स्वामी रामानन्द को मध्यकालीन भक्ति आंदोलन का महान संत माना जाता है। उन्होंने रामभक्ति की धारा को समाज के निचले तबके तक पहुंचाया। वे पहले ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने उत्तर भारत में भक्ति मार्ग का प्रचार किया। उनके बारे में प्रचलित कहावत है कि ‘द्रविड़ भक्ति उपजौ-लायो रामानंद।’ यानी उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार करने का श्रेय स्वामी रामानंद को जाता है। उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों, छुआछूत, ऊंच-नीच और जात-पात का विरोध किया। वर्तमान में इस पीठ पर विराजमान जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज से धर्म व अध्यात्म के मर्म को समझने के लिए युगवार्ता के उत्तर प्रदेश प्रतिनिधि राजेश तिवारी ने बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश।
  • सनातन धर्म ही श्रेष्ठ क्यों?

इस धर्म में सभी की स्वीकार्यता है। आपको और कहीं अन्य पंथों में यह देखने को नहीं मिलेगा। जब तक पाप—पुण्य रहेगा, जन्म लेना ही पड़ेगा। भगवान ने सर्वश्रेष्ठजन्म मनुष्य का दिया है। मनुष्य का जीवन मोक्ष के लिए मिला है। चार कर्म है—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसमें से क्रमश: तीनों नश्वर है। सिर्फ मोक्ष ही तत्व है। और मोक्ष व अमृतत्व भगवान विष्णु ही दे सकते हैं।

  •  कुंभ का मतलब क्या है?

कुंभ का मतलब है घड़ा। इस घड़ा का हिन्दू सभ्यता में विशेष महत्व है। कलश के मुख को भगवान विष्णु, गर्दन
को रूद्र, आधार को ब्रम्हा, बीच के भाग को समस्त देवियों और अंदर के जल को संपूर्ण सागर का प्रतीक माना जाता है। यह चारों वेदों का संगम है। ‘कुंभ’ सनातन धर्म का जीता जागता उदाहरण है, जो दुनिया या किसी पंथ में देखने को नहीं मिलेगा। भगवान से कुछ मांगिये नहीं, मांगना हो तो सिर्फ अमृतत्व मांगिये।

  • इस कुंभ में बड़े—बड़े संतों, महन्तों, महामण्डलेश्वरों व कथावाचकों के बड़े—बड़े बैनर लगे हुए हैं, जबकि रामानंद सम्प्रदाय का कहीं कुछ दिखता नहीं?

हम तो ऐसा बैनर लगाते हैं, जो कभी फटता नहीं, टूटता नहीं है, हम अपने गुणों का और सही कर्तव्यों का बैनर लगाते हैं।

  • इस मेले की दिव्यता व भव्यता से कितना संतुष्ट हैं?

यह मेला स्वत:स्फूर्त है। इसमें मोदी और योगी का कोई योगदान नहीं है। मोदी जी कोई हर्षवर्धन नहीं है। जो अपने 12 वर्ष की कमाई को दान करके चले जाएं। वह सिर्फ लंगोट लेकर जाते थे। कोई रहे या न रहे, यह मेला लगता ही रहेगा।

  • कुंभ में जहां राम की रसधारा बह रही है, वहीं श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर सरगर्मी बढ़ी है, आपका क्या विचार है?

भगवान श्रीराम का मंदिर राम ही बनवाएंगे और हम लोग मंदिर के लिए पत्थर सर पर उठायेंगे। यह दुनिया का सबसे बड़ा मेला है और यही राम मंदिर बनवाएगा। राम मंदिर अवश्य बनेगा, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

  • राम मंदिर मामले में केन्द्र की मोदी सरकार से संतुष्ट हैं?

हिन्दुत्व की करीबी पार्टी भाजपा को माना जाता है, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। ये लोग सिर्फ राम को भुनाते हैं। श्रीराम से जुड़े सभी प्रकार के काम कांग्रेस के शासन में हुआ। ढांचा गिरवाने में भी पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का ही योगदान है। मोदी तो राम के नाम तक नहीं लेते। उनमेंइच्छाशक्ति ही नहीं है, ये क्या राम मंदिर बनवाएंगे, ये तो कहीं से रामभक्त ही नहीं है।

  • जीवन का अधूरापन व पूर्णता क्या है?
    जीवन ईश्वर के बिना अधूरा है, और ज्ञान के बगैर पूर्णता नहीं मिलेगी, उसकी प्राप्ति बड़ी कठिन है। ज्ञान के बिना जीवन में परिपूर्णता नहीं आती। जो ईश्वर का भजन करता है, उन्हें उनकी अनुभूति होती है। जिस प्रकार से सूर्य, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश हमारा है, उसी प्रकार से ईश्वर भी हमारा ही है, यह भाव होना आवश्यक है।
  • रमानन्द सम्प्रदाय ने ऊंच—नीच, छुआछूत पर काफी काम किया, ऐसा लगता है कि यह कम होने के बजाय
    बढ़ता जा रहा है?

ऊंच—नीच, छुआछूत, जाति—पांति जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए हम सब को एक सूत्र में बंधना होगा। जिस प्रकार से सूर्य, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश सबका है, उसी प्रकार से ईश्वर सबका है। जब जूता सीने वाला
रैदास इस ज्ञान से जुड़ सकता है और जीवन के अंतिम सोपान को पा सकता है। जब कपड़ा बुनने वाला कबीर भी
प्राप्त कर सकता है, तो किस प्रकार का भेदभाव। यह एक मन का पाप है।

  • स्वामी रामानंद ने राम भक्ति का द्वार सबके लिए खोला, क्या पहले ऐसा नहीं था?

नहीं था। तीन वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य को ही प्रभु भजन करने का अधिकार था। जब समाज में चारों ओर वैमनस्य का भाव भरा था, उस समय स्वामी रामानंद ने नारा दिया ‘जात-पात पूछे ना कोई-हरि को भजै सो हरि का
होई’। उन्होंने महिलाओं को भी भक्ति में समान स्थान दिया। रामानंद सम्प्रदाय में द्वादश महाभागवत क्या है?
जो भी धर्माचार्य उस समय हुए, उनका मानना था कि संत व आध्यात्मिक परम्परा में ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का
ही अधिकार है। इस पीड़ा से व्यथित स्वामी रामानंद ने राम भक्ति का द्वार सबके लिए खोला। उन्होंने अनंतानंद,
भावानंद, पीपा, सेन, धन्ना, नाभा दास, नरहर्यानंद, सुखानंद, कबीर, रैदास, सुरसरी, पदमावती जैसे बारह लोगों को अपना प्रमुख शिष्य बनाया, उन्हें ही द्वादश महाभागवत के नाम से जाना जाता है।

  • रामानंद सम्प्रदाय की कोई विशेषता हो तो बताइये?

इस सम्प्रदाय के द्वादश महाभागवत में कबीर और रैदास हैं। जिन्होंने ख्याति अर्जित की। कबीर और रैदास ने निर्गुण
राम की उपासना की। स्वामी रामानंद ऐसे महान संत थे जिसकी छाया तले सगुण और निर्गुण दोनों तरह के संत- उपासक विश्राम पाते थे। यही हमारी विशेषता

  • इस कुंभ में अखाड़ा संन्यासियों की जमात है, सम्प्रदाय का कोई अखाड़ा?

इस संप्रदाय के संत बैरागी कहे जाते हैं। इनके अपने अखाड़े भी हैं। यूं तो रामानंद सम्प्रदाय की शाखाएं और उपशाखाएं देश भर में फैली हैं। लेकिन अयोध्या, चित्रकूट, नाशिक, हरिद्वार में इस संप्रदाय के सैकड़ों मठ-मंदिर हैं। काशी के पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ, दुनिया भर में फैले रामानंदियों का मूल गुरुस्थान है। दूसरे शब्दों में कहें तो काशी का श्रीमठ ही सगुण और निर्गुण रामभक्ति परम्परा और रामानंद सम्प्रदाय का मूल आचार्यपीठ है।

  • इस सम्प्रदाय के उपासक?

स्वामी रामानंद ने देश भर में भक्ति मार्ग का प्रचार किया। वे पुरी और दक्षिण भारत के कई धर्मस्थानों पर गये और रामभक्ति का प्रचार किया। पहले उन्हें स्वामी रामानुज का अनुयायी माना जाता था, लेकिन श्रीसम्प्रदाय का आचार्य
होने के बावजूद उन्होंने अपनी उपासना पद्धति में राम और सीता को वरीयता दी।

  • धर्म को समझने में एक बड़ा अवरोध भाषा का भी है, आपका क्या मानना है?

हमारा सम्पूर्ण वैदिक व प्राचीन वाग्मय संस्कृत में है,जबकि दुर्भाग्य है कि संस्कृत ही देश की सबसे उपेक्षित भाषा है। भक्ति की धारा जन—जन तक पहुंचे, इसके लिए स्वामी जी ने भक्ति के प्रचार में संस्कृत की जगह लोकभाषा को प्राथमिकता दी।

  • रामराज्य का मतलब क्या है?
    रामराज्य सहनशीलता व समझौते का मार्ग है। रामराज्य धर्म व प्रेम की पराकाष्ठा है। दुनिया में कहीं संतत्व व सैनिकतत्व नहीं है, यह सिर्फ भारत में है। राम में बहुत शक्ति है। राम के नाम पर दो सीट वाली पार्टी भाजपा आज सत्ता में है।

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