को लकाता में पिछले दिनों मोदी विरोधियों का जुटान था। उसे यूनाइटेड इंडिया रैली का नामदिया गया था। तो एकता दिखाने क्षेत्रीय क्षत्रप पहुंच गए। उन क्षत्रपों में अरूण शौरी, यशवंतसिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा भी शामिल थे। इनकी राजनीतिक हैसियत तो कुछ है नहीं, पर ठसक अभी बाकी है। वही ठसक कोलकाता लेगई। वहां खूब जहर उगला। हालांकि यह नई बात नहीं थी। इधर कई सालों से इन लोगों नेसरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इनकेनिशाने पर नरेन्द्र मोदी और अरूण जेटली है। नरेन्द्र मोदी तो इसलिए निशाने पर आए क्योंकि अरूण जेटली को ये लोगों पसंद नहीं करते।इसके विपरीत जेटली को प्रधानमंत्री का बेहदकरीबी माना जाता है। यह बात इन लोगों कोखासा खटक रही है। पर करें क्या? तो रास्ता सरकार को घेरने का निकाला। पार्टी की दया से इनका कद तो इतना बड़ा है ही कि लोग इनकी  बात सुनते हैं। उस पर अमल कितना करते हैं,यह बहस का मुद्दा हो सकता है। पर इतना तोतय है कि इन बूढ़े सियासी शेरों की बात सुनीजाती है। यह इनको भी पता है। इसलिए खुन्नस निकाल रहे हैं। इन दिनों राफेल की सवारी कररहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका इनकी भीथी। सीबीआई में गए ही थे।

कोई मंत्री पद न मिलने से खपा है तो किसी की नाराजगी इसलिए है कि उसे ब्रिक्स बैंक में नहीं भेजा गया। इसलिए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

वहां से इनका पुराना  नाता है। कुछ के पीछे तो सीबीआई लगी ही है। अरूण शौरी तो इसीलिए बागी हुए है। कहाजाता है कि एक जमाने में वह नरेन्द्र मोदी के मित्र हुआ करते थे। यह मित्रता 90 के दशकसे है। जब नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री बने तो गुजरात मॉडल को मीडिया तक शौरी ने पहुंचाया। उनके ही प्रयास से वह मीडिया की सुर्खियां बना। चारों तरफ उस विकास की चर्चा होने लगी। वह एक ऐसा दौर था , जब शौरी गुजरात में ज्यादा देखे जाते थे। चर्चा तो यह भी है कि 2009 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के लिए शौरी ने ही बात चलाई थी। तो सवाल यह है कि जिस व्यक्ति को अरूण शौरी बतौर प्रधानमंत्री देखना चाहते थे, आज उसके खिलाफ क्यों हो गए है? माना जाता है कि इसकी वजह जेटलीहैं। शौरी उन्हें पसंद नहीं करते। चाहते हैं कि प्रधानमंत्री भी उनसे दूरी बनाए रखे। लेकिन यह हुआ नहीं। वे तो काबिलियत को तरजीह देतेहैं। अरूण जेटली का उसमें कोई सानी नहीं है। इसलिए प्रधानमंत्री उनकी बात सुनते हैं। यह अरूण शौरी को सुहाया नहीं। पर बात तब ज्यादा बिगड़ गई, जब सीबीआई, आईटीडीसी होटलके विनिवेश की जांच करने लगी। होटल समेतकई सरकारी कंपनियों का विनिवेश अरूण शौरीके नेतृत्व में हुआ था। यह बात एनडीए-1 कीहै। तब शौरी विनिवेश मंत्री हुआ करते थे। इनकी सरपस्ती में विनिवेश की आंधी चली थी। उसेलेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी पड़ी। डालने वाले उनके मित्र प्रशांत भूषण हैं, जिनके साथ आजकल वे राफेल उड़ा रहे हैं। वहीं मित्र विनिवेश हुए सार्वजनिक उद्यमों की जांच करानाचाहते हैं। उन्हें लगता है कि विनिवेश में हेराफेरी हुई है। सीबीआई उसकी सच्चाई सामने लानाचाहती है। इसलिए वह जांच कर रही है। जाहिर है बतौर विनिवेश मंत्री जांच की आंच उन तकपहुंचेगी। इससे शौरी वाकिफ हैं। उन्हें लगता है कि जांच अरूण जेटली की वजह से हो रही है।इस बाबत उन्होंने सितंबर 2014 में एक लंबालेख लिखा था जो इंडियन एक्सप्रेस में छपा था। वे लिखते हैं कि आज जिनके पास विनिवेश मंत्रालय है, वे तब भी बतौर सदस्य मंत्रालय का हिस्सा थे। कानून मंत्री होने की वजह से उन्होंने ही विनिवेश के कानूनी पहलू पर सलाह दी थी। उनकी सहमति के बाद बाद ही होटल का विनिवेश हुआ था। जाहिर है, वे जांच के लिए जेटली को जिम्मेदार मान रहे हैं। पर यह माननेके लिए तैयार नहीं है कि जो बोया था, वही काट रहे हैं। इसलिए अपनी ही सरकार के खिलाफ हो गए है और तथाकथित लोकतंत्र बचाने मेंलगे हैं। इनसे अलग कहानी यशवंत सिन्हा की नहीं है। उन्हें पार्टी ने पाला-पोसा। उनकी तमाम हेराफेरी पर पर्दा ड़ाला। जरूरत पड़ी तो वंशवाद का आरोप भी झेला। उनके घर के चिराग को मंत्री बनाया। वह भी पहली बार सांसद बनने पर। उसे बतौर मंत्री प्रशासन का ककहरा अरूण जेटली ने सिखाया। फिर भी यशवंत सिन्हा सरकार से नाराज हैं। एक वजह तो जेटली है,पर दूसरी वजह उससे भी बड़ी है। चर्चा है कि यशवंत सिंहा ब्रिक्स बैंक के चेयरमैन बनना चाहते थे। सरकार ने घास नहीं डाली तो बागी होगए। कहा जाता है कि शत्रुघ्न सिन्हा के बगावतकी वजह भी पद है। 2014 का चुनाव जीतनेके बाद शॉटगन ने मंत्री बनने के सपने सजाए। पर उन सपनों को पंख नहीं लगे। उन्हें मंत्री नहींबनाया गया। इससे उनका सिनेमाई दिल टूट गया।तो बिहारी बाबू भी यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी के साथ हो लिए। तीनों मिलकर लोकतंत्र बचाने की मुहिम में लगे हैं। इस बचाव अभियानमें सहारा विपक्ष का मिला है। उसमें ममता दीदी भी हैं। वही दीदी जो डंडे के जोर पर प.बंगाल में लोकतंत्र बचा रही हैं। शायद सही तरीका यही हो या फिर फारूख अब्दुला वाला हो। उनकी पार्टी तो चुनाव लड़ने से ही डर गई थी। इसलिए जम्मू-कश्मीर में उसने पंचायत चुनाव का बहिष्कार किया। संभव है, यह लोकतंत्र बचाने की नई तरकीब हो। जो विपक्ष के इन मठाधीशों के ही पास है। यही सीखने तीनों कोलकाता गए थे। हालांकि इन्हें सीखने-पढ़ने की जरूरत नहीं है। ये लोग चतुर खिलाड़ी हैं। पर समस्या यह है कि इनकी चतुराई बस लुटियन तक सीमित है। उससे तो बात बनेगी नहीं। इनकी इच्छा तो सरकार बदलने की है, जो इनके बस का है नहीं। उसके लिए तो जनाधार चाहिए। वह किसी के पास नहीं है। वही जुटाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। उनका भी दरवाजा खटखटा रहे हैं, जिनके विरोध में राजनीति करना शुरू की थी। हद तब हो गई, जब कांग्रेसी एजेंडा चलाने लगे।वही कांग्रेस, जिसके खिलाफ कभी कलम चलाई थी। मौजूदा दौर में उसके पक्ष में खड़े हैं। उसके राजनीतिक एजेंडे को धार दे रहे हैं। यह सब इसलिए कर रहे हैं क्योंकि सत्ता में उन्हें हिस्सेदारी नहीं मिली। उसी की खीझबाहर निकल रही है। यही वजह है जिनकी कोई साख नहीं है, वे प्रधानमंत्री की साखपर सवाल खड़ा रहे हैं। वह भी तब जबकि उनकी राजनीति को सुप्रीम कोर्ट ने धराशाई करदिया। बावजूद इसके तीनों गाल बजा रहे हैं। शायद इसलिए अरूण जेटली इन राजनेताओं को कैरियर नेशनलिस्ट कहते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here