीप्रणाली अपनाई जाए। पहली नजर में ऐसा लगता भी है। अगर वाकई 25 प्रतिशत ईवीएम में गड़बड़ी हुई तो फिर इस परपुनर्विचार करना पड़ेगा। किंतु क्या यही सच है? इसका सीधा उत्तर है, नहीं। मीडिया में मचे हंगामें तथा राजनीतिक दलोंकी शिकायतों के बाद चुनाव आयोग ने तत्काल कोई बयान देने की बजाय पूरी स्थिति की सही जानकारी की प्रतीक्षा की।जो जानकारी आई उससे सारा बावेला व्यर्थ का साबित हुआ। चुनाव आयोग ने 28 मई की शाम को इस संबंध में विस्तृतबयान जारी किया। इसमें कहा गया कि ईवीएम में खराबी और मतदान में बाधा उत्पन्न किए जाने संबंधी मीडिया रिपोर्टोंमें स्थिति को काफी बढ़ा–चढ़ाकर बताया जा रहा है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकसभा या विधानसभा केप्रत्येक चुनाव अथवा उपचुनाव में ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनों की 20 से 25 प्रतिशत अतिरिक्त संख्या उपलब्धरहती है जिससे मशीनों के खराब होने की स्थिति में तत्काल अतिरिक्त मशीनें लगाई जा सकें। अतिरिक्त मशीनें सेक्टरअधिकारी की निगरानी में रखी जाती हैं, जिन्हें वह मशीनों के खराब होने पर बदलता है। प्रत्येक सेक्टर अधिकारी केक्षेत्राधिकार में लगभग दर्जन भर मतदान केन्द्रों में मशीनों के रखरखाव की जिम्मेदारी होती है। आयोग ने साफ किया कि25 प्रतिशत मतदान केन्द्रों पर ईवीएम के खराब होने की खबर बिल्कुल गलत है।

हमारा चुनाव आयोग पूरी तरह निष्पक्ष एवं कुशल है तथा उसके मातहत मतदान के लिए उपयोग की जानी वाली ईवीएम बिल्कुल सुरक्षित। इसके साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ संभव ही नहीं। इसके विरुद्ध केवल अनैतिक दुष्प्रचार है।

चुनाव आयोग ने जो जानकारी दी उसके अनुसार कुल मिलाकर 10,365 मतदान केन्द्रों पर मतदान हुआ। इस तरह कुल10,365 ईवीएम का प्रयोग हुआ। इनमें से सिर्फ 96 को खराबी की वजह से बदलना पड़ा। यानी यह संख्या एक प्रतिशतसे भी कम है। जिस कैराना में सबसे ज्यादा शिकायत हुई वहां के बारे में मुख्य निर्वाचन अधिकारी एल. वेंकटेश्वर लू नेबताया कि गड़बड़ी ईवीएम में नहीं, बल्कि वीवीपैट में हुई। उन्होंने साफ किया कि कैराना लोकसभा एवं नूरपुर विधानसभाको मिलाकर केवल छह ईवीएम में खराबी आई। यह एक सामान्य स्थिति है। जहां–जहां मतदान में बाधाएं आईं, वहां देरतक मतदान कराया गया। उदाहरण के लिए कैराना उपचुनाव क्षेत्र के ग्राम मुबारकपुर में रात करीब दस बजे तक मतदानहुआ। गंगोह के गांव बिलासपुर के मतदान केन्द्र संख्या 237 व 238 पर पर भी रात दस बजे तक मतदान हुआ। तलसी, हरपाली व छावड़ी समेत आठ मतदान केन्द्रों पर भी रात नौ से दस बजे तक मतदान हुआ। नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में भीदो मतदान केन्द्रों पर रात 8 बजे तक वोटिंग हुई। विरोधी दलों ने तो यहां तक आरोप लगाना आरंभ कर दिया कि जिनजगहों पर भाजपा विरोधी मत पड़ने हैं, वहां ईवीएम में खराबी पैदा की गई ताकि मतदान बाधित हो सके। आरोप लगानेवाले अपने संकुचित राजनीतिक स्वार्थ में यह भूल गए कि ऐसा करके वे भाजपा को नहीं चुनाव आयोग जैसी स्वायत्तसंस्था की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर प्रश्न खड़ा कर रहे हैं।

राजनीतिक दलों का दायित्व है कि इसे स्वाभाविक रूप से लें। पहले तो केवल ईवीएम से ही चुनाव होता था। 2001 सेचुनाव आयोग इसका उपयोग कर रहा है। 2014 तक इसे लेकर इस तरह का हंगामा नहीं हुआ। जैसे–जैसे विपक्षी दलचुनाव हारने लगे वैसे–वैसे ईवीएम को बदनाम करने का खेल आरंभ हो गया। ये चुनाव आयोग की भाजपा से मिलीभगतका भी आरोप लगाने लगे। ईवीएम जब इंटरनेट से जुड़ा होता ही नहीं, तो फिर इसके हैक किए जाने का प्रश्न कहां सेउठता है। उसमें गड़बड़ी की जा सकती है, यह दावा करने वाले दलों, नेताओं और संगठनों को चुनाव आयोग ने बाजाब्ताचुनौती दी कि आइए और साबित करिए। कोई साबित करने आयोग नहीं गया। क्यों? क्योंकि ये केवल सुनी–सुनाई बातोंपर आरोप लगाते हैं। इनके संदेह को दूर करने के लिए ही चुनाव आयोग ने वीवीपैट की व्यवस्था की। वीवीपैट यानी वोटरवेरीफिएबल पेपर आॅडिट ट्रेल। यह एक ऐसी मशीन है जिसे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के साथ जोड़ा जाता है। मतदानकरने के बाद इससे एक कागज की पर्ची निकलती है। इस पर्ची में जिसे वोट दिया गया हो उस उम्मीदवार का नाम औरचुनाव चिह्न छपा होता है। वीवीपैट में लगी शीशे के स्क्रीन पर यह पर्ची सात सेकंड तक दिखाई देती है। यह मशीन वर्ष2013 में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया लिमिटेड ने बनाई थी। यह व्यवस्थाइसलिए है कि किसी तरह का विवाद होने पर ईवीएम में पड़े वोट के साथ पर्ची का मिलान किया जा सके।

वास्तव में हमें चुनाव आयोग की निष्पक्षता एंव ईमानदारी पर विश्वास करना चाहिए था। वैसी स्थिति में इसकी जरूरतनहीं पड़ती। केवल राजनीतिक दलों के संदेह करने के कारण मतदान पर वीवीपैट के अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ा है।हालांकि जितनी संख्या में वीवीपैट के खराब होने की शिकायतें आईं वो थोड़ी चिंताजनक हैं। लेकिन इसकी अतिरिक्तव्यवस्था पहले से थी, इसलिए तुरंत बदल दिया गया। वैसे अभी तक यह साफ नहीं है कि वाकई मशीनों में खराबी आईया उसके संचालन करने वालों से भूलें हुईं। लेकिन इनकी कुल संख्या भी 384 बताई गई हैं। आयोग ने कहा कि वीवीपैटखराबी की तकनीकी जांच कराई जाएगी। उसके बाद ही पता चलेगा कि इसके वास्तविक कारण क्या थे। वैसे आयोग कामानना है कि मतदान कर्मचारी वीवीपैट मशीनों का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर सके। यही कारण सबसे प्रबल नजर आताहै। हां, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि शायद कहीं–कहीं भीषण गर्मी के कारण वीवीपैट में लगे सेंसर ने काम करना बंदकर दिया हो। इस कारण वीवीपैट हैंग हो गई हो। वैसे चुनाव आयोग ने यह घोषणा कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में2019 के लोकसभा चुनावों में सभी जगह नए वीवीपैट मशीनें लगाई जाएंगी। इसके लिए कंपनी ने निर्माण आरंभ करदिया है।

जो भी हो इस तरह के हंगामे का कोई तार्किक और नैतिक कारण नजर नहीं आता है। हर चुनाव में ईवीएम का मामलाउठा दिया जाता है। यह बात अलग है कि जहां भाजपा हारी वहां बाद में विपक्षी दल और मीडिया में उनके समर्थक शांतहो जाते हैं। कर्नाटक चुनाव परिणाम के दौरान जब तक भाजपा बहुमत से आगे थी, हर चैनल पर भाजपा विरोधी पार्टियोंके प्रवक्ता ईवीएम को निशाना बनाने लगे। जैसे ही परिणाम पलटा, भाजपा बहुमत से पीछे हो गई उनका सुर बदलगया। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ईवीएम पर हंगामे का जवाब देते हुए कहा था कि अगर इसमें गड़बड़ी की जासकती तो आज हम सरकार में नहीं होते। यही सच है। वास्तव में ईवीएम को बदनाम करने और उसके माध्यम से चुनावआयोग को कठघरे में खड़ा करने वाली पार्टियां और नेता किसी का भला नहीं कर रहे। इनका पुरजोर विरोध होना चाहिए।हमारा चुनाव आयोग पूरी तरह निष्पक्ष एवं कुशल है तथा उसके मातहत मतदान के लिए उपयोग की जानी वाली ईवीएममशीनें बिल्कुल सुरक्षित। इसके साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ संभव ही नहीं। इसके विरुद्ध केवल अनैतिक दुष्प्रचार है।

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