मांके पेट से कोई सीख कर नहीं आता’ अकसर यह कहावत सुनने को मिल जाती है। बस अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ही इस कहावत के अपवाद हैं। अभिमन्यु अपनी मां के गर्भ में ही चक्रव्यूह भेदना सीख गए थे। महाभारत काल की इस प्रचलित कथा को अगर छोड़ दें, तो अन्य ऐसी कोई कहानी नहीं है जिसमें हमने सुना हो कि शिशु मां के गर्भ से ही कुछ सीख कर आता है। मां के गर्भ में रहते हुए ही शिशु का कुछ सीख लेना कितना अकल्पनीय सा लगता है। लेकिन यह अकल्पनीय काम भी अब मुमकिन है। अब वैज्ञानिक के एक शोध के जरिए गर्भ में ही बच्चों को बहुत कुछ सिखाने का सपना साकार करने जा रहे हैं।

बच्चों में अच्छे संस्कार पैदा होने के बाद से ही नहीं, जन्म से पहले ही डाले जा सकते हैं। इस बात की ट्रेनिंग गर्भवती महिलाओं को दी जा सकती है। क्या ऐसा संभव हो सकता है?

गर्भ में ही बच्चों को स्मार्ट बनाने की यह विधा उन सभी माता-पिताओं के लिए कारगर साबित हो सकती है, जो बचपन से ही अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर, पायलेट आदि बनाने का सपना देखते हैं। फेडरेशन आॅफ आब्स्टेट्रिक एंड गाइनाकोलॉजी सोसायटीज आॅफ इंडिया (एफओजीएसआई) के विशेषज्ञों ने ‘अद्भुत मातृत्व’ पर शोध कर, यह बताया कि गर्भ में ही बच्चों को अच्छे संस्कार दिए जा सकते हैं। इसलिए अब यह संस्था माताओं को प्रशिक्षण देकर अपने बच्चे को जैसा चाहे वैसा बना सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भ में बच्चे 3 महीने के होने के बाद से ही जानने समझने लगते हैं। यही कारण है कि उन्हें अपने मन मुताबिक संस्कार दिये जा सकते हैं। बच्चे का मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक विकास गर्भ में ही शुरू हो जाता है। कई बार ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं, जब मांएं यह महसूस करती हैं कि गर्भ में शिशु ने उनकी बात सुनी और समझी भी। आजकल मांएं इस विधा को सीखने में काफी रुचि दिखा रही हैं। जगह-जगह डॉक्टरों, काउंसलरों द्वारा माताओं को तरीके सिखाए जा रहे हैं जिससे गर्भ में बच्चे का संपूर्ण विकास किया जा सके। वैसे तो गर्भवतियों को धार्मिक ग्रंथ इत्यादि पढ़ने के लिए कहा जाता रहा है। लेकिन ऐसा कोई जरूरी नहीं है कि धार्मिक बातों से ही बच्चे को संस्कार मिलें। गर्भवती को यह सलाह दी जाती है कि वह अपनी रुचि के हिसाब से कोई काम करे। वह संगीत सुन सकती हैं, कहानियां पढ़ सकती हैं या अच्छे टीवी सीरियल देख सकती हैं। नकारात्मक धारावाहिकों से उन्हें दूर रहने की सलाह दी जाती है। गर्भावस्था के दौरान वे खुद को जहां केंद्रित करती हैं, बच्चे का रुझान उसी ओर हो जाता है। विशेषज्ञ माताओं को गर्भ में पल रहे अपने बच्चे से बात करना भी सिखाते हैं। इसके लिए उन्हें शांत जगह का चुनने को कहा जाता है। ऐसी जगह में मां अपने पेट पर हाथ रखकर बच्चे को महसूस कर सकती है और बात भी कर सकती है।

मनोविज्ञान विशेषज्ञ व परामर्शदाता हरलीन कौर बताती हैं कि मां के साथ घटित हो रही हर चीज का प्रभाव गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ता है। गर्भवती महिला की अच्छी नींद (कम से कम 8 घंटे) लेना जरूरी है। साथ ही होने वाले बच्चे को किसी भी संभावित बीमारी (खास कर की मनोवैज्ञनिक) से बचाने के लिए पहले से तैयारी कर सकते हैं। जिस तरह गर्भधारण करने से पहले महिला के अंदर पोषक तत्वों की जांच की जाती है, उसी प्रकार दंपति को मनोवैज्ञानिक परामर्श भी लेना चाहिए। शिशु के शारीरिक विकास के लिए मां के खाने-पीने का खयाल रखना ही काफी नहीं है। बच्चे के मानसिक व भावनात्मक विकास के लिए गर्भवती को सकारात्मक माहौल में रखना जरूरी है।  इस अद्भुत विधा का तेजी से प्रसार हो रहा है। अपने बच्चे को स्मार्ट बनाने के लिए दंपति काफी उत्सुक हैं। इस विधा और शोध को देखने और समझने पर प्रतीत होता है कि वह दिन दूर नहीं जब कलियुग में भी अभिमन्यु पैदा हो सकेंगे। मां के गर्भ से ही वे अपने भविष्य के लिए तैयार होकर आएंगे।

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