एक छोटे से गांव से निकलकर देश की राजधानी दिल्ली और विदेशों में अपने हुनर का लोहा मनवा चुकी गोदावरी दत्त को मिथिला पेंटिंग के लिए इस वर्ष पद्मश्री देने की घोषणा हुई है। 90 साल की गोदावरी दत्त ने मिथिला पेंटिंग को घर से निकालकर देश-दुनिया में पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। काफी वृद्ध होने के बाद भी वे अपने हुनर से ऐसी पेंटिंग बनाती हैं कि देखने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। बड़ी संख्या में लोग उनसे मिथिला पेंटिंग सीखने भी आते हैं। पूरे मिथिलावासी उनकी इस उपलब्धि पर गौरवान्वित हैं। गौरव के इसी पल में गोदावरी दत्त से सुभाष चंद्र ने बात की, प्रस्तुत है यहां उसके प्रमुख अंश।

जैसा कि आपको पद्मश्री पुरस्कार मिलने की घोषणा हो चुकी है, इस पर आप क्या कहना चाहेंगी।
हमने कभी यह नहीं सोचा कि मिथिला पेंटिंग इसलिए करूं कि मुझे कोई पुरस्कार मिले। मैं तो बस साधना कर रही हूं। इसे करते कई दशक हो गए। मिथिला पेंटिंग एक कठिन साधना है, जो मैं लगातार कर रही हूं। हां, पुरस्कार की सूचना मिली है। देश-विदेश में मेरे कामों को सराहा गया है, तो जाहिर सी बात है कि प्रसन्नता मिलेगी ही। जो साधना करेगा, वह उचित पुरस्कार का भागीदार होगा। सिर्फ बेचने के लिए पेंटिंग बनाने से आप यह सम्मान नहीं पा सकते।

मिथिला पेंटिंग, उसकी शैली के बारे भी बताएं। आपने किस शैली को आगे बढ़ाया है?
मिथिला पेंटिंग की कचनी शैली से काम करें, तो आप ऊंचाई को पा सकते हैं। भरनी, कचनी, तांत्रिक, गोदना और कोहबर- ये मिथिला पेंटिंग्स की पांच शैलियां हैं। भरनी, कचनी और तांत्रिक पेंटिंग स्टाइल के धार्मिक तरीके हैं, जिसकी शुरुआत मधुबनी की ब्राह्मण और कायस्थ महिलाओं ने की थी। आज मिथिला पेंटिंग्स पूरी दुनिया में धूम मचा रही हैं और जाति, धर्म और एरिया जैसे पैमानों से भी ऊपर उठ चुकी है।

मिथिला पेंटिंग बनाने की आपकी शुरुआत कैसी हुई?
मिथिला पेंटिंग मैंने अपनी मां से सीखी। उन्होंने ही मुझे इसकी बारीकियों को समझाया। साथ में हिदायत भी दी कि यह एक साधना है, पूजा है। जितनी अधिक साधना करोगी, उतनी ही अधिक सफलता मिलेगी। मैं बता दूं कि साल 1964-65से ही इस क्षेत्र में काम कर रही हूं। कई देशों का दौरा कर चुकी हैं। हाल ही में बिहार म्यूजियम में मेरी बनाई हुई एक बड़ी पेंटिंग लगाई गई है। हमारी कई पेटिंग जापान के मिथिला म्यूजियम में भी प्रदर्शित की गई। मैंने अधिकतर पौराणिक कथाओं और धार्मिक विषयों का चित्रण किया है।

90 वर्ष की आयु में इतना सब कैसे कर पाती हैं?
अब पहले की तरह देह साथ नहीं निभाती है। लेकिन अभी भी मिथिला पेंटिंग बनाती हूं। बच्चे-बच्चियां कहां मानते हैं। वो लोग जब कुछ सीखने-पूछने आते हैं, तो कैसे मना कर दंू। जब तक जीवन है, मेरी मिथिला पेंटिंग है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here