तीन राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणामों के आने के बाद से स्वाभाविक तौर पर कांग्रेस नेतृत्व और पार्टी कार्यकर्ता उत्साह में हैं। इसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है।

ये ठीक है कि तीन विधान सभा चुनावों के परिणाम कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य राजनीतिक ताकतों के लिए संजीवनी की तरह हैं लेकिन इसके आधार पर यह मान लेना कि लोकसभा चुनाव में भी इसी तरह के परिणाम आएंगे निश्चित तौर पर जल्दबाजी होगी।

जो पार्टी 2013 से कुछ अपवादों को छोड़कर लगातार ही पराजय का सामना कर रही हो उसे अगर देश के हिंदी क्षेत्र के तीन प्रमुख राज्यों की सत्ता में वापसी का मौका मिला है तो निश्चित तौर पर यह उसका राजनीतिक ग्राफ के बढ़ने का संकेत है। अब कम से कम कुछ दिनों के लिए ही सही कांग्रेस मुक्त भारत का नारा सुनाई नहीं देने वाला है। उधर इस जीत के बाद कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी के प्रति मीडिया का रवैया भी बदला है और अब यह तो माना ही जाने लगा है कि कांग्रेस लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को कड़ी टक्कर दे सकती है। इसके अलावा क्षेत्रीय दलों का रवैया भी बदला है। जिस तरह से कांग्रेस को कुछ नए सहयोगी मिले हैं और इसी क्रम में मायावती और अखिलेश यादव ने मध्य प्रदेश में बिना मांगे कांग्रेस को समर्थन दिया वह कांग्रेस के बढ़ते हुए ग्राफ का ही संकेत है। दूसरी तरफ पिछले लगभग पांच सालों से खामोश रहे भाजपा के सहयोगी दल जिस तरह से भाजपा पर अपने बयानों के माध्यम से दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वह भी देश की नयी राजनीतिक स्थिति को बयान करता हुआ प्रतीत हो रहा है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या लोकसभा चुनावों में एक बार फिर से कांग्रेस की वापसी होने जा रही है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर लोकसभा चुनाव संपन्न होने तक बहस जारी रहेगी। ये ठीक है कि तीन विधान सभा चुनावों के परिणाम कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य राजनीतिक ताकतों के लिए संजीवनी की तरह हैं लेकिन इसके आधार पर यह मान लेना कि लोकसभा चुनावों में भी इसी तरह के परिणाम आएंगे निश्चित तौर पर जल्दबाजी होगी। विशेष तौर पर तब, जब मुकाबले पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे राजनेता हों। ऐसा माना जा रहा है कि इन तीन राज्यों में भाजपा की हार की वजह एंटी इंकंबेंसी, किसानों और युवाओं की नाराजगी और कुछ हद तक भाजपा नेतृत्व का कांग्रेस की चुनौतियों को हल्के में लेना रही है। ये ठीक है कि अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा को सत्ताधारी दल होने की वजह से जनता के प्रश्नों का सामना करना होगा और केवल कांग्रेस की आलोचना करने से ही काम नहीं चलेगा क्योंकि लोग तो कांग्रेस को उसकी तमाम गलतियों के लिए 2014 में ही भरपूर सजा दे चुके हैं। जाहिर है लोकसभा चुनाव केवल कांग्रेस विरोध के नाम पर नहीं लड़े जा सकते और भाजपा को ऐसा करने की जरूरत भी नहीं है। देश भर में लगातार जो सर्वेक्षण हुए हैं उनमें से सभी में यह माना गया है कि आज भी नरेंद्र मोदी ही देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं और इस रेस में राहुल गांधी अभी बहुत पीछे हैं। स्वाभाविक तौर पर भाजपा अगला चुनाव भी नरेंद्र मोदी और उनके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के नाम पर लड़ सकती है। बेशक एंटी इंकंबेंसी फैक्टर यहां भी होगा मगर इतना नहीं कि कोई और नाम नरेंद्र मोदी पर भारी पड़ जाए। तीन राज्यों के विधान सभा चुनावों में भाजपा की हार का एक बहुत बड़ा कारण किसानों का असंतोष रहा है। एनडीए सरकार ने हालांकि किसानों के लिए बहुत सारी योजनाएं लागू की हैं लेकिन ऐसा लगता है कि जमीनी तौर पर किसानों तक उनका फायदा नहीं पहुंचा है। यह एक सच्चाई है कि किसानों की अनदेखी कर के इस देश में राजनीति नहीं की जा सकती। चुनाव परिणाम आने के बाद कई राज्यों की भाजपा सरकारों ने जिस तरह से किसानों से संबंधित योजनाओं की घोषणा की है उससे ही इस बात के संकेत मिलने शुरू हो गए थे कि भाजपा नेतृत्व इस सवाल पर कांग्रेस की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री ने 27 दिसंबर को जिस तरह से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, वित्त मंत्री अरुण जेटली और कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के साथ बैठक की उससे इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि केंद्र सरकार किसानों के लिए कुछ ऐसा करने जा रही है जिसका किसानों को तात्कालिक फायदा नजर आए। इसके अलावा केंद्र सरकार के पास अभी कुछ महीने का समय है जिसमें वह नाराज लोगों को मनाने का प्रयास कर सकती है। तीन तलाक मामले को लोकसभा से पारित कर केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है, जिससे भाजपा विरोधी दलों के परंपरागत वोट बैंक में सेंध तो लग ही गई है। कांग्रेस के पास राफेल का एक बड़ा मुद्दा था। जिसकी हवा सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने निकाल दी है। अब जो भी शोर-शराबा हो इस मुद्दे में वैसी जान नहीं रह गई है जैसी तीन राज्यों के विधान सभा चुनावों के समय थी। उसी तरह केंद्र सरकार की नई घोषणाओं के बाद जीएसटी भी कोई मुद्दा रह पाएगा इस बात की बहुत कम संभावना नजर आती है। अगर केंद्र सरकार किसानों के लिए किसी बड़ी योजना का आरंभ कर के किसानों की नाराजगी कम करने में सफल होती है तो एक बार फिर से कांग्रेस के पास उन मुद्दों का अकाल हो जाएगा जिनके सहारे वह लोकसभा चुनावों में भाजपा सरकार के खिलाफ अभियान चला सके। उत्तर प्रदेश में जिस तरह से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस को अलग- थलग करने का निर्णय लिया है वह भी कांग्रेस नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है क्योंकि उत्तर प्रदेश के इन दोनों दलों के बगैर भविष्य का कोई भी महागठबंधन सफल नहीं हो सकता। उधर तेलांगना विधान सभा चुनावों के बाद अब केसीआर भी कांग्रेस के लिए सिरदर्द बनने जा रहे हैं। वे गैर-भाजपाई और गैर-कांग्रेसी दलों के बीच एक बार फिर से तीसरे मोर्चे का सपना जगाने का प्रयास कर रहे हैं। यहां यह बात याद रखनी होगी कि देश के जो अधिकतर क्षेत्रीय दल हैं मूलत: उनका जन्म कांग्रेस विरोध के नाम पर ही हुआ है। हां, डीएमके प्रमुख स्टालिन के इस बयान ने कांग्रेस को जरूर ताकत दी है कि राहुल गांधी को ही अगले लोकसभा चुनावों में साझा विपक्ष की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होना चाहिए। वैसे अधिकतर विपक्षी दलों ने इस सवाल पर चुप रहना ही बेहतर समझा और खुद कांग्रेस भी फिलहाल इस सवाल से उलझना नहीं चाहती। तमाम हालात इस बात के संकेत दे रहे हैं कि तीन राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस भले ही मुकाबले में आ गई हो लेकिन यह कहना अभी भी जल्दबाजी होगी कि वह लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र की सत्ता में वापस आ सकती है। अभी तो दिल्ली दूर बहुत दूर नजर आती है।

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