रहमान अब्बास उर्दू दुनिया के प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं, जो अपनी बेबाक रचनात्मक शैली के लिए जाने जाते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के धुर समर्थक रहमान अब्बास उर्दू में रूढ़िवादिता के विरोधी माने जाते हैं। परंपरा से हटकर समाज की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करने के हिमायती हैं। समाजी हकीकत पर शब्दों की पर्दादारी के विरुद्ध हैं। उनके उपन्यास में प्रेम की दास्तान और रूमानियत वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार खूबसूरत समावेश दर्शाती है, जहां वे खुलकर बातें करते हैं। उनके अब तक चार उपन्यास ‘नखलिस्तान की तलाश’, ‘एक ममनूआ मोहब्बत की कहानी’, ‘खुदा के साए में आंख मिचौली’ और ‘रूहजिन’ नाम से प्रकाशित हो चुके हैं। ‘रूहजिन’ को हाल ही में उर्दू भाषा का साहित्य अकादमी पुरस्कार- 2018 दिए जाने की घोषणा हुई है। इस उपन्यास का हिंदी, अंग्रेजी और जर्मन भाषाओं में अनुवाद भी किया जा चुका है। रहमान अब्बास से हमारे प्रतिनिधि मोहम्मद शहजाद ने बातचीत की। प्रस्तुत है इसके प्रमुख अंश:

  • सबसे पहले तो आपको साहित्य अकादमी अवार्ड मिलने की बधाई। इसके साथ ही मैं इस पर आपकी प्रतिक्रिया जानना चाहूंगा?
    बहुत-बहुत शुक्रिया! यह हमारे देश के साहित्य का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है, जो लेखक की मेहनत की स्वीकार्यता के एवज में मिलता है। तो फितरी सी बात है कि मैं बहुत खुश हूं। 
  • आपको साहित्य अकादमी का यह सम्मान ‘रूहजिन’ के लिए मिला है, इस उपन्यास के बार में कुछ बताइए।
    2016 में जश्ने-रेख्ता के समारोह में कई प्रसिद्ध भारतीय और पाकिस्तानी रचनाकारों की उपस्थिति में उर्दू के मशहूर शायर मोहम्मद अलवी के हाथों इसका विमोचन हुआ था। इस उपन्यास की पृष्ठभूमि कोंकण और मुंबई की है। 2005, मुंबई में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई थी। उसमें दो-ढाई हजार लोग मारे गए थे। समंदर का पानी शहर के अंदर तक तक फैल गया था। जो निचले इलाके हैं, वहां तबाही का मंजर था। झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में बड़ा दर्दनाक दृश्य था। नावेल वहीं से शुरू होता है, वहीं पर खत्म भी होता है, लेकिन इस दौरान मुंबई की जो अपनी देवी हैं मुंबा देवी और जो हिंदुस्तान के दूसरे देवी-देवता हैं, इन सबको लेकर प्रेम की एक दास्तान है। लेकिन मोहब्बत की इस कहानी में जो दूसरे शेड्स हो सकते हैं और उनमें क्या अंतर होता है? इस उलझन को समझने की भी एक कोशिश है। एक ऐसी कहानी जिसमें तमाम साइकोलॉजिकल ड्रामे को समझने का एक प्रयास भी है। 
  • रूहजिन नई शब्दावली है, जो शब्दकोश में नहीं है। इसे आपने क्या सोचकर ईजाद किया और इससे आपका क्या अर्थ है?
    ‘रूहजिन’ एक नई शब्दावली है, जो उन बच्चों के लिए है जो अपने माता-पिता या फिर दोनों में से किसी एक को किसी दूसरे मर्द या औरत के साथ सेक्स सम्बंधों में देखते हैं। ऐसे माता-पिता के लिए तो हमारे समाज में पहले से शब्द थे। अगर कोई बच्चा अबोध आयु में इस तरह का दृश्य देखता है, उस पर किस तरह का प्रभाव पड़ सकता है। वह किस तरह की मनोस्थिति से गुजरता है, उसको वर्णित करने के लिए हमारे पास कोई शब्द नहीं है। तो फिर मैंने यह शब्दावली ईजाद की। मुझे नहीं पता कि व्याकरण के नियम क्या हैं और इसका मुझसे सरोकार भी नहीं है। लेकिन ‘रूह’ यानी आत्मा में जो ‘हुज्न’ यानी विडम्बना होती है, जो मन में घर कर जाती है और कभी मरती नहीं है। उस स्थिति को बयान करने के लिए यह ‘रूहजिन’ शब्द है। 
  • आप उर्दू की विवादास्पद शख्सियत हैं, क्योंकि आप पर अश्लीलता परोसने का भी आरोप लगा, इस पर आपका क्या स्पष्टीकरण है?
    मुझे लगता है कि यह समस्या आज भी हमारे समाज में बाकी है। मुझे याद है कभी खदीजा मस्तूर ने कहा था कि हम दस-दस बच्चे पैदा करते हैं, लेकिन इस बात को स्वीकार करने में शर्म क्यों आती है कि प्रेम एक आनंदमयी एहसास है। सेक्स असल में प्रेम का चरम ही तो है न? बगैर प्रेम के हमारा वजूद ही नहीं है। और सेक्स में हम प्रक्रिया को नहीं बताते, बल्कि हम जब शारीरिक तौर पर किसी के साथ होते हैं, तो कहीं न कहीं रूहानी सतह पर एक सम्बंध से गुजर रहे होते हैं। मेरे नावेल में यही तमाशा है। मेरे पहले नावेल ‘नखलिस्तान की तलाश’ पर जो मुकदमा चला, उसकी वजह अलग तरह की है। इसलिए उन दिनों मेरे जेहन में वैसे ही नावेल थे और मुझे आभास नहीं था कि मैं ऐसा उपन्यास लिखूंगा, तो उर्दू के लिए इतना तकलीफदेह होगा। खैर, आरोप तो मुझ पर लगा था, लेकिन वह मुकदमा कोर्ट में दस साल तक सुनवाई के बाद खत्म हो गया। तो अदालत ने कहा कि किताब अश्लील नहीं है। बल्कि जिन मोहतरमा ने केस किया था, उसने कोर्ट में कहा कि मैं इस काबिल नहीं थी कि साहित्य को समझ सकूं। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। 
  • कहीं आप मंटो का पीछा करते हुए तो ऐसा नहीं करने लगे?
    मंटो हमारे साहित्य का बड़ा लेखक है। मुझे जेल में जब दो दिन गुजारने पड़े तो मैंने मंटो की तकलीफ को महसूस किया तब मैंने बहस की कि हमारे संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी पर अश्लीलता के नाम पर प्रतिबंध लगाने वाली जो धारा है, अब समय आ गया है कि इसको निकाल देना चाहिए। जिस ईसाइयत की धार्मिक कट्टरता के लिए इसे बनाया गया था, उन्होंने अपने देशों से इसे अब निकाल दिया है। हम क्यों अपने साहित्यकारों को उनके बनाए कानून से आतंकित करें। हमारी अपनी सभ्यता बहुत प्राचीन और महान है, यहां सेक्स कभी वर्जित नहीं रहा। 
  • आपने अंग्रेजी और उर्दू, दोनों से मास्टर्स किया। आप फैज, फिराक, शम्सुर्रहमान फारूकी और अस्लूब अंसारी जैसे रचनाकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसमें अंग्रेजी साहित्य किस कदर मददगार रहा?
    अंग्रेजी हमारे लिए एक चैनल बन जाता है जिसके द्वारा हम दूसरी भाषाओं का साहित्य पढ़ते हैं। हमारे देश में इतनी भाषाएं है। मुझे अफसोस है कि हम उर्दू वाले अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य का अनुवाद भी कम करते हैं। अंग्रेजी और हिंदी दो भाषाएं ऐसी हैं जिनके द्वारा हम समकालीन साहित्य पढ़ सकते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपन्यास को समझने में आसानी हुई। जब मैंने गैब्रिएल गार्शिया मार्खेस, मिलान कुंडेरा और ओरहान पामुक को पढ़ा, तो मुझे लगा कि ये जो तीन बड़े साहित्यकार हैं, उन्होंने अपने सामाजिक और राजनीतिक दस्तावेज कायम किए हैं और हम जब अंग्रेजी के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय साहित्य को पढ़ते हैं तो हमें शायद सीखने का मौका मिलता है। 
  • देश में उर्दू का वर्तमान परिदृश्य क्या है?
    यह बहुत विवादास्पद सवाल है। उर्दू को किस तरह टार्गेट किया गया और इसे महज मुसलमानों से जोड़ दिया गया हम सब जानते हैं। असल में भाषा की कोई सियासत नहीं होती है। उर्दू असल में हिंदी है, हिंदुस्तानी है। दोनों अलग-अलग भषाएं नहीं हैं। कुछ गलतफहमियां भी पैदा हो गईं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें उनके करीब जाना चाहिए। फिर उर्दू तो वैसे ही इतनी मीठी जबान है कि जो एक बार भी इसे सुन ले, तो उसके जिगर में अपने लिए गुंजाइश पैदा कर ही लेती है। जश्ने-रेख्ता और जश्ने-अदब जैसे इवेंट इसके गवाह हैं। जहां हर धर्म, जातपात और वर्ग के लोग आते हैं। अगर लोगों और सरकारों ने भविष्य में खुले दिल का सबूत दिया और दोनों की लिपियों को समानतौर पर अपना लिया गया, तो यह हिंदुस्तानी भाषा बहुत ताकतवर बनकर उभरेगी। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here