रामराज्य रथयात्रा छह राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से होकर गुजरेगी और 41 दिनों का सफर तय कर रामनवमी के दिन तमिलनाडु के रामेश्वरम पहुंचेगी। रामेश्वरम से होती हुई यात्रा उसी दिन तिरुवनंतपुरम पहुंचेगी। यहां स्थित सुप्रसिद्ध पद्मनाभ मंदिर के सामने रामराज्य सम्मेलन के माध्यम से यात्रा से जुड़ी मांग को पूरी शिद्दत से बुलंद किया जाएगा।

याद आयी पुरानी रथ यात्रा

इस रथ यात्रा का वैसे तो भाजपा से कोई ताल्लुक नहीं है, लेकिन इसने 25 सितम्बर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी की गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक निकाली राम रथयात्रा की यादें ताजा कर दी हैं। उस वक्त रथ यात्रा का उद्देश्य विहिप के राम मन्दिर आन्दोलन का समर्थन करना था। यह यात्रा पूरे देश से होते हुए अयोध्या में समाप्त होनी थी, लेकिन बिहार के समस्तीपुर पहुंचने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के निर्देश पर आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया था। इस रथयात्रा की बदौलत भाजपा को न सिर्फ जनता के अपार समर्थन की वजह से राजनीतिक ताकत मिली बल्कि उसने सत्ता का स्वाद भी चखा। इसके साथ ही राम मन्दिर हमेशा के लिए उसके नाम से जुड़ गया। अब एक बार फिर रामराज्य रथयात्रा सड़कों पर है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब भाजपा विपक्ष में थी और आज कांग्रेस मुक्त भारत का लक्ष्य बनाते हुए आगे बढ़ रही है। ऐसे में आडवाणी की रथयात्रा की तरह क्या रामराज्य रथयात्रा का भी भाजपा को सियासी लाभ मिलेगा, इस पर चचार्एं होने लगी हैं।

मन्दिर निर्माण है उद्देश्य

रथ रवाना होने से पूर्व विहिप के धमार्चार्य सम्पर्क प्रमुख अशोक तिवारी ने पांच सूत्रीय संकल्प दिलाया। इसमें सर्वस्व न्योछावर कर रामजन्मभूमि पर भव्य मन्दिर का निर्माण, राष्ट्र गौरव में वृद्धि के प्रयास,प्राचीन धरोहर संरक्षित करने, प्रदूषण मुक्ति एवं देश की आध्यात्मिक विरासत संजोने की बात कही गई। श्रीरामदास मिशन यूनिवर्सल सोसाइटी की ओर से संयोजित रथयात्रा के पांच उद्देश्य हैं। इनमें रामराज्य की स्थापना, रामजन्मभूमि पर भव्य राम मन्दिर का निर्माण, रामायण को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कराना, रविवार की जगह गुरुवार को साप्ताहिक अवकाश और साल में एक दिन विश्व हिन्दू दिवस घोषित करना है।  सोसाइटी के महासचिव श्रीशक्ति शांतानंद कहते हैं कि वास्तव में लोग चाहते हैं कि देश में रामराज्य हो। अब सरकार सिर्फ राम भक्तों की ही बनेगी। दिल्ली में मोदी और यहां उत्तर प्रदेश में योगी हैं। अब समय बदल गया है। वह कहते हैं कि भगवान राम 14 साल बाद अयोध्या वापस आए थे। उसी तरह सरकार को 2019 तक 14 महीने के अन्दर अयोध्या में राम मन्दिर बनवा देना चाहिए।

राम नवमी तक निर्माण

वहीं चंपत राय के मुताबिक रामराज्य रथ यात्रा सामयिक कार्यक्रम है और पूरे देश में एक बार फिर बड़े पैमाने पर राम मन्दिर को लेकर जन जागरण होगा। वह उम्मीद जताते हुए कहते हैं कि अगली राम नवमी तक राम मन्दिर बनने लगेगा। उनके मुताबिक 1991 में भी भारत सरकार ने मामले को आपसी सुलह से सुलझाने के प्रयास शुरू किए थे, जिसमें मुस्लिम पक्ष के नेताओं ने कहा था कि यदि विवादित स्थल पर मस्जिद के चिन्ह साबित नहीं हुए तो वे अपना दावा छोड़ देंगे। चंपत राय ने कहते हैं कि हाई कोर्ट ने फैसला दे दिया कि वहां मस्जिद नहीं मन्दिर के ही पुरावशेष मिले हैं तो उन्हें अपना दावा छोड़ कर राम मन्दिर के सहयोग में आ जाना चाहिए। अब वह समय आ रहा है और तमाम मुस्लिम समुदाय के लोग राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में खुले आम खडे़ हो रहे हैं।

अयोध्या 28 साल बाद फिर चर्चा में है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में जहां मामले की अगली सुनवाई 14 मार्च को होगी, वहीं कारसेवकपुरम से रामराज्य रथयात्रा का आगाज हो चुका है। इसे विश्व हिन्दू परिषद के अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव चंपत राय ने ध्वज दिखा कर रवाना किया।

सुप्रीम कोर्ट सुनाए फैसला

विहिप के अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव मांग करते हैं कि राम मन्दिर के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट जल्द फैसला सुनाए और इस मामले को लटकाए नहीं। साथ ही यह भी कोर्ट देखे कि मन्दिर-मस्जिद के मुकदमें में राजनीतिक वकील केस न लड़ें क्योंकि वे इस मामले को लटकाए रखने का काम कर रहे हैं। चंपत राय के मुताबिक हम कभी झगड़ा नहीं करना चाहते। 1991 में भी कोई नुकसान अयोध्या में नहीं किया गया जबकि लाखों की भीड़ यहां जमा थी। हालांकि वह स्पष्ट करते हैं कि रामजन्मभूमि पर मन्दिर के आग्रह को किसी समुदाय के विरोध से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। देश की सुख-शांति और भाईचारा इसी में निहित है कि रामजन्मभूमि पर मन्दिर बने। उम्मीद है कि मुस्लिम भी हिन्दुओं की भावना को ध्यान में रखकर मन्दिर के समर्थन में खड़ा होगा। यदि राम के आदर्शों पर सारा समाज चले, तो वैसा समाज संभव है जैसा भगवान राम के समय था। वहीं विहिप अवध जोन के समन्वयक शरद शर्मा ने बताया कि हम रथ यात्रा का समर्थन कर रहे हैं लेकिन उसका हिस्सा नहीं है। यहां तक कि विहिप का बैनर भी रथ यात्रा के साथ नहीं होगा।

रथ राम मन्दिर की तरह

रामराज्य रथ यात्रा के लिए विशेष रथ तैयार किया गया है। लकड़ी से बने इस रथ में 28 घुमावदार खम्भे बनाए गए हैं। इसमें एक मन्दिर भी है। आयोजकों का कहना है कि रथ की जो आकृति है वह प्रस्तावित राम मन्दिर की तरह है। यात्रा के समापन के बाद संगठन के तिरुवनंतपुरम स्थित मुख्यालय में रथ को सुरक्षित रखा जाएगा। यहां से 2019 में रथ वापस अयोध्या भेजा जाएगा।

चुनावी राज्यों से गुजरेगी

देखा जाए तो यात्रा के दौरान मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे प्रदेश भी आयेंगे। इन दोनों ही राज्यों में चुनाव होने हैं। ऐसे में यात्रा के जरिए यहां सियासी माहौल गरमाने की रणनीति के भी आरोप लग रहे हैं। मध्य प्रदेश में शिवराज चौहन अभी तक अजेय बने हुए हैं। इस बार फिर उन पर भगुवा की जीत का दारोमदार है। वहीं कर्नाटक में पार्टी सत्ता में आना चाहती है। इसलिए रथयात्रा के पीछे सियासी वजह भी तलाशी जा रही हैं।

देखा जाए राम मन्दिर शब्द आते ही देश में हलचल मच जाती है। सभी इसे अपने-अपने नजरिये से देखते हैं। खासतौर से इसके पीछे सियासी वजह तलाशी जाती है। कारसेवकपुरम से निकली रामराज्य रथयात्रा की बात करें तो माना जा रहा है कि इसके जरिए हिन्दू संगठन और भगवा समर्थक एक बार फिर उत्तर से लेकर दक्षिण तक राम मन्दिर के मुद्दे पर माहौल बनाकर समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे। इसे भाजपा की पर्दे के पीछे से मिशन 2019 की तैयारियों से भी जोड़ा जा रहा है। कारसेवकपुरम में जिस तरह पार्टी सांसद लल्लू सिंह सहित अयोध्या से भाजपा मेयर ऋषिकेश उपाध्याय नजर आये उससे इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के त्रिपुरा होने की वजह से यात्रा को हरी झंडी नहीं दिखा पाने की चचार्यें थी। हालांकि इस रथयात्रा से भाजपा को कितना फायदा होता है यह तो अभी नहीं कहा जा सकता है, लेकिन जिस तरह से इस मुकदमें से जुड़े विषय लगातार सुर्खियों में है, उससे इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि चुनावी फिजा में भी इसकी गूंज सुनाई देगी।

तारीख रथयात्रा की जगह

15 फरवरी वाराणसी

16 फरवरी इलाहाबाद

16 फरवरी चित्रकूट

19 फरवरी भोपाल

20 फरवरी उज्जैन

21 फरवर  इंदौर

25 फरवरी औरंगाबाद

8 मार्च बेंगलुरू

10 मार्च मैसूर

13 मार्च कोझीकोड

21 माच रामेश्वरम

22 मार्च कन्याकुमारी

 

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