सबरीमाला मंदिर का मामला एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय में है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और एसके कौल की पीठ ने 23 अक्टूबर को पुनर्विचार याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि इस पर 13 नवंबर को सुनवाई होगी। पीठ ने यह भी कहा कि कुल 19 याचिकाएं हैं, जिनपर एक ही साथ सुनवाई की जाएगी। यह सुनवाई खुली अदालत में होगी। परंपरा के अनुसार पुनर्विचार याचिकाएं उसी पीठ के सामने जाती हैं, जिसने पिछला आदेश दिया था।

कोर्ट के आदेश के बावजूद सबरीमाला मंदिर में प्रतिबंधित उम्र की महिलाएं प्रवेश नहीं कर सकीं। मामला एक बार फिर पुनर्विचार याचिकाओं के रूप में सुप्रीम कोर्ट में है। ऐसे में कोर्ट का आगे का रुख क्या होगा, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

परंतु इस बार मामला अलग है, क्योंकि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ऐसे में नयी पीठ की अगुवाई वर्तमान मुख्य न्यायाधीश को ही करनी चाहिए, शेष चारों न्यायाधीश पहले वाले ही रहेंगे। ध्यान रहे 28 सितंबर को पांच सदस्यीय पीठ ने सबरीमाला मंदिर में खास उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को गैरकानूनी बताया था। अधिकतर पुनर्विचार याचिकाओं में उन बातों को ही उठाया गया है, जिसके आधार पर जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने पीठ के निर्णय से असहमति जतायी थी।

मंदिर की परंपरा

सबरीमाला मंदिर हर दिन नहीं खुलता। मलयालम महीने के पहले पांच दिन के अलावा मकर संक्रांति यानी 14 जनवरी और महा विष्णु संक्रांति यानी 14 अप्रैल को मंदिर का कपाट खुलता है। इसके अलावा मंडल पूजा के दौरान मंदिर सबसे लंबे समय के लिए खुलता है, जब देश विदेश से लाखों लोग यहां आते हैं। मोटे तौर पर यह 15 नवंबर से 26 दिसंबर तक खुला रहता है।

उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि अगर बहुत आवश्यक न हो, तब तक धार्मिक मामलों में जनहित याचिकाओं द्वारा हस्तक्षेप ना किया जाए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का कोई ठोस आधार नहीं है और वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध है। क्योंकि हिंदू धर्म किसी खास किताब या संहिता से बंधा हुआ नहीं है। यहां सैकड़ों पंथ और धाराएं हैं, जिन्हें एक तराजू पर नहीं रखा जा सकता। नेशनल अयप्पा डिवोटीज एसोसिएशन ने अपनी याचिका में कहा है कि आस्था को वैज्ञानिक या तार्किक आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। नायर सर्विस सोसाइटी ने अपनी याचिका में कहा है कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर कोई पाबंदी नहीं है। भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं, इसलिए 10 वर्ष से कम और 50 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाएं ही उनकी पूजा कर सकती हैं।

जस्टिस इंदू मल्होत्रा की राय

28 सितंबर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की पुरानी परंपरा को चार-एक के बहुमत से गैरकानूनी करार दिया। पीठ की एकमात्र महिला जज इंदू मल्होत्रा की राय बाकी जजों से अलग थी। उन्होंने सबरीमाला मंदिर के पुरुष पुजारियों के तर्क को उचित ठहराया था और न्यायालय के हस्तक्षेप को उचित नहीं माना था। उनके फैसले के मुताबिक-
-एक बहुलतावादी समाज में जहां विभिन्न आस्था, विश्वास व परंपरा वाले लोग रहते हैं, वहां किसी खास समुदाय के धार्मिक रीति-रिवाज में हस्तक्षेप करने से देश के पंथनिरपेक्ष व संवैधानिक ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
-चूंकि सबरीमाला में भगवान अयप्पा नास्तिक ब्रह्मचारी के रूप में हैं, इसलिए वहां यह पाबंदी है। जहां वे अन्य रूपों में हैं, वहां यह पाबंदी नहीं है। याचिकाकतार्ओं ने भी कहा है कि भगवान अयप्पा के करीब हजार मंदिर हैं, जहां महिलाओं के प्रवेश पर कोई पाबंदी नहीं है। तो यह लैंगिक भेदभाव का मामला नहीं है।
-समानता का अधिकार ही एकमात्र पैमाना नहीं है, जिसके आधार पर धार्मिक क्रिया- कलापों को तौला जाए। अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह अपनी आस्था के अनुसार पूजा या प्रार्थना करे। धार्मिक मामलों में समानता को किसी खास मत के मानने वालों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
-किसी भी धर्म को पूजा के तौर-तरीके, कर्मकांड या नैतिक आचरण संबंधी नियम बनाने का अधिकार है। इसे भी धर्म का अभिन्न अंग माना गया है और इसलिए धार्मिक आस्था के रूप में उसकी रक्षा की जानी चाहिए। 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक उनकी धार्मिक आस्था का अभिन्न अंग है। सबरीमाला मंदिर में यह बरसों से होता आया है।
-याचिकतार्ओं का यह कहना कि सबरीमाला में महिलाओं को अस्पृश्य माना जाता है, उनकी समझ का फेर है। खास उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को अस्पृश्यता नहीं कहा जा सकता।

सोसाइटी ने कहा है कि अगर सारे धार्मिक अनुष्ठान को तर्क और अनुच्छेद पर कसा जाएगा तो उसका मूल स्वरूप ही बदल जाएगा। इससे धर्म खतरे में पड़ जाएगा। 19 पुनर्विचार याचिकाओं में से कुछ में पिछली याचिका दायर करने वालों के अधिकार पर भी सवाल किया है। उनका कहना है कि भगवान अयप्पा के मंदिर के किसी नियम पर वही सवाल करे, जिसको उनमें आस्था हो। महज महिला होने या महिला अधिकारों के लिए काम करने से उनको यह हक नहीं हासिल हो जाता कि वे सबरीमाला की परंपरा पर सवाल करें। तथ्य यह भी है कि सबरीमाला में हर उम्र की महिला के प्रवेश के लिए याचिका दायर करने वाली महिलाओं में से एक ने भी मंदिर में प्रवेश का प्रयास नहीं किया। ऐसे में सवाल ये है कि उन्होंने किसके हित में जनहित याचिका दायर की थी? याचिकाकर्ता का कहना है कि महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ने का दिखावा करने वाले ही अदालत के उस निर्णय को क्रांतिकारी बता रहे हैं, जबकि तथ्यों के आधार पर उस निर्णय का बचाव नहीं किया जा सकता। वह अव्यवहारिक है, इसलिए उसे खारिज किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का पहले दिन से ही जोरदार विरोध हो रहा है। खासकर न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने जिस तरह से धार्मिक आस्था को अनुच्छेद 14 के सांचे में डालकर सबरीमाला में सभी महिलाओं के प्रवेश को जायज ठहराया, वह लोगों के गले नहीं उतरा।

फिर भी लोगों को लगा कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा और नयी पीढ़ी के लोग इसको स्वीकार कर लेंगे। लेकिन हुआ ठीक उल्टा। सबरीमाला की परंपरा की रक्षा के लिए अधिकांश हिंदू महिलाओं ने स्वत: ही मंदिर में प्रवेश नहीं करने का फैसला किया। राज्य सरकार के प्रयासों के बावजूद प्रतिबंधित उम्र की एक भी महिला भगवान अयप्पा के सामने नहीं जा पायी। अब पुनर्विचार याचिका दायर करने वालों में एक राज्य सरकार भी है। वह अदालत को बताएगी कि क्यों उनके आदेश को लागू नहीं किया जा सका। 

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