वरात्र शक्ति के आवाहन का पर्व है। शक्ति के अवतरण के लिए आधारभूमि तैयार करने का साधना काल है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार त्रेता युग में श्रीराम ने भी शक्ति की अराधना की थी और अंतत: आदिमाता भगवती के आशीर्वाद से विजयादशमी के दिन जनपीड़क रावण का वध कर मानवता का उद्धार किया था। महाप्राण निराला की कालजयी रचना ‘राम की शक्ति पूजा’ में शक्ति की मौलिक कल्पना की जो चुनौती श्रीराम को मिली थी, वह वर्तमान परिस्थितियों में उतनी ही प्रासंगिक है। ‘अन्याय जिधर है उधर शक्ति’ कहते हुए जब राम की आंखों में आंसू आ जाते हैं, तब जामवंत राम को शक्ति पूजा के लिए प्रेरित कर कहते हैं- शक्ति की करो मौलिक कल्पना,आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर। तब राम, सिंह भाव से शक्ति की आराधना कर भगवती दुर्गा से विजय होने का वरदान प्राप्त करते हैं। वे 108 नीलकमल पुष्पों से मां आद्यशक्ति की आराधना कर शक्ति की मौलिक कल्पना को साकार रूप देते हैं। उनकी परीक्षा लेने के लिए जब देवी एक कमल पुष्प गायब कर देती हैं तो सायास उन्हें स्मरण होता है कि बचपन में मां उन्हें राजीव लोचन कहा करती थीं, यह भाव आते ही जैसे ही वे अपना एक नेत्र देवी के चरणों में समर्पित करने को प्रस्तुत होते हैं। देवी उनके समक्ष प्रकट हो उन्हें विजयश्री का आशीर्वाद देती हैं। ‘राम की शक्तिपूजा’ में ‘होगी जय, होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन, कह महाशक्ति राम के बदन में हुई विलीन।’ के माध्यम से जिस तरह मां शक्ति लोकमंगल के पथिक का अनुगमन करती है; निराला की यह मौलिक काव्य दृष्टि वाकई अपने आप में अद्भुत है।

इस बार 10 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू हो रहा है। इस नौ दिन में मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। इससे चहुं ओर हर्ष और उल्लास के भाव के साथ नव ऊर्जा का भी संचार होता है।

सच भी है कि शक्ति के बिना लोकमंगल का कोई भी प्रयोजन सफल नहीं हो सकता। यही वजह है कि हमारे यहां शक्ति के बिना शिव को ‘शव’ की संज्ञा दी गयी है। शक्ति ही चेतना है, सौन्दर्य है, इसी में संपूर्ण विश्व निहित है। देवी दुर्गा वस्तुत: शक्ति की अपरिमितता की द्योतक हैं। वे दुर्गति नाशिनी हैं। दुर्ग का सामान्य अर्थ किला भी है। जिस तरह युद्ध के संकट काल में दुर्ग में रहने वाले लोग सुरक्षित बच जाते हैं, ठीक उसी तरह मां दुर्गा की शरण में आये हुए की दुर्गति कदापि नहीं हो सकती। दुर्गा शब्द का यही निहितार्थ है। भारतीय संस्कृति में नारी के इसी सृजनात्मक व मातृ सत्तात्मक दिव्य स्वरूप को प्रतिष्ठित करने के लिए मार्कण्डेय ऋषि ने देवी भागवत पुराण में अलंकारिक भाषा शैली में विविध रोचक कथा प्रसंगों की संकल्पना की है। देवी भागवत के ‘दुर्गा सप्तशती’ अंश में भगवती दुर्गा की अभ्यर्थना पुरुषार्थ साधिका देवी के रूप में की गयी है। देवी दुर्गा वस्तुत: नारी शक्ति की अपरिमितता की द्योतक हैं।

मां जगदम्बा के इस महात्म्य को वर्तमान संदर्भों में देखें तो पाएंगे महिषासुर पाशविक प्रवृत्तियों का प्रतीक है। जब-जब मानव समाज में सात्विकता व नैतिकता का हृास होता है तब-तब पाशविक प्रवृत्तियां सिर उठाकर संसार में हाहाकार मचाती हैं। मां दुर्गा का वाहन सिंह बल का, शक्ति का, निर्भयता का प्रतीक है। उनके दस हाथ दस दिशाओं में शक्ति संगठन के सूचक हैं। इसी तरह यह भी समझना चाहिए कि प्रत्येक असुर एक दुष्प्रवृत्ति का प्रतीक है, जिनका विनाश दुर्गा जैसी दुर्गतिनाशिनी शक्ति के द्वारा ही हो सकता है।  शास्त्रीय मत से मनुष्य में मुख्य रूप से तीन प्रवृतियां होती हैं- सात्विक, राजस एवं तामस। जब तामसिक प्रवृत्तियां प्रबल होती हैं तो मनुष्य उदात्त दैवी गुणों से, सात्विक वृत्तियों से दूर हो जाता है, उसमें पाशविकता प्रबल हो उठती है। शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ आदि असुर और कुछ नहीं, हमारे भीतर स्थित आलस, लालच और घमंड जैसी दुष्प्रवृत्तियां ही हैं, जो हमारी अच्छाइयों को उबरने नहीं देती और हम अनजाने ही पतन की राह पर चल पड़ते हैं।

मां दुर्गा के नौ रूपों का महत्व

  1. शैलपुत्री

मां दुर्गा का प्रथम रूप है शैलपुत्री। पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म होने से इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। नवरात्र की प्रथम तिथि को शैलपुत्री की पूजा की जाती है।

  1. ब्रह्मचारिणी

मां दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। दुर्गा का यह रूप भक्तों और साधकों को अनंत कोटि फल प्रदान करने वाला है।

  1. चंद्रघंटा

मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप चंद्रघंटा है। इनकी आराधना तृतीया को की जाती है। इनकी उपासना से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। वीरता के गुणों में वृद्धि होती है।

  1. कुष्मांडा

चतुर्थी के दिन मां कुष्मांडा की आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है।

  1. स्कंदमाता

नवरात्र का पांचवां दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वालीं यह माता परम सुखदायी हैं। मां अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।

  1. कात्यायनी

मां का छठा रूप कात्यायनी है। छठे दिन इनकी पूजा-अर्चना की जाती है। दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधूलि बेला में किया जाता है।

  1. कालरात्रि

नवरात्र की सप्तमी के दिन मां कालरात्रि की आराधना का विधान है। इनकी पूजा-अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है व दुश्मनों का नाश होता है।

  1. महागौरी

देवी का आठवा रूप मां गौरी है। इनका अष्टमी के दिन पूजन का विधान है। पूजन करने से समस्त पापों का क्षय होकर कांति बढ़ती है।

  1. सिद्धिदात्री

मां सिद्धिदात्री की आराधना नवरात्र की नवमी के दिन की जाती है। इनकी आराधना से जातक को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकाया प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना आदि सिद्धियों व नव निधियों की प्राप्ति होती है।

मां शक्ति की आराधना के दृष्टिगत ‘नवरात्र’ ऐसा देव पर्व है जिसे हिन्दू दर्शन में सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल माना गया है। आध्यात्मिक विभूति पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने नवरात्र साधना की महत्ता के विषय में लिखा है, जिस प्रकार दिन-रात के 24 घंटों में ईश्वर की उपासना के लिए प्रात: व संध्याकाल की ब्रह्मबेला सर्वोत्तम होती है; उसी प्रकार वार्षिक साधनाकाल की दृष्टि से नवरात्र काल सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं। इसीलिए नवरात्र काल को अध्यात्म के क्षेत्र में मुहुर्त विशेष की मान्यता प्राप्त है। ऋतु परिवर्तन की यह बेला साधना के द्वारा शक्ति संचय की है। वैसे तो आत्मिक प्रगति के लिए किसी अवसर विशेष की बाध्यता नहीं होती लेकिन नवरात्र बेला में किये गये उपचार संकल्पबल के कारण सहज ही सफल हो जाते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मां दुर्गा की कथा से प्रेरणा लेकर जो देवी साधक नवरात्र के शुभकाल में भगवती की भावपूर्ण आराधना करते हैं वे कर्म अभिमान से मुक्त हो जाते हैं और उनका जीवन शांत व निर्विघ्न व्यतीत होता है। इसी को ‘ब्राह्मी स्थिति’ कहते हैं। नौ दिवसीय यह विशिष्ट साधनाकाल मुख्यरूप से साल में दो बार आता है- चैत्र यानी वासन्तिक नवरात्र व आश्विन यानी शारदीय नवरात्र। ये दोनों महीने हमारी दो मुख्य फसलों रबी व खरीफ के उत्पादन काल के भी सूचक हैं। इन्हीं दोनों अवसरों पर दो नवरात्रों की संकल्पना भारतीय वाड्ंमय में बहुत सोच विचार कर की गयी है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक वासंतिक नवरात्र एवं आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्र। इस दौरान प्रकृति में परिवर्तन स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है। हमारे तत्वदर्शी ऋषियों -मनीषियों द्वारा ऋतु परिवर्तन की इस बेला में नव अन्न यानी नयी कृषि उपज के हवन के द्वारा मां शक्ति की साधना-आराधना का विधान बनाया जाना उनकी अनुपम जीवन दृष्टि का परिचायक है। जहां वासंतिक नवरात्र की अवधि से भारतीय नववर्ष (नवसंवत्सर) का शुभारम्भ होता है वहीं प्रस्तुत शारदीय नवरात्र में देशभर में दुर्गापूजा की धूम देखते ही बनती है।

देवी आराधना के इस नवरात्र उत्सव को समूचे देश में खूब धूमधाम से मनाया जाता है। कहीं भव्य पूजा पंडालों की रौनक, कहीं गरबों की धूम, कहीं सप्तशती पाठ के आयोजन तो कहीं मानस के पारायण पाठ तो कहीं भागवत सप्ताह। देवी मां के मंदिरों में लगने वाले जयकारे भी एक दिव्य माहौल का सृजन करते दिखते हैं। नवरात्र साधना में पूजा-उपासना, व्रत एवं भोग के भी अपने भावार्थ हैं। केवल प्रतिमा के समक्ष बैठकर मंत्रपाठ कर लेने मात्र से पूजन की सार्थकता नहीं होती; इसके लिए संकल्प एवं पुरुषार्थ दोनों आवश्यक होते हैं।

नवरात्र का पुण्य फलदायी साधनाकाल हमें यह अवसर देता है कि हमें अपने भीतर की सद्प्रवृत्तियों को जगाकर दुष्प्रवृत्तियों को नष्ट कर दें। यह वाकई बहुत बड़ी विडम्बना है कि इस मातृ पूजक राष्ट्र में आज हमारी माताएं-बहनें ही नहीं छोटी-छोटी बच्चियां तक असुरक्षित हैं। देश में दुराचार की घटनाओं व कन्या भ्रूण हत्याओं के आंकड़े हमारे माथे पर लगे कलंक का ऐसा बदनुमा दाग हैं जो किसी भी भावनाशील देशवासी का सिर शर्म से नीचे झुकाने के लिए पर्याप्त हैं। यदि हम अपनी साधना-उपासना से जगजननी मां दुर्गा को प्रसन्न कर उनसे शक्ति व भक्ति का अनुदान-वरदान पाना चाहते हैं तो उससे पूर्व अपनी मातृशक्ति की सुरक्षा व सम्मान सुनिश्चित करना होगा। तभी हम मां आद्यशक्ति की कृपादृष्टि के अधिकारी हो सकेंगे।

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