प्रियंका वाड्रा परदे के पीछे से पार्टी के महत्वपूर्ण मामलों में दखल देती रही हैं। मां और भाई के संसदीय क्षेत्रों में काम करती रही हैं। तब भी वह कांग्रेस के पतन को रोक नहीं पायी, तो उनके आधिकारिक रूप से राजनीति में आने से कौन सा फर्क पड़ेगा, यह देखना होगा।

राजनीति में टाइमिंग का बड़ा महत्व है। जैसे कि बंबइया फिल्मों में एक्शन हीरो की पर्दे पर एंट्री। कुछ धमाकेदार एक्शन के साथ। प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीति में आधिकारिक प्रवेश को कुछ इसी तरह से प्लान किया गया था। तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद और लोकसभा चुनाव से ठीक पहले। ताकि निराश होकर बिखर चुके पार्टी कार्यकर्ताओं को यह बताया जा सके कि लो भइया हम आ गए हैं और राहुल में जो कमी है, उसकी भरपाई कर देंगे। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना था कि अगर मोदी को घेरना है, तो यह समय सर्वोत्तम है।
यही सोच कर जनवरी में प्रियंका वाड्रा कांग्रेस पार्टी की महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी बना दी गयीं। मतलब यह कि सीधे-सीधे योगी और साथ में मोदी को चुनौती। यह संदेश देने की कोशिश की गई कि प्रियंका इन दोनों ही नेताओं से किसी मामले में कम नहीं हैं और वे उनकी आक्रामक राजनीति का जवाब उसी भाषा में देंगी। लेकिन महीने भर के अंदर ही यह साफ हो गया कि प्रियंका वाड्रा को लेकर लोगों में वह उत्साह नहीं है, जिसकी उम्मीद की गयी थी। बनारस के लोगों ने उनके लिए जिस तरह की उदासीनता दिखायी, वह काफी कुछ कह गया। दरअसल, हर उत्पाद का एक समय होता है, जिसके बाद उसकी उपयोगिता खत्म हो जाती है।


आप उसे बेचना तो चाहेंगे पर लोग एक्सपायरी डेट देखकर मना कर देंगे। ठीक उसी तरह हर नेता का एक समय होता है, जब लोग चाहते हैं कि अमुक व्यक्ति को आगे आना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके उदाहरण हैं। 2010 के बाद सोनिया गांधी की अगुवाई वाली मनमोहन सिंह की घोटाले से भरी लुंज-पुंज सरकार की जो हालत थी, उसमें लोगों ने महसूस किया कि अब इस देश को एक मजबूत नेता चाहिए। इसलिए 2014 के लोक सभा चुनाव में लोगों ने दो दशक से चली आ रही गठबंधन की सरकारों का अंत कर दिया और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बनी। वास्तव में प्रियंका 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद ही यह फैसला लेतीं, तो बेहतर होता। लेकिन तब उन्हें बाल-बच्चों को समय देना था। प्रियंका ने कभी ऐसा कहा नहीं, लेकिन संदेश साफ था कि राजनीति और देश सेवा उनकी प्राथमिकता नहीं है। इसका एक अर्थ यह भी है कि कांग्रेस पार्टी उनके घर की खेती है और वे जब चाहेंगी, जैसा चाहेंगी, वैसा कर लेंगी। ठीक है, पार्टी आपकी है लेकिन यह चलेगा तभी, जब जनता उसे स्वीकार करेगी।
और जनता तभी स्वीकार करेगी जब उसे आपकी आवश्यकता महसूस होगी। यानी कि आपके लिए ‘पॉलिटकल स्पेस’ होना चाहिए। वरना लाल कृष्ण आडवाणी, लालू और मुलायम का हाल देख लीजिए। इंसान तो छोडि़ए भगवान कृष्ण का प्रभाव भी महाभारत युद्ध के बाद जाता रहा। सच तो यह है कि प्रियंका ने जो समय चुना वह बहुतों के लिए समझ से बाहर है। उनके पति राबर्ट प्रवर्तन निदेषालय दौड़ रहे हैं, मां सोनिया गांधी और भाई राहुल अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। कुछ लोग जमीन खरीद में उनका नाम भी ले रहे हैं। ऐसे में 48 साल की हो चुकी प्रियंका कौन सा तीर मार लेंगी, क्योंकि परदे के पीछे से वह विगत दो दशक से पार्टी के महत्वपूर्ण मामलों में दखल देती रही हैं। मां और भाई के संसदीय क्षेत्रों में काम करती रही हैं। तब भी वह कांग्रेस के पतन को रोक नहीं पायीं। तो उनके अधिकारिक रूप से राजनीति में आने से कौन सा फर्क आ जाना है। अधिक से अधिक यह कि अगर कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में कुछ अधिक सीट मिलीं, तो वह प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार हो सकती हैं। लेकिन वह तो तब जब कांग्रेस उस स्थिति में आएगी। लेकिन वह होगा कैसे। पुलवामा के बाद तो वह होने से रहा।
खासकर पाकिस्तान पर हवाई हमले के बाद कांग्रेस ने जो रवैया अपनाया और अभी हाल ही में लोकसभा चुनाव के लिए जिस तरह का घोषणा पत्र जारी किया, उससे प्रियंका के आने की चर्चा हवा हो गयी है। यही कारण है कि उनको मंदिर जाकर लाल चुनरी में पूजा करते हुए फोटो खिंचवाना पड़ रहा है। साड़ी पहन कर लोगों के बीच जाकर बताना पड़ रहा है कि उनकी नाक दादी से मिलती है। रास्ता साफ भी हो तो वह उबड़-खाबड़ मेड़ पर चढ़ जाती हैं। आज समय बदल गया है। लोग किसी नेता या अभिनेता के पीछे उतना समय नहीं खपाते जितना इंटरनेट की दुनिया के आने से पहले के लोग माथापच्ची किया करते थे।
पहले के नेताओं का उदय जनआंदोलनों के जरिए होता था और लंबे संघर्ष के बाद उनको अपने या कुछ राज्यों के लोग जान पाते थे। आज की तरह सोशल मीडिया के माध्यम से लाखों जनता से सीधे संवाद का विकल्प नहीं था। लेकिन आज इंटरनेट है, जहां एक से एक प्रतिभावान लोग अपना हुनर दिखा रहे हैं। किसी तेज-तर्रार राजनेता को लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए किसी अखबार या न्यूज चैनल की आवश्यकता नहीं है। बस उसमें यह गुण होना चाहिए कि वह अपनी पार्टी के साथ चलना सीख ले। बेशक प्रियंका के साथ यह दिक्कत नहीं है, क्योंकि कांग्रेस गांधी परिवार के ईर्द-गिर्द ही चल सकती है।
लेकिन जनता को यह समझाना आसान नहीं है कि प्रियंका और राहुल भाजपा नेतृत्व से बेहतर हैं। वास्तविकता यह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह हर मामले में इन दोनों पर भारी पड़ते हैं। दुनिया कहां से कहां चली गयी और कांग्रेस अभी तक गरीबी हटाने में लगी है। तो अचानक से सब कुछ पलट देना असंभव है। हां, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्रियंका का यह अवतार कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम करेगा। इसमें कोई शक नहीं कि पार्टी के युवा नेताओं में उत्साह है और वे मानते हैं कि प्रियंका उत्तर प्रदेश में गेम चेंजर साबित होंगी। डॉ. एसपी राय के अनुसार इसका असल प्रभाव 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में दिखेगा।

जनता को यह समझाना आसान नहीं है कि प्रियंका और राहुल भाजपा नेतृत्व से बेहतर हैं। वास्तविकता यह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह हर मामले में इन दोनों पर भारी पड़ते हैं।

हो सकता है उनकी बात सच हो। लेकिन इसमें भी एक बाधा है और वह है उनका वाड्रा होना। उनके पति ने मनमोहन सिंह के राज में इतना कुछ किया है कि उसे अचानक से धो डालना संभव नहीं है। अभी उनको जनता के बीच घूमना पड़ेगा। पता नहीं उन्हें लोक सभा चुनाव लड़ने की सलाह किसने दी और वह भी बनारस से। कभी राहुल के साथ छाया की तरह रहने वाले कनिष्क ऐसी सलाह देंगे, यह हजम नहीं होता। अगर भाई लोगों ने अति उत्साह में यह मांग कर दी है तो ठीक है, वरना अति उत्साह कभी अच्छा नहीं होता।

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