त्तर भारत की सबसे लोकप्रिय रामलीला का उदय बनारस से माना जाता है। बनारस के निकट रामनगर की रामलीला अपनी अलग शैली के लिए विख्यात है। रामलीला के दर्शक और माहौल समय के साथ भले ही बदल गया हो, लेकिन रामलीला का मंचन बिल्कुल नहीं भी बदला है। विशाल मुक्ताकाश के नीचे होने वाली यहां की रामलीला में आज भी बिजली की रोशनी एवं लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं होता। इस रामलीला की वेशभूषा, संवाद-मंच आदि सभी कुछ प्राचीनता का बोध कराते हैं। इसी तरह प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या की गीत संगीतमय रामलीला पूरे देश में प्रसिद्ध है। अयोध्या की रामलीला की खास बात यह है कि यहां एक विशाल मंच बनाकर पात्र संवादों को गीत के माध्यम से बोलते हैं। कथक के माध्यम से भी कलाकारों की ओर से रामकथा का वर्णन किया जाता है। श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में धनाभाव के चलते बीते कुछ सालों से बंद पड़ी रामलीला के मंचन को पुन: शुरू कराने के प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के फैसले से संत समाज ही नहीं, रामलीला प्रेमियों में भी भारी हर्ष है। दशहरे से एक माह पूर्व शुरू होने वाली इस लीला का मंचन एक जगह न होकर नगर के विभिन्न स्थानों पर होता है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब व राजस्थान में भी ऐसे ही आयोजन होते हैं। दिल्ली में तो कई संगठन अपने आयोजन को आलीशान बनाने पर बेहिसाब खर्च करते हैं। अल्मोड़ा का दशहरा थोड़ा भिन्न है। वहां विजयदशमी पर राम दरबार की डोली निकालती है। इसके पीछे रावण व उसके परिवार के पुतले भी घुमाएं जाते हैं। इनमें रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के अलावा ताड़का, खर-दूषण व सुबाहु के भी होते हैं। बाद में इनका दहन कर दिया जाता है। हिमाचल में कुल्लू का दशहरा अपने आप में अनोखा है। सत्रहवीं सदी में राजा जगतसिंह के काल में आरंभ हुए दशहरा का उत्सव को देखने देश-विदेश से हजारों पर्यटक आते हैं। ढालपुर के मैदान में विजयादशमी से आरंभ होकर यह सप्ताह भर चलता है। रघुनाथ मंदिर से सुंदर झांकी निकाली जाती है। दूर-दूर से लोग अपने देवता का डोला लेकर यहां आते हैं। ढालपुर मैदान में उपस्थित होकर सारे देवता रघुनाथजी के दरबार में सम्मान प्रकट करते हैं।

रामलीला खेलने का स्वरूप कई सदियों पुराना है। श्रीराम जन-जन में व्याप्त ऐसा रूप है जिसका धार्मिक महत्व देश के बाहर भी है।

राजस्थान में रामलीला के अलावा शमीवृक्ष की पूजा भी की जाती है। हरियाणा, पंजाब व उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में देवी की पूजा सांझी के रूप में की जाती है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मां दंतेश्वरी की पूजा की जाती है। तेरह दिन के इस उत्सव में दो रथयात्राएं निकाली जाती हैं। इनमें भारिया और ध्रुवा जनजाति के लोग शामिल होते हैं। गुजरात और महाराष्ट्र में यह उत्सव डांडिया व गरबा की धूम के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में मैसूर का दशहरा अंतरराष्ट्रीय ख्याति पा चुका है। उत्सव का केंद्र मैसूर पैलेस होता है। विजयादशमी को विशाल जुलूस निकलता है। एक हाथी पर सुनहरी हौदे में मां चामुंडेश्वरी की स्वर्ण प्रतिमा विराजती है। तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश के लोग घर में ही सुंदर झांकी सजाते हैं।

तेलंगाना क्षेत्र में इन्हीं दिनों बतुकम्मा पर्व मनाया जाता है। बांस की खपच्चियों से शंकु की आकृति बनाकर उसे फूलों से सजाया जाता है। समीप ही किसी मंदिर में रखकर देवी के रूप में उसका पूजन करते हैं। बंगाल, असम व बिहार के भी बहुत बड़े भूभाग पर महिषासुरमर्दिनी दुर्गा की पूजा की परंपरा चार सदी पुरानी है। बड़े-बड़े पंडालों में भव्य सज्जा के बीच मां दुर्गा की विशाल प्रतिमा स्थापित की जाती है। विजयदशमी के दिन गाजे-बाजे के साथ प्रतिमाओं को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। आज यह उत्सव वाराणसी, इलाहाबाद, गोरखपुर, भुवनेश्वर व दिल्ली के साथ-साथ जहां कहीं भी बंगाली समाज बसा है, उसी धूमधाम व परंपरागत तरीके से मनाया जाता है।

हम सब देशवासी प्रतिवर्ष रामलीलाओं के माध्यम से भगवान राम की प्रेरक जीवन गाथा का यशोगान करते हैं। राम कथा की अपार लोकप्रियता का कारण इसमें निहित जीवन की समग्रता का बोध है। इसमें आदर्श, लौकिकता एवं अलौकिकता, काम-अर्थ एवं धर्म-मोक्ष, ज्ञान एवं भक्ति का विरल संयोग मिलता है।  ४४४

 

विश्वभर में लोकप्रिय है रामकथा

रामकथा की अद्भुत विशेषता के कारण ही यह देश में ही नहीं, बल्कि विश्व के हर कोने में लोकप्रिय हैं। आज रामायण का स्वरूप अंतरराष्ट्रीय विस्तार लिये हुए है। दक्षिण एशिया में थाईलैण्ड, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि से लेकर मध्य एशिया चीन तक व यूरोप में रूस से लेकर इंग्लैण्ड तथा अमेरिका तक इसके विश्वव्यापी विस्तार के दिग्दर्शन किये जा सकते हैं। खासतौर पर दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में रामकथा का मंचन सांस्कृतिक विशिष्टताओं के तहत होता है। थाईलैण्ड इसका जीवन्त उदाहरण है। इसके सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में राम पूर्णत: समरस हैं। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि इस देश में कहीं-कहीं राम और बुद्ध के बीच कोई पृथकता की रेखा नहीं है। यहां के जीवन में दोनों का सहअस्तित्व है। रामकथा यहां के लोकजीवन में इतनी रची-बसी है कि थाईवासियों का यहां तक विश्वास है कि रामायण की घटनाएं उनके देश में ही घटीं।  थाईलैंड की तरह कम्बोडिया में राम के महत्व का जीता-जागता प्रमाण है अंकोरवाट। जो दक्षिण पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतीक है। यहां बुद्ध, शिव, विष्णु, राम आदि सभी भारतीय देवों की मूर्तियां हैं। इसका निर्माण ग्यारहवीं सदी में सूर्य वर्मन द्वितीय ने कराया था। इस मन्दिर के कई भाग हैं-अंकोरवाट, अंगकोरथाम, बेयोन आदि। अंकोरवाट में रामकथा के अनेक प्रसंग दीवारों पर उत्कीर्ण हैं। जैसे सीता की अग्नि परीक्षा, अशोक वाटिका में रामदूत हनुमान आगमन, लंका में राम-रावण युद्ध, बालि-सुग्रीव युद्ध आदि। यहां की रामायण का नाम है- रामकेर, जो थाई रामायण से बहुत मिलती-जुलती है। इसी तरह लाओस और वर्मा जैसे बौद्ध देशों के जीवन में भी रामकथा महत्वपूर्ण स्थान रखती है, इसे नृत्य नाटकों और छायाचित्रों के माध्यम से देखा जा सकता है। यहां के बौद्ध मंदिरों में इनके प्रदर्शन होते हैं। इण्डोनेशिया में रामायण की लोकप्रियता उल्लेखनीय है। यहां चाहे बाली का हिन्दू हो या जावा-सुमात्रा का मुसलमान, दोनों ही राम को अपना राष्ट्रीय महापुरुष और राम साहित्य तथा राम सम्बन्धी ऐतिहासिक अवशेषों को अपनी सांस्कृतिक धरोहर समझता है। जोगजाकर्ता से लगभग 15 मील की दूरी पर स्थित प्राम्बनन का मंदिर इस बात का साक्षी है, जिसकी प्रस्तर भीतियों पर सम्पूर्ण रामकथा उत्कीर्ण है। बाली में रामलीला या रामकथा से सम्बन्धित नृत्य-नाटिकाओं की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इस द्वीप का वातावरण पूर्णत: राममय है। इंडोनेशिया के शास्त्रीय नृत्य नाटकों, रंगमंच व छाया नाटकों में रामकथा पूरी तरह छायी हुई है। जावा व बाली द्वीप में वायांग, कुमिन, रामायण बैले, वेरांग केत्जक विधाओं में रामकथा प्रस्तुत की जाती है। थाईलैंड में रामकथा का मंचन रामक्येन नाम से किया जाता है।

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