4अक्टूबर 2017 को अलीगंज (लखनऊ) में 75 साल की बुजुर्ग औरत ने पुलिस में आरोप दर्ज कराया कि कि उसके चार बेट-बहू में से कोई भी उसे रखने को तैयार नहीं। 12 अक्टूबर 2017 को इंदौर के समंदर सिंह ने आरोप दर्ज कराया कि उनकी पत्नी, बहू, बेटे और परिजनों ने उन्हें मृत घोषित कर 10 बीघा जमीन हड़प ली। ऐसी ही एक कहानी जयपुर के मनमोहन कपूर की भी है, जिनके बेटे ने पूरी जायदाद अपने कब्जे में लेकर उन्हें बेघर कर दिया। हाल में राजकोट में हुई एक घटना जिसमें एक बेटे ने अपनी ही बूढ़ी मां को छत से गिरा कर मार डाला। कहानियां कई हैं लेकिन एक चीज सामान्य है- जीवन की संध्या में अपनों से धोखा और जीवन के प्रति उदासी।

इन सब घटनाओं को सुनकर ऐसा लगता है कि संतान को बुढ़ापे की लाठी कहा जाता है, वह लाठी सहारा देने के बजाय जुल्म ढाने लगती हैं। मातृ देवो भव् , पितृ देवो भव् ऐसे संस्कारों वाले देश में ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। क्या हमारी शिक्षा हमें यह सिखाती है कि बीमार मां-बाप, दादा-दादी की सेवा की बजाय उन्हें नौकरों की देखरेख में छोड़ दिया जाए। स्रेह रखने की बजाय उन्हें अपने से दूर कर दिया जाए। आज हम अपनी उस भारतीय संस्कृति, संस्कार व परम्पराओं को भूलते जा रहे हैं जिसमें मां-बाप व गुरु को ईश्वर का दर्जा दिया गया है। शायद हम विस्तृत नहीं, संकुचित होते जा रहे हैं। पहले बुजुर्गों को घर का मार्गदर्शक समझा जाता था। पर आज की विंडबना है कि ये मार्गदर्शक आज बोझ समझे जाने लगे हैं।

देश में बुजुर्ग आबादी दिनों-दिन बढ़ रही है। इस बीच हम अपने संस्कार भूलते हुए बुजुर्गों को उपेक्षित कर रहे हैं। इससे परिवार का न केवल ढांचा बिगड़ रहा है, बल्कि समाज के अंदर कई तरह की विषमताएं नजर आ रही हैं।

एक बेहतर व संतुलित समाज के निर्माण के लिए बुजुर्गों को साथ लेकर चलना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। समाज को सुसंस्कृत करने में बुजुर्गों की भूमिका अहम होती है। बच्चों व युवाओं को जो संस्कार बुजुर्गों से मिल सकते हैं, वह कहीं और से नहीं। बुजुर्ग की स्थिति उस सघन वट वृक्ष की की तरह होती है जिसके प्यार, स्रेह व अपनत्व की छाया में समूचा परिवार सुखी, संतुष्ट व निश्चिन्त रहता है। बुजुर्गो के पास अनुभव का अथाह खजाना होता है। एक दिलचस्प वाकया है। एक बार एक फैक्ट्री में एक इंजन खराब हो गया। बहुत सारे युवा उसे ठीक करने की कोशिश कर रहे, पर 10 दिन तक कुछ नहीं हुआ। फैक्ट्री को हर दिन लाखों रुपये का नुकसान हो रहा था, तभी वहां एक बुजुर्ग आए जो किसी समय में वहां नौकरी करते थे। जैसे ही ये बात उन बुजुर्ग को पता चली तो उन्होंने इंजन को देखा और बस एक ही हथौड़ा मारा कि इंजन चालू हो गया। ये कमाल उनके अनुभव का था। अगर हम अपनी समस्याओं का समाधान अपने बुजुर्गों से पूछें तो पाएंगे कि उनके पास एक ही समस्या के कई समाधान होते हैं।

कहते हैं कि जिस घर में बुजुर्ग नहीं है, वह घर-घर नहीं रहता है। वे घर के रखवाले होते हैं। युवा व्यक्ति जोशीला होता है। उसमें जोश होता है, पर होश नहीं। घर का बुजुर्ग युवा के जोश को थामने व होश देने का काम करता है। नया व्यक्ति नई दिशा का, नई टेक्नॉलॉजी व विचारों का होता है। वह जो करना चाहता है, उसके लिए जल्दबाजी भी करता है। ऐसे में कई बार दिशा भी भटक सकता है। एक समय था जब हमारा बचपन दादा-दादी, नाना-नानी की कहानियों में गुजरता था। साथ में संस्कारों का बीजारोपण भी सहज ही हो जाता था। जब आज के बच्चे धर्म-कर्म व संस्कार भूल रहे हैं, तब हमारे बुजुर्ग हमें संस्कार की शिक्षा दे सकते हैं। हमें अच्छे-बुरे का अहसास करा सकते हैं। घर, परिवार, समाज को जोड़कर सामाजिक, नैतिक, सांप्रदायिक एकता व भाईचारे की स्थापना कर सकते हैं।  एक बार किसी ने गुलजार साहब से पूछा कि ‘उम्र’ और ‘जिन्दगी’ में क्या फर्क है? उन्होंने बेहद खूबसूरत जवाब दिया, जो अपनो के बिना बीती, वो ‘उम्र’ और जो अपनो के साथ बीती वो ‘जिन्दगी’। हमारे बुजुर्ग आज इसी पीड़ा से गुजर रहे हैं। एक जमाना था जब घर के बुजुर्ग सदस्य मान-सम्मान, परवाह, प्यार से नवाजे जाते थे, लेकिन आज की युवा पीढ़ी इस परंपरा को निभाने में उदासीन नजर आती है। पहले घर में एक साथ भोजन करना, बातें करना, साथ बैठना, प्यार और सामंजस्य देखने को मिलता था। आजकल के घर ‘मकानों’ में तब्दील हो चुके हैं। कई बार भरा-पूरा परिवार तो होता है, पर बहुत सारे रिश्तों के बीच बुजुर्ग अपना अस्तित्व टटोलता रह जाता है। कई इच्छाएं मन में ही रह जाती हैं, कई शब्द मौन ही रह जाते हैं।

भले ही आज दुनिया के सर्वाधिक युवा राष्ट्र का तमगा हमारे इतराने व गौरवान्वित होने का सबब बना हुआ हो, लेकिन चौंकाने वाला तथ्य यह है कि आजादी के 71 वर्ष पूरे करने के साथ ही हमारा देश तेजी से बूढ़ा होता जा रहा है। इस बाबत बीते दिनों संसद में आधिकारिक जानकारी देते हुए बाकायकदा आंकड़े भी पेश किये गये। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश की पूरी जनसंख्या के मुकाबले बुजुर्गों की जनसंख्या कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक 60 वर्ष की उम्र वालों की जनसंख्या बढ़कर 34 करोड़ के करीब हो जाएगी। चेतावनीपरक यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्तमान भारत में 42 प्रतिशत बुजुर्ग (60 साल से ऊपर) आज भी अपना भरण पोषण करने के लिए काम कर रहे हैं। इनमें 5 प्रतिशत ऐसे बुजुर्ग हैं, जिनकी आय देश की औसत आय के आधी से भी कम है। हालांकि केंद्र सरकार द्वारा 1999 से बुजुर्गों के लिए राष्ट्रीय वृद्धजन नीति संचालित की जा रही है। बुजुर्गों को उनके अधिकारों से बेदखली के मामलों की रोकथाम के लिए वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम 2007 भी लागू है। इसी क्रम में बुजुर्गों की सहूलियतों के लिए 2016 में स्थापित वरिष्ठ नागरिक कल्याण निधि केंद्र सरकार की एक नयी योजना है जिसके तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले बुजुर्गों को चिकित्सा सुविधा का प्रावधान है। इसी तरह स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम और ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना जैसे कार्यक्रम भी सरकार द्वारा कार्यान्वित किये जा रहे हैं; मगर हैरानी की बात यह है कि देश के 40 प्रतिशत बुजुर्ग को सरकार की ओर से चलाई जा रही इन योजनाओं की जानकारी व इनके लाभों से वंचित हैं। बुजुर्ग नागरिकों की सेहत के बारे में हुए राष्ट्रव्यापी शोध अध्ययन बताते हैं कि दिल की बीमारी गांव की अपेक्षा शहर के बुजुर्गों में अधिक है। शोध के अनुसार बुजुर्ग पुरुषों में यूरेनरी की समस्या अधिक है जबकि महिला बुजुर्गों में ज्वाइंट्स की समस्या अधिक है। 60-64 वर्ष के वर्ग स्त्री-पुर्स्षों में 76 फीसदी शादीशुदा हैं, जबकि 22 फीसदी अकेले रह गये हैं जबकि दो फीसदी ऐसे भी हैं, जिन्होंने या विवाह नहीं किया या वे तलाकशुदा हैं। ऐसे में बुजुर्गों के बीच अकेलापन की समस्या बढ़ती जा रही है। वृद्धाश्रम और शरणस्थल इस समस्या का सार्वभौमिक हल नहीं हो सकते। इस दिशा में एक व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत है।

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