लोकसभा चुनाव के पहले बीजेपी ने महाराष्ट्र के बाद तमि लनाडु में गठबंधन कर चुनावी गणित को साध लिया है। इससे दोनों राज्यों में बीजेपी को फायदा होना तय है।

लो कसभा चुनावों के लिए होने वाले राजनीतिक गठबंधनों की तस्वीर धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी है। कौन किसके साथ जाएगा और कौन किसके साथ नहीं जाएगा, इसे लेकर उहापोह की जो स्थिति थी वह अब बहुत हद तक समाप्त हो रही है। बीजेपी के महाराष्ट्र में शिवसेना और तमिलनाडु में अखिल भारतीय अन्ना द्रमुक के साथ चुनावी गठबंधन को अंतिम रूप दिए जाने के बाद इन दोनों ही राज्यों में आने वाले चुनावों को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है। महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी बहुत पहले ही साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं और तमिलनाडु में बीजेपी और एआईएडीएमके के साथ आने की घोषणा के अगले दिन ही राज्य के दूसरे राजनीतिक खेमें अर्थात डीएमके और कांग्रेस की तरफ से भी अगला लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ने की घोषणा कर दी गई।
महाराष्ट्र में बीजेपी 25 और शिवसेना 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि तमिलनाडु में एआईएडीएमके के साथ हुए गठबंधन के बाद बीजेपी को पांच लोकसभा सीटों पर अपनी दावेदारी पेश करने का अवसर मिलने जा रहा है। इसके अलावा पुडुचेरी की एक सीट के लिए होने वाले चुनाव में भी दोनों दल साथ होंगे और विधान सभा के 21 सीटों केउपचुनावों में भी। अन्नाद्रमुक के संयोजक और उपमुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम और केंद्रीय मंत्री एवं बीजेपी के वरिष्ठ नेता पीयूष गोयल ने इस गठबंधन की घोषणा की। गोयल तमिलनाडु के लिए बीजेपी के प्रभारी हैं। दोनों दलों के बीच दूसरे और अंतिम दौर की चर्चा के बाद यह घोषणा की गई। चर्चा में मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी भी शामिल थे। इससे पहले अन्ना द्रमुक ने पट्टाली मक्कल कत्ची (पीएमके) के साथ समझौता किया, जिसके तहत वेन्नियार की पार्टी को 40 में से सात सीटें दी गईं। केंद्र शासित क्षेत्र पुडुचेरी की सीट भी पीएमके के हिस्से में गई है।
उधर डीएमके के साथ हुए गठजोड़ के अंतर्गत कांग्रेस, तमिलनाडु और पुडुचेरी की 40 में से 10 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। निश्चित तौर पर महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का फिर साथ आना एक ऐसी घटना है जिसने साबित किया है कि राजनीतिक दल अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के उद्देश्य से एक दूसरे के समर्थन और विरोध में चाहे जितनी भी बयानबाजियां करें, चुनाव के मौके पर उन्हें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि उनका हित किस बात में है। जहां तक महाराष्ट्र की बात है तो शिवसेना को बहुत अच्छी तरह से इस बात का एहसास है कि उसके नेता नरेंद्र मोदी और बीजेपी के खिलाफ बयानबाजी चाहे जितनी भी करें लेकिन पार्टीं को अगर प्रदेश की राजनीति में प्रासंगिक बने रहना है तो बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है उसके पास। महाराष्ट्र में दो गठबंधन हैं।
एक में कांग्रेस और एनसीपी है जबकि दूसरे में बीजेपी और शिवसेना। फिलहाल देश और प्रदेश की जो राजनीति है उसमें शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के साथ नहीं आ सकती। उसी तरह तमाम आपसी विरोधों के बावजूद एनसीपी और कांग्रेस को एक दूसरे का हाथ थामना ही होगा। शिवसेना बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी है और दोनों की विचारधारा में जो समानता है उसके मद्देनजर उनके बीच का गठबंधन बहुत ही स्वाभाविक है। पिछले विधान सभा चुनाव और फिर लोकसभा उपचुनाव में अकेले मोर्चा संभालने के बाद शिवसेना अपना हश्र देख चुकी है और उसे इस बात का बखूबी एहसास है कि अगर बीजेपी और शिवसेना अलग-अलग चुनावी समर में उतरे तो उसका सीधा फायदा कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को होगा। यही कारण है कि अपने को ‘बड़ा भाई’ घोषित करने वाली शिवसेना को चुनावी गठजोड़ में बीजेपी से दो सीटें कम लेकर संतोष करना पड़ा है। हां, विधान सभा चुनावों में दोनों ही दल बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की मौजूदगी में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दोनों दलों के बीच बनी सहमति का खुलासा किया। फडणवीस ने कहा कि ‘‘शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी का 25 साल से गठबंधन है।
कुछ मुद्दों पर मतभेद हुए होंगे, पर सैद्धांतिक रूप से दोनों की विचारधारा में समानता है। इसलिए हम इतने सालों तक साथ रहे। विधानसभा चुनाव हम साथ नहीं लड़े लेकिन उसके बाद केंद्र और राज्य में हम साथ में सरकार चला रहे हैं।’’ मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि ‘नाणार प्रकल्प’ को लेकर शिवसेना की अपत्ति थी, हमने काम रोक रखा था। जहां के लोग परियोजना के लिए तैयार होंगे वहां ही परियोजना लागू की जाएगी। बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की घोषणा के समय मंच पर उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे की उपस्थिति के बाद इस चर्चा ने जोर पकड़ रखा है कि क्या आदित्य को शिवसेना की तरफ से अगले मुख्यमंत्री के तौर प्रचारित करने की तैयारी है? चर्चा यह भी है कि आदित्य ठाकरे माहिम से विधानसभा चुनाव भी लड़ने वाले हैं। हालांकि ठाकरे परिवार के किसी सदस्य ने अभी तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है और सरकार में भी शामिल नहीं हुआ है।
जहां तक बीजेपी और अन्ना द्रमुक के बीच हुए गठजोड़ की बात है तो यह पहले से ही लगभग तय था। अन्नाद्रमुक भले ही एनडीए का अंग नहीं रही हो लेकिन हर मौके पर संसद में वह एनडीए के साथ खड़ी रही है। सवाल बस सुपर स्टार रजनीकांत को लेकर था क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद करीब माना जाता है और इस बात को लेकर अटकलें जारी थीं कि क्या लोकसभा चुनाव में रजनीकांत की पार्टी बीजेपी के समर्थन में उतरेगी? लेकिन रजनीकांत ने लोकसभा चुनावों में किसी भी दल या गठबंधन को समर्थन नहीं देने की घोषणा की है और उनकी पार्टी का सारा ध्यान 2021 के विधानसभा चुनाव पर है। जहां तक डीएमके और कांग्रेस के गठजोड़ की बात है तो इसपर सहमति कायम करने में डीएमके की राज्यसभा सांसद और करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वैसे इन दोनों दलों के बीच गठबंधन लगभग तय ही था क्योंकि डीएमके प्रमुख स्टालिन विपक्ष के पहले प्रमुख नेता थे जिन्होंने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की वकालत की थी। खुद डीएमके 20 से 25 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी और बची हुई सीटें अन्य सहयोगी दलों को दी जाएगी। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सुपर स्टार कमल हासन इस गठबंधन के साथ आएंगे या अपनी अलग डफली बजाएंगे। तमिलनाडु में उनका समर्थन भी मायने रखता है। उन्होंने बड़े हंगामें के साथ अपना राजनीतिक दल बनाने की घोषणा की थी लेकिन उसके बाद वैसा जोश नहीं दिखाई दिया। फिलहाल तो मुख्य मुकाबला अन्ना द्रमुक और द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच ही नजर आ रहा है।

शिवसेना बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी है। दोनों की विचारधारा में जो समानता है उसके मद्देनजर उनके बीच का गठबंधन बहुत ही स्वाभाविक है।

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