सावन का महीना शुरू होते ही हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयघोष चहुंओर सुनायी पड़ने लगते हैं और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना की वाहक कांवड़ यात्राएं गुरू पूर्णिमा के बाद देश के प्रमुख शिव तीर्थ के लिए आरंभ हो जाती हैं। चूंकि सावन के पहले पखवाड़े में त्रयोदशी के दिन भगवान शंकर का जलाभिषेक होता है; इसलिए श्रद्धालु अपनी सहूलियत के अनुसार यह यात्रा इस तरह शुरू करते हैं ताकि निश्चित तिथि तक अपने इष्ट मंदिर में पहुंच जाएं। कांवड़ यात्रा भगवान शिव की आराधना का एक शास्त्रीय रूप है। इन कांवड़ों को पूरी श्रद्धा से अपने कंधों पर धारण करने वाले शिवभक्त कांवड़िये केसरिया यानी गेरुआ रंग के वस्त्र ही धारण करते हैं। हर-हर, बम-बम के जयकार करता शिवभक्तों का यह स्वत: स्फूर्त जनसमूह राष्ट्र की सामाजिक समरसता का ऐसा अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है जिसमें गरीब-अमीर, अगड़े-पिछड़े, छोटे-बड़े सब एकरस हो उठते हैं। कांवड़ को कंधे पर उठाते ही राग-द्वेष, ऊंच-नीच, भाषा-क्षेत्र, अमीर-गरीब और स्त्री-पुरुष, के सारे भेद मिट जाते हैं।

हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में श्रावण मास को आत्मोत्थान की साधना का सर्वाधिक फलदायी अवसर माना गया है।

कौन था पहला कांवड़िया

हमारे देश में कांवड़ यात्राओं का इतिहास बहुत पुराना है। पौराणिक मान्यता है कि त्रेतायुग में महान मातृ-पितृ भक्त युवा श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता पिता को कांवड़ में बैठकार चारों धाम की तीर्थयात्रा करायी थी। इसीलिए उन्हें पहला कांवड़िया माना जाता है। लेकिन जहां तक बात शिव अभिषेक की है तो इसका गौरव महर्षि परशुराम को जाता है जिन्होंने कांवड़ में जल भरकर सर्वप्रथम श्रावण मास में भोलेशंकर को अर्पित किया था, तभी से कांवड़ियों द्वारा जलाभिषेक की परम्परा शुरू हो गयी। एक अन्य पुरा कथा के मुताबिक राक्षसराज रावण ने वैद्यनाथ में ज्योर्तिलिंग को स्थापित कर सबसे पहले कांवड़ से जलाभिषेक किया था। आनंद रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा सदाशिव को कांवड़ चढ़ाने का उल्लेख मिलता है। इसी तरह रुद्रांश हनुमान द्वारा भोलेशंकर के अभिषेक के भी पौराणिक विवरण मिलते हैं। संभवतया इन्हीं पुरा कथाओं से प्रेरित होकर देवाधिदेव के अभिषेक की यह परम्परा शुरू हुई होगी।

कांवड़ियों के चार स्वरूप

कांवड़ों के चार प्रकार होते हैं- सामान्य कांवड़, डाक कांवड़, खड़ी कांवड़ और दंडी कांवड़। सामान्य कांवड़िये कांवड़ यात्रा की अवधि में जब और जहां चाहे रुक कर विश्राम कर सकते हैं। विश्राम की अवधि में कांवड़ स्टैंड पर रखा जाता है ताकि कांवड़ का स्पर्श जमीन से न हो सके। दूसरे प्रकार के भक्त ‘डाक कांवड़िया’ कहलाते हैं। ये कांवड़ यात्रा के आरंभ से शिव के जलाभिषेक तक अनवरत चलते रहते हैं बगैर रुके और अपने निर्धारित शिवधाम तक की यात्रा एक निश्चित अवधि तय करते हैं। इस दौरान शरीर से उत्सर्जन की क्रियाएं तक वर्जित होती हैं। तीसरे प्रकार के भक्त ‘खड़ी कांवड़’ लेकर चलते हैं। इस दौरान उनकी मदद के लिए कोई-न-कोई सहयोगी उनके साथ चलता है। इस यात्रा में बिना नहाए कांवड़ यात्री कांवड़ को नहीं छूते। तेल, साबुन, कंघी की भी मनाही होती है। यात्रा में शामिल सभी एक-दूसरे को भोला, भोली या बम कहकर ही बुलाते हैं।

कुछ दिलचस्प तथ्य

यूं तो कांवड़ यात्रा से जुड़ी तमाम जानकारियों से हम सब भली भांति परिचित हैं लेकिन इस यात्रा से जुड़ी अनेक ऐसी बातें हैं जिनसे कम ही लोग परिचित होंगे। कांवड़िये जब घर से निकलते हैं तो अपनी बहन से टीका कराकर चलते हैं और लौटने पर बहनें ही भाइयों की आरती उतारती हैं तभी वे घर में आते हैं। कांवरियों के घर पहुंचने तक उनके घरों पर बिना छौंक के साग सब्जी बनती है। कहते हैं छौक लगाने से उनके पैरों में छाले पड़ जाते हैं। जब तक कांवड़िये घर पर नहीं आते तब तक उनके घरों में भोले व माता गंगा के गीत भजन गाये जाते हैं और रात में प्रसाद बांटे जाते हैं। कांवडिये अपनी कांवड़ को बेहद सम्मान देते हैं। उसका भूमि पर छूना भी पाप समझते हैं। दैनिक कर्म करते समय कांवड़ दूसरे साथी को पकड़ा दी जाती है। अगर कोई उपलब्ध नहीं है तो उस अवस्था में कांवड़ किसी पेड़ के ऊपर टांग दिया जाता है।

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