दया प्रकाश सिन्हा साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में एक ऐसा नाम है, जो नाटककार, निर्देशक और सांस्कृतिक प्रशासक के रूप में जाना जाता है। वरिष्ठ रंगकर्मी के रूप में उनकी एक विशिष्ट पहचान है। उनका काम इस बात की गवाही देता है। उन्होंने लगभग डेढ़ दर्जन नाटक लिखे हैं। लगभग पचास वर्षों से उनके नाटक विभिन्न नाट्य संस्थाओं द्वारा मंचित हो रहे हैं। रंगमंच के लिए उनके अवदान को कई बार सम्मानित भी किया गया। अब तक उन्हें साहित्य भूषण, लोहिया सम्मान, सरदार बल्लभ भाई पटेल सम्मान के साथ-साथ संगीत नाटक अकादमी के राष्ट्रीय पुरस्कार ‘अकादमी अवार्ड’ से भी सम्मानित किया जा चुका है। उनके नाटकों को अपनी उत्कृष्टता के कारण कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है। हाल ही में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर लंबी बातचीत प्रतिभा कुशवाहा ने की, पेश है बातचीत के प्रमुख अंश।

० आपको राष्ट्रवादी नाटककार के रूप में भी जाना जाता है, इस पर आप क्या कहेंगे।

लोग मुझे राष्ट्रवादी नाटककार कहते हैं पर विशुद्ध रूप से मैं एक नाटककार हूं। मुझे यह लेबलिंग पसंद नहीं है। नाटक नाटक होता है, वह नौ रसों पर आधारित होता है। जब आप कहते हैं कि राष्ट्रवादी नाटककार, इसका दूसरा अर्थ यह निकलता है कि कुछ नाटककार अराष्ट्रवादी हैं। किसे आप अराष्ट्रवादी नाटककार कह सकती हैं? वास्तव में यह कहना गलत है। यह नाटक को राजनीति में खींचकर लाता है। नाटक साहित्यिक है। इसे राजनीति में खींचकर लाने का श्रेय कम्युनिस्ट पार्टियों को जाता है। क्या तुलसी दास के रामचरित मानस को राष्ट्रवादी कह सकते हैं? मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि किसी को राष्ट्रवादी नाटककार कहा जाए। ये साहित्य में खेमेबाजी है, राजनीति का प्रवेश है।

० ऐसा कब और कैसे हुआ?

ऐसा कम्युनिस्टों ने किया है। 1935-36 में प्रोग्रेसिव राइटर एसोसियेशन की स्थापना हुई। उस समय उन्होंने नाटककारों को प्रोग्रेसिव व नॉन-प्रग्रेसिव में बांटा। उन्होंने इस तरह का विभाजन करके पहली बार कला, साहित्य के माध्यम से सत्ता हथियाने की कोशिश की। पहली बार वामपंथियों और प्रोग्रेसिव राइटर एसोसियेशन ने साहित्य को सत्ता हथियाने के हथियार के रूप में प्रयोग किया। हमारे देश में साहित्य-संस्कृति का प्रयोग विविधता वाले देश को एक सूत्र में बांधने में किया जाना चाहिए।

० जिस तरह के नाटकों को आपने रचा, उसकी प्रेरणा आपको कहां से मिल रही थी?

आदमी की जो रचना प्रक्रिया होती है, वह कुछ सोच-समझकर नहीं होती है। नकल से नहीं होती है, वह स्वत: स्फूर्त होती है। मैंने कुछ सोचकर नहीं लिखा, कि मुझे इसी तरह के नाटक लिखने हैं। लेकिन मैं स्वभावत: राष्ट्रवादी हूं। मैं भारतीय राष्ट्रीयता में विश्वास रखता हूं। इसलिए मेरे नाटकों में मेरी उसी बात की छवि आती है। नाटक तीन तरह से लिखे जाते हैं। एक, व्यक्ति केंद्रित होते हैं, दूसरा घटना केंद्रित और तीसरा विचार केंद्रित होते हैं। मेरे नाटकों में विचार तत्व अधिक हैं, जिन्हें मैंने रूपायित करने की कोशिश की है। घटना और व्यक्ति केंद्रित मेरे नाटक नहीं हैं।

० किस नाटककार से आप प्रभावित रहे हैं?

मैं किसी नाटककार से प्रभावित नहीं रहा। जो मैंने अनुभव किया, वही लिखा। मेरे नाटक मेरी अनुभूति हैं।

० हिन्दी भाषी राज्यों में नाटक समाज के हाशिये पर है। महाराष्ट्र और बंगाल के मुकाबले यहां नाटक लोकप्रिय नहीं हैं। इसका कारण क्या है?

हिन्दी प्रदेशों का करीब हजार साल तक का इतिहास मुस्लिम आधिपत्य का रहा है। आज भी हम हिन्दी भाषी राज्यों में देखते हैं कि यहां गायन-वादन की परंपरा नहीं है। मुस्लिम शासन काल में चूंकि नृत्य पसंद किया जाता था, तब नृत्य कोठों में चला गया, तो वह बचा रहा। जो गायन था, वह सुदूर मंदिरों में शास्त्रीय संगीत के रूप में बचा रहा। नाटक एक सामूहिक प्रयास होता है, इसलिए मुस्लिम शासन काल में नहीं बच सका। देश में जब ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हुआ, तो उनकी छावनियों में अंग्रेजों के शेक्सपियर के नाटक हुआ करते थे। यहां कुछ पारसी नाटक वाले भी आया करते थे। वे अंग्रेजी नाटकों की नकल भी होते थे। पारसी नाटक स्वअनुभूति वाले नहीं थे। वे समाज से कटे होते थे। उनकी वेशभूषा तड़क-भड़क वाली होती थी। उस समय समाज में लोक परंपरा वाली चीजें जैसे रासलीला, स्वांग, नौटंकी की परंपराएं थीं। नौटंकी पारसी थियेटर की चमक-दमक से प्रभावित थी। जब टॉकी फिल्में आईं, तब पारसी थियेटर समाप्ति की कगार पर पहुंच गया। जब देश आजाद हुआ, तब यहां थियेटर के क्षेत्र में सन्नाटा था। आज हम जो थियेटर देख रहे हैं, वह अव्यवसायी थियेटर की उपज है।

० जब देश में आजादी का आंदोलन चल रहा था, तब भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद जैसे हिन्दी साहित्यकार नाटक लिख रहे थे।

सही है। पर वे ऐसे नाटक थे, जिन्हें खेला नहीं जा सकता था। ये रंगमंच से कटे हुए नाटक थे। वे मंचीय दृष्टि से कमजोर थे। जयशंकर प्रसाद का एक नाटक प्रायश्चित है जिसमें जयचंद और पृथ्वीराज चौहान की कहानी है। यह नाटक सात-आठ पेज का है और इसमें कुल पांच-छह सीन है। ऐसे नाटकों का मंचन कठिन हो जाता है। इस तरह हम देखते हैं कि हमारे यहां हिन्दी रंगमंच था ही नहीं। अगर नाटक रंगमंच से कटे हों, तो उसका उतना महत्व नहीं रह जाता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र नाटक कर रहे थे, पर वे अव्यवसायिक थे। जब थियेटर व्यवसायिक होता है, तब एक नाटक के कई शो होते हैं, और वह बार-बार खेला जाता है। जैसे अगाथा किस्ट्री का लिखा हुआ माउस ट्रैप जिसके 1952 से 2016 तक 25 हजार शो हो चुके हैं। जो थियेटर समाज से जुड़ा होता है, वह एक-दो शो नहीं करता है? हिन्दी थियेटर की कमी यह रही है कि रंगमंच के अनुभव वाले लोगों ने नाटक नहीं लिखे। यहां नाटक की परंपरा विकसित नहीं हो पाई।

० आजादी के बाद थियेटर के क्षेत्र में क्या हुआ?

आजादी के बाद पृथ्वी थियेटर ने इसे पुनर्जीवित किया। इसकी देन रियलिस्टिक थियेटर है। इसके नाटक हमारे समाज से जुड़े हुए थे। गद्दार, आहूती जैसे सामान्यजन से जुड़ी समस्याओं पर पृथ्वी थियेटर में नाटक किए गए। किसान की समस्या से जुड़ा किसान नाटक यहां किया गया। पृथ्वी थियेटर के नाटकों की भाषा अधिकांश उर्दू होती थी। यहां उर्दू डॉमिनेट करती थी।

० हिन्दी नाटकों के दर्शक कम हैं?

हमारे यहां नाटकों के लिए समुचित इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। अगर आपको खेल प्रमोट करना होता है, तो सबसे पहले आपको एक मैदान की आवश्यकता पड़ती है। आपने नाटक सीखने के लिए संस्थाएं तो बना दीं, पर उन्हें देखने के लिए आॅडीटोरियम नहीं दिए। दिल्ली में मंडी हॉउस की तरह एक जगह पर इतने आॅडीटोरियम न देकर देश के कोने-कोने में नाटक देखने की व्यवस्थाएं होनी चाहिए। तब नाटकों का समाज के अंदर प्रवेश होगा।

० नाटकों के लिए सरकारी संस्थाएं कैसा काम कर रही हैं? जैसे एनएसडी जैसी संस्था।

अच्छा काम कर रही है। इसका थियेटर ट्रेनिंग में अच्छा काम है।

० क्या इन संस्थाओं का कार्यक्षेत्र कुछ सीमित जगहों तक सिमट गया है?

ऐसा है कि हिन्दी का विकास हुआ पर नाट्य लेखन का विकास उतना नहीं हुआ। इसलिए मंच पर खेले जाने वाले नाटकों का अभाव रहा। हमारे नाटककार और रंगमंच में यही अंतर है। अगर आपको नाटक करना होगा, तो रंगमंच की दृष्टि से संपन्न नाटकों को ढूढ़ेंगे? इसलिए हमने दूसरी भाषा के नाटकों का अनुवाद कराकर प्रयोग किया। बंगाली और मराठी भाषा के, जैसे घासीराम कोतवाल, आज तक खेला जाता है। बादल सरकार और विजय तेंदुलकर के नाटक भी हो सकते हैं।

० आपका कोई ग्रुप भी है?

नहीं, वैसे मैं आजकल संस्कार भारती की ओर से नाटक करता हूं।

० नाटकों में रुचि कैसे पैदा हुई?

व्यक्तियों में जन्मजात कुछ रुचियां होती हैं। ब्रिटिश ड्रामा में मुझे प्रवेश मिल गया था। पर घरवालों ने कहा कि कहां जाओगे। नाटक का 50-60 साल पहले कोई स्कोप नहीं था। इसलिए मैं दूसरी नौकरी में चला गया। मैंने अभिनय से नाटक में प्रवेश लिया। इसके बाद लेखन, और फिर निर्देशन भी किया। अपने हर नाटक का पहले मैंने निर्देशन किया। बाद में दूसरे लोगों ने उसे खेला।

०अब कुछ नया लिख रहे हैं?

नहीं, अब कुछ नहीं। अभी मेरे एक नाटक का अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है।

० प्रशासनिक सेवा के साथ-साथ इतना सब कुछ करना कैसे संभव हुआ।

ये सब रुचि की बात होती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here